सूर्य की स्वर्णिम किरणों का
प्रेमिल-स्पर्श पाकर
खिलते हैं
अनगिनत पुष्प
हमारी आँखों के सामने,
और बिखरते हैं
दसों दिशाओं में
सभी जीव-जंतुओं के मन को
आनन्दित करने वाली
अपनी सुगन्ध,
बिना किसी भेदभाव के।
भरी होती है
एक दिन की
उनकी छोटी-सी जीवन-अवधि
त्याग और परोपकार से
सन्तों की तरह।
जो चाहे
उनकी सुगन्ध के आनन्द में
सारी सुध-बुध बिसरा दे;
जो चाहे
उनके शरीर में
अपना नुकीला सूँड़ धँसाकर,
उनका रस चूसकर
मदमस्त हो ले;
जो चाहे
बिना झिझक,
बिना उनकी सहमति के,
अपनी आवश्यकता के लिए
उन्हें तोड़ ले
और जहाँ चाहे,
जैसे चाहे
उनका प्रयोग कर ले;
न किसी को रोकते हैं,
न किसी को ठोकते हैं;
चुपचाप
सभी के काम आ जाते हैं।
और जो
किसी के काम नहीं आते
मुरझा जाते हैं अंततः
दिन के समाप्त होने तक,
मिट जाता है उनका अस्तित्व
बिना किसी पहचान के।
फिर भी,
हम जैसे
स्वार्थी, लोभी और देहाभिमानी मनुष्य
नहीं सीख पाते हैं कुछ भी
उनके छोटे-से
सार्थक जीवन से,
और
भागते रहते हैं
मृग-मरीचिकाओं के पीछे।
- राजेश मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें