बुधवार, 23 सितंबर 2026

चुप न रहो, कुछ बोलो राम

गाँठें मन की खोलो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम।।

सारे जग की सुनते निशिदिन,
मन ही मन सब गुनते निशिदिन।
भला-बुरा वे जो कुछ कहते,
हँसते-हँसते तुम सब सहते।

होंठ कभी तो खोलो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥१॥

तुमने भी तो बहुत सहा है,
किन्तु कभी कुछ भी न कहा है।
मन ही मन घुटते रहते हो,
कभी न निज पीड़ा कहते हो।

घाव हृदय के धो लो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥२॥

यदि संकोच किसे बतलायें?
जो सुनकर मन में रख पाये।
शपथ तुम्हारी चुप सुन लूँगा,
कभी किसी से कुछ न कहूँगा।

कहकर मुझसे रो लो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥३॥

— राजेश मिश्र

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