तुम
निकले
शहर को
तकता रहा
जाते युवाओं को
हमारा प्यारा गाँव.
मैं
तुम
रहते
शहर में
बाट जोहता
बूढ़ी सूनी आँखों
हमारा प्यारा गाँव.
श्रांत/क्लांत/निश्चल
दरवाजे के चौखट पर बैठीं
अम्मा!
निर्निमेष भाव से
एकटक
देखे जा रही थीं
कड़क/तपती/खड़ी दुपहरी में तपते
किन्तु, छाया प्रदान करते
टिकोरों से लदे हुए
अमोले को।
निश्चय किया था
उन्होंने और पिताजी ने
रोपेंगे एक वृक्ष
अपने पुत्र के जन्म के मौके पर;
और रोपा था इस अमोले को
अपने एकमात्र पुत्र के जन्म के समय।
इस तरह
जन्म दिया था दो पुत्रों को
एक जड़;
एक चेतन!
दोनों बढ़े
विकसित हुए
स्वावलम्बी हुए।
जड़ अभी भी वहीं खड़ा है
चुपचाप
तपती/चिलमिलाती धूप में
शीतल छाया प्रदान करता;
अम्मा-पिताजी के परिश्रम का/
प्रेम और वात्सल्य का/
त्याग का
प्रतिफल प्रदान करता।
और चेतन...?
खो गया है कहीं
दुनिया की भीड़ में
उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर
आधुनिकता का हाथ थामे हुए
पुरातन सोच/
पुरातन परम्पराओं से
पीछा छुड़ाकर,
विवश बुढ़ापे को
अकेलापन/घुटन देकर
खो गया है कहीं
हमारा चेतन!
मैं नारी हूँ !
विधाता की अनुपम सृष्टि/
ममतामयी दृष्टि/
भावनाओं की वृष्टि।
मैं जीवनदायिनी
पालक/पोषक हूँ,
सारे दुखों की
अवशोषक हूँ ।
प्रेम की
परिभाषा हूँ,
ज्ञानियों की
जिज्ञासा हूँ,
थकित मन की
आशा हूँ,
कामुक तन की
अभिलाषा हूँ ।
साक्षात दुर्गा हूँ
काली/लक्ष्मी/पार्वती
वीणावादिनी हूँ मैं,
मोहिनी/रम्भा/मेनका
कामायिनी हूँ मैं ।
भक्तों की
भक्ति हूँ मैं,
प्रकृति की
सृजन-शक्ति हूँ मैं ।
मैं नारी हूँ !
मेरे मन के अंध तमस में ज्योतिर्मय उतरो ||
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !
नहीं कहीं कुछ मुझमें सुंदर,
काजल सा काला सब अन्दर |
प्राणों के गहरे गह्वर में करुणामयि उतरो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !
नहिं जप-योग, न यज्ञ प्रबीना,
ज्ञानशून्य मैं सब विधि हीना |
ज्ञानचक्षु जागृत कर अम्बे जगमग जग कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !
जीवन की तुम एक सहारा।
शक्ति स्वरूपा जगदाधारा।
नवजीवन नवज्योति भरो माँ पापमुक्त कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !
हाँ, प्यासा हूँ मैं!
भटक रहा हूँ खोज में
एक बूँद पानी की...
आँखों में आस लिए
होंठों पर प्यास लिए
सागर की गर्त में
सहरा के गर्द में
नदिया के करारों पर
बर्फ के पहाड़ों पर
सूखे मैदानों में
पथरीली चट्टानों में।
भटक रहा हूँ मैं खोज में
प्रेम के दो बोल की...
ह्रदय में प्यार लिए
सपनों का संसार लिए
शहरों में, गावों में
उफनती भावनावों में
दुनिया की भीड़ में
जंगल के बीहड़ में
अपनों में, परायों में
अनजाने सायों में।
भटक रहा हूँ मैं खोज में
तेरी...
आस्था का दीप लिए
श्रद्धा और प्रीत लिए
अन्तस्थ शिराओं में
पहाड़ों की गुफाओं में
ग्रंथों के सिद्धांत में
अखिल ब्रह्माण्ड में
जड़ में, चेतन में
विनाश में, सृजन में।
भटक रहा हूँ मैं,
क्योंकि प्यासा हूँ मैं!
- राजेश मिश्र
माँ हूँ मैं!
पल रही हूँ कोख में एक माँ की,
लेकिन...
डरी-सहमी-सी...
क्या मैं जन्म ले पाऊँगी?
ये दुनिया देख पाऊँगी?
कहीं गर्भ में ही मार तो नहीं दी जाऊँगी?
माँ हूँ मैं!
उमंगों से भरी,
कुलाचें भर रही हूँ मैं।
माँ के प्यार तले,
पापा के दुलार तले,
लेकिन...
काँप उठती हूँ सोचकर—
क्या मैं ससुराल जा पाऊँगी?
क्या मैं माँ बन पाऊँगी?
कहीं जला तो नहीं दी जाऊँगी दहेज़ के लिए?
माँ हूँ मैं!
बेटी की शादी हो गई है।
सुंदर-सी बहू है मेरी,
कभी-कभी मिल पाती हूँ।
वृद्धाश्रम में रह रही हूँ न,
बेटे का घर थोड़ा छोटा है!
माँ हूँ मैं!
चिंता लगी रहती है
हमेशा अपने बच्चों की।
घुलती रहती हूँ उनकी याद में।
भगवान् उन्हें सुखी रखें!
सदा सुखी रखें!!
— राजेश मिश्र
भैया! हाल-चाल कैसा है? बाबू! सब कुछ ठीक-ठाक है।। आय अठन्नी, खर्च रुपइया बरसों पहले ब्याई गइया दूध उठौना ही आता है काम चाय का चल जाता है ...