जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।
जाति, वर्ण या धर्म कोई भी,
सब कठपुतली और किसी की।
जड़-चेतन हों, मनुज-मवेशी,
कहीं और है डोर सभी की।
डोरी के हर एक ताल पर सबको सदा थिरकते देखा।
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।१।।
कठपुतली गढ़ने से पहले
रचनाकार मनन करता है।
क्या भूमिका निभानी उसको
तद् अनुसार गढ़न करता है।
जब-जब वह कठपुतली देखी, वही भूमिका करते देखा।
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।२।।
कठपुतली का जीवन तब तक,
जब तक डोर अक्षत रहती है।
अरु कठपुतली सञ्चालक की
अङ्गुलियों से युत रहती है।
डोर टूटते, डोर छूटते, तन-धन-मान बिखरते देखा।
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।३।।
- राजेश मिश्र
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