मंगलवार, 27 अगस्त 2019

कायर

बैठी थी वह
दो मिनट का अवकाश लेकर
अपने दुधमुँहे बच्चे के साथ
ममता से सराबोर
समेटे हुए आँचल में उस नवजात को
स्तनपान कराती, दुलराती !

मगन था वह भी
माँ के आँचल तले
अमृत-रस-पान करता हुआ
परमसुख, परमानंद की अनुभूति के साथ !

तभी अचानक !
एक झटका लगा
जोर का, बहुत जोर का
लगा जैसे आ गया हो
कोई प्रलयंकारी भूकम्प
काँप उठी हो धरती
चिग्घाड़ उठा हो आसमान
और वह नवजात
जा गिरा दूर अपनी माँ की गोद से
कंकड़ीली, ऊबड़-खाबड़
तप्त भूमि पर.

गिरी पड़ी थी उसकी माँ भी
तड़पती, कराहती असीम वेदना से
पकड़े हुए अपनी पीठ को
एक हाथ से,
और फैलाये हुए दूसरा हाथ
अपने अबोध शिशु की ओर
चीखती, चिग्घाड़ती, बिलबिलाती, गिड़गिड़ाती
देखती हुई कातर आँखों से
कभी अपने निरपराध निरीह पुत्र को
तो कभी उस
दैत्याकार, बर्बर, क्रूर
ठेकेदार को,
जिसकी लात के आघात से
धरती पर पड़ी कराह रही थी वह
और उसका बच्चा भी.

रो रहे थे माँ बेटे
तड़प रहे थे, चिग्घाड़ रहे थे
और..
इस अपार वेदना और करुण क्रन्दन के बीच
सोच रहा था वह नन्हा मासूम
प्रयास कर रहा था समझने का
इस पूरे घटनाक्रम को,
और कोशिश कर रहा था जानने की -
"क्यों मारा उसने मेरी माँ को?
क्या अपराध था उसका?
क्या सुबह से शाम तक
दुर्दिन और दुर्भाग्य के
पाटों के बीच पिसना, फिर भी
अपनी अस्मत की रक्षा हेतु संघर्षरत रहना
यही अपराध था उसका?
या फिर,
पति के आकस्मिक निधन के पश्चात् भी
समाज से लड़ते हुए
स्वाभिमान से जीने का प्रयत्न ?
क्या अपने भूख से तड़पते
बिलखते बच्चे के लिए
दो मिनट का अवकाश लेना उसका अपराध था?
या फिर,
भूखे भेड़ियों के समक्ष
आत्मसमर्पण न करना?

और यह कायर तमाशबीन भीड़ !
मौन है जो हस्तिनापुर के सभासदों की भाँति,
जैसे वे मौन थे
द्रौपदी के चीरहरण के समय
आमंत्रण देते भयंकर विनाश को.
दबा रखा है इन्होंने
प्रतिरोध के स्वर को
प्रतीक्षा में
अपनी-अपनी बारी की.

अरे कायरों !
मिटोगे तुम भी एक दिन
एक-एक कर, असहाय
एकदूसरे का मुँह ताकते
किन्तु, हाथ छुड़ाते हुए
मिटोगे तुम भी,
यदि अभी भी नहीं जागे
मिटोगे तुम भी एक दिन !

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

सपने बड़े हो गये हैं !

अहा ! वह बचपन।

प्रतिदिन प्रात:
उषा जब द्वार के पट खोलती थी
नवोदित अरुण की चंचल रश्मियाँ
घुस आती थीं मेरे कमरे में
एक छोटे से झरोखे से
भागती हुई, प्रकाश भरने
नवचेतना, नयी स्फूर्ति देने
मेरी रात के अँधेरे से लड़कर
थककर सोयी हुई
नींद से बोझिल आँखों को.

तभी अम्मा
प्यार से सिर सहलाते, दुलारते
मीठे मधुर शब्दों में कहतीं-
"उठ जा बेटा !
सुबह हो गयी है
देखो, सूरज भी निकल आया है
और मैं
कुनमुनाते हुए 

करवट बदल लेता था

और सोने के लिए,
अचानक टूट जाने वाले
आधे-अधूरे सपनों को
पूरा करने के लिए,
क्योंकि सुना था 

कि सुबह के सपने
अक्सर सच हो जाते हैं।

उम्र के साथ
अब सपने भी बड़े हो चले हैं।
नहीं समाते हैं अब
बंद आँखों में,
दे जाते हैं दर्द
चुरा लेते हैं नींद

और उन्हें देखने के लिए
अब आँखें बंद नहीं करनी पड़तीं
खुली रखनी पड़ती हैं,

और उन्हें पूरा करने के लिए
अब सोना नहीं
जागना पड़ता है !


- राजेश मिश्र

रविवार, 18 अगस्त 2019

श्रीराम

सत्य-चित्-आनन्दघन प्रभु राम सब सुखधाम हैं।
भक्त-परिपालक, मृदुल-चित प्रभु सकल गुण-ग्राम हैं।
मातु-पितु-गुरु-बन्धु हित रत प्रिय प्रजा परित्राण हैं।
कौशलेय नमस्य निशिदिन कैकयी के प्राण हैं।।

मनुज तन धारे पधारे देव-नर दुख हरण को।
गाधिसुत के संग निकले माँ अहिल्या तरण को।
खण्ड हर-कोदण्ड करि प्रभु जनक की पीड़ा हरी।
भृगुतनय के संग मिलि पुनि थी तनिक क्रीड़ा करी।।

जानकी को साथ ले प्रभु पुर अयोध्या आ गये।
हर्ष से उल्लसित जन-मन स्वर्ग-निधि ज्यों पा गये।
प्रिय प्रजा की घोर इच्छा राम ही युवराज हों।
चक्रवर्ती भूप दशरश क्यों न प्रमुदित आज हों।।

पर प्रजा-हित राम ने वनगमन का निर्णय किया।
मति फिरी कैकयसुता की भूप से हठ वर लिया।
वेष धर यति का चले वन राम-लक्ष्मण-जानकी।
मातु-इच्छा अरु पिता के लाज रखने आन की।।

चरण केवट ने पखारा तर गया संसार से।
जगत-तारणहार को ले नाव में निज प्यार से।
हर्ष से स्वागत किये मुनि-वृंद प्रभु श्रीराम का।
जानकी के कंत का प्रभु परम करुणाधाम का।।

अब समय था आ चला सब राक्षसों के अन्त का।
नाश के आतंक का अरु क्षेम के सब सन्त का।
राम ने माया रची मिलि प्राणप्यारी जानकी।
हीन दशकन्धर भगिनि भइ नासिका अरु कान की।।

मृग बना मारीचि स्वर्णिम सिय-हरण दशमुख चला।
हैं सृजक चल-अचल के प्रभु सोचता उसने छला।
गीध ने आहुति चढ़ा दी प्राण की प्रभु-काज में।
पद मिला प्रभु-धाम में वह हुआ पूज्य समाज में।।

भीलनी की चिर-प्रतीक्षा को सुखद अवसान दे।
बालि वध सुग्रीव को नित अभय का वरदान दे।
संग वानर-भालु को ले बाँध सागर को दिया।
हत दशानन कुल सहित सुर-मुनि-मनुज निर्भय किया।।

जयति जय श्रीराम प्रभु की कीर्ति अद्भुत पावनी।
अति मनोहर क्षेमकारी सर्वदा सुखदायिनी।
दीनबन्धु कृपालु करुणा-पुंज सबका हित करें।
हों सहज भवपार जो प्रभु नाम सुमिरन नित करें।।

राम सारे दुख हरें बस एक बार पुकार ले।
भाव से या अनमने ही नाम तो इक बार ले।
दुखहरण मंगलकरण प्रभु सर्वदा तत्पर रहें।
भक्त-वत्सल भाव-भूखे दौड़कर बाहें गहें।।

क्या कभी सोचा कि हमने कर्म अपना भी किया?
छाँव में जिसकी पले हम छाँव क्या उसको दिया?
जो अयोध्या-धाम प्रभु का पुण्य जन्मस्थान है।
परम पावन भूमि है वह हम सभी का मान है।।

हो रहा है जो वहाँ पर क्या नहीं अन्याय है?
समय से यदि मिल न पाये न्याय क्या वह न्याय है?
हो यही अंतिम लड़ाई आज यह संकल्प लें।
देर अब होने न पाये कार्य प्रभु का कर चलें।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 17 अगस्त 2019

माँ भारती

शोभे शुभ्र हिमाद्रि, शिरोभूषण शिख सुन्दर ।
पाँव पखारत उदधि, मगन मन मुदित मनोहर ।।

सिञ्चति सुरसरि सूर्य-सुता पावन शीतल जल ।
शस्य श्याम परिधान, परम परिकीर्ण परिचपल ।।

सुरभित सरस समीर, श्वाँस त्रय ताप नसावन ।
चारु चंद्रिका चपल, मधुर स्मित सरल सुहावन ।।

गुञ्जत गायन गाथ, दसों-दिश जल-थल-नभ में ।
वेद-ऋचा धुनि नाद, गहन गिरि-कानन जन में ।।

ज्ञान-ध्यान-तप-योग, दिया तूने संसृति को ।
चरमोत्कर्ष प्रदान, किया अनुपम विधि-कृति को ।।

अञ्चल अमिय असीम, दिव्य औषधि की जननी ।
सुयश अमित माँ कहत, थकित गणनायक अँकनी ।।

सुर-नर-मुनि नित पूज्य, परम पावन ऐश्वर्या ।
धन्य-धन्य वह देह, मिटे माँ की परिचर्या ।।

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी। सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।।  चाहे जितना भी थकती हूँ, पर अविरल बहती रहती हूँ। प...