चुप न रहो, कुछ बोलो राम।।
सारे जग की सुनते निशिदिन,
मन ही मन सब गुनते निशिदिन।
भला-बुरा वे जो कुछ कहते,
हँसते-हँसते तुम सब सहते।
होंठ कभी तो खोलो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥१॥
तुमने भी तो बहुत सहा है,
किन्तु कभी कुछ भी न कहा है।
मन ही मन घुटते रहते हो,
कभी न निज पीड़ा कहते हो।
घाव हृदय के धो लो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥२॥
यदि संकोच किसे बतलायें?
जो सुनकर मन में रख पाये।
शपथ तुम्हारी चुप सुन लूँगा,
कभी किसी से कुछ न कहूँगा।
कहकर मुझसे रो लो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥३॥
— राजेश मिश्र
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