मन एक अत्यन्त चञ्चल जीव की तरह है, जिसका स्वभाव वन-वन भटकना है। अतः इसे सुख-दुःख के कँटीले जंगलों की जगह आनन्द के सदाबहार वन में छोड़ दो।
सोमवार, 21 सितंबर 2026
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मैं मीठा कैसे बोलूँ
कोई शर गर-युत यदि छोड़े, मैं मीठा कैसे बोलूँ। रग-रग में कड़वाहट दौड़े, मैं मीठा कैसे बोलूँ।। पग-पग पर विश्वास बनाए रक्खा जिसका जीवन भर, आश्व...
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लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और...
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मैं पुनि समुझि देखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥ प्राननाथ करुनायतन सुन्दर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक सम...
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बीते पलों के अफ़साने लिख रहा हूँ। जिंदगी मैं तेरे तराने लिख रहा हूँ॥ हालत कुछ यूँ कि वक्त काटे नहीं कटता, वक्त काटने के बहाने लिख रहा हूँ॥...
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