मंगलवार, 27 अगस्त 2019

कायर

बैठी थी वह
दो मिनट का अवकाश लेकर
अपने दुधमुँहे बच्चे के साथ
ममता से सराबोर
समेटे हुए आँचल में उस नवजात को
स्तनपान कराती, दुलराती !

मगन था वह भी
माँ के आँचल तले
अमृत-रस-पान करता हुआ
परमसुख, परमानंद की अनुभूति के साथ !

तभी अचानक !
एक झटका लगा
जोर का, बहुत जोर का
लगा जैसे आ गया हो
कोई प्रलयंकारी भूकम्प
काँप उठी हो धरती
चिग्घाड़ उठा हो आसमान
और वह नवजात
जा गिरा दूर अपनी माँ की गोद से
कंकड़ीली, ऊबड़-खाबड़
तप्त भूमि पर.

गिरी पड़ी थी उसकी माँ भी
तड़पती, कराहती असीम वेदना से
पकड़े हुए अपनी पीठ को
एक हाथ से,
और फैलाये हुए दूसरा हाथ
अपने अबोध शिशु की ओर
चीखती, चिग्घाड़ती, बिलबिलाती, गिड़गिड़ाती
देखती हुई कातर आँखों से
कभी अपने निरपराध निरीह पुत्र को
तो कभी उस
दैत्याकार, बर्बर, क्रूर
ठेकेदार को,
जिसकी लात के आघात से
धरती पर पड़ी कराह रही थी वह
और उसका बच्चा भी.

रो रहे थे माँ बेटे
तड़प रहे थे, चिग्घाड़ रहे थे
और..
इस अपार वेदना और करुण क्रन्दन के बीच
सोच रहा था वह नन्हा मासूम
प्रयास कर रहा था समझने का
इस पूरे घटनाक्रम को,
और कोशिश कर रहा था जानने की -
"क्यों मारा उसने मेरी माँ को?
क्या अपराध था उसका?
क्या सुबह से शाम तक
दुर्दिन और दुर्भाग्य के
पाटों के बीच पिसना, फिर भी
अपनी अस्मत की रक्षा हेतु संघर्षरत रहना
यही अपराध था उसका?
या फिर,
पति के आकस्मिक निधन के पश्चात् भी
समाज से लड़ते हुए
स्वाभिमान से जीने का प्रयत्न ?
क्या अपने भूख से तड़पते
बिलखते बच्चे के लिए
दो मिनट का अवकाश लेना उसका अपराध था?
या फिर,
भूखे भेड़ियों के समक्ष
आत्मसमर्पण न करना?

और यह कायर तमाशबीन भीड़ !
मौन है जो हस्तिनापुर के सभासदों की भाँति,
जैसे वे मौन थे
द्रौपदी के चीरहरण के समय
आमंत्रण देते भयंकर विनाश को.
दबा रखा है इन्होंने
प्रतिरोध के स्वर को
प्रतीक्षा में
अपनी-अपनी बारी की.

अरे कायरों !
मिटोगे तुम भी एक दिन
एक-एक कर, असहाय
एकदूसरे का मुँह ताकते
किन्तु, हाथ छुड़ाते हुए
मिटोगे तुम भी,
यदि अभी भी नहीं जागे
मिटोगे तुम भी एक दिन !

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

सपने बड़े हो गये हैं !

अहा! वह बचपन।


प्रतिदिन प्रातः,

उषा जब द्वार के पट खोलती थी,

नवोदित अरुण की चंचल रश्मियाँ

घुस आती थीं मेरे कमरे में

एक छोटे-से झरोखे से—

भागती हुई, प्रकाश भरने,

नवचेतना, नई स्फूर्ति देने,

मेरी रात के अँधेरे से लड़कर

थककर सोयी हुई,

नींद से बोझिल आँखों को।


तभी अम्मा

प्यार से सिर सहलातीं, दुलारतीं,

मीठे-मधुर शब्दों में कहतीं—

“उठ जा बेटा!

सुबह हो गयी है।

देखो, सूरज भी निकल आया है।”


और मैं,

कुनमुनाते हुए,

करवट बदल लेता था

और सोने के लिए—

अचानक टूट जाने वाले

आधे-अधूरे सपनों को

पूरा करने के लिए।


क्योंकि सुना था

कि सुबह के सपने

अक्सर सच हो जाते हैं।


उम्र के साथ

अब सपने भी बड़े हो चले हैं।

नहीं समाते हैं अब

बंद आँखों में,

दे जाते हैं दर्द,

चुरा लेते हैं नींद।


और उन्हें देखने के लिए

अब आँखें बंद नहीं करनी पड़तीं,

खुली रखनी पड़ती हैं।


और उन्हें पूरा करने के लिए

अब सोना नहीं,

जागना पड़ता है!


— राजेश मिश्र

रविवार, 18 अगस्त 2019

श्रीराम

सत्य-चित्-आनन्दघन प्रभु राम सब सुखधाम हैं।
भक्त-परिपालक, मृदुल-चित प्रभु सकल गुण-ग्राम हैं।
मातु-पितु-गुरु-बन्धु हित रत प्रिय प्रजा परित्राण हैं।
कौशलेय नमस्य निशिदिन कैकयी के प्राण हैं।।

मनुज तन धारे पधारे देव-नर दुख हरण को।
गाधिसुत के संग निकले माँ अहिल्या तरण को।
खण्ड हर-कोदण्ड करि प्रभु जनक की पीड़ा हरी।
भृगुतनय के संग मिलि पुनि थी तनिक क्रीड़ा करी।।

जानकी को साथ ले प्रभु पुर अयोध्या आ गये।
हर्ष से उल्लसित जन-मन स्वर्ग-निधि ज्यों पा गये।
प्रिय प्रजा की घोर इच्छा राम ही युवराज हों।
चक्रवर्ती भूप दशरश क्यों न प्रमुदित आज हों।।

पर प्रजा-हित राम ने वनगमन का निर्णय किया।
मति फिरी कैकयसुता की भूप से हठ वर लिया।
वेष धर यति का चले वन राम-लक्ष्मण-जानकी।
मातु-इच्छा अरु पिता के लाज रखने आन की।।

चरण केवट ने पखारा तर गया संसार से।
जगत-तारणहार को ले नाव में निज प्यार से।
हर्ष से स्वागत किये मुनि-वृंद प्रभु श्रीराम का।
जानकी के कंत का प्रभु परम करुणाधाम का।।

अब समय था आ चला सब राक्षसों के अन्त का।
नाश के आतंक का अरु क्षेम के सब सन्त का।
राम ने माया रची मिलि प्राणप्यारी जानकी।
हीन दशकन्धर भगिनि भइ नासिका अरु कान की।।

मृग बना मारीचि स्वर्णिम सिय-हरण दशमुख चला।
हैं सृजक चल-अचल के प्रभु सोचता उसने छला।
गीध ने आहुति चढ़ा दी प्राण की प्रभु-काज में।
पद मिला प्रभु-धाम में वह हुआ पूज्य समाज में।।

भीलनी की चिर-प्रतीक्षा को सुखद अवसान दे।
बालि वध सुग्रीव को नित अभय का वरदान दे।
संग वानर-भालु को ले बाँध सागर को दिया।
हत दशानन कुल सहित सुर-मुनि-मनुज निर्भय किया।।

जयति जय श्रीराम प्रभु की कीर्ति अद्भुत पावनी।
अति मनोहर क्षेमकारी सर्वदा सुखदायिनी।
दीनबन्धु कृपालु करुणा-पुंज सबका हित करें।
हों सहज भवपार जो प्रभु नाम सुमिरन नित करें।।

राम सारे दुख हरें बस एक बार पुकार ले।
भाव से या अनमने ही नाम तो इक बार ले।
दुखहरण मंगलकरण प्रभु सर्वदा तत्पर रहें।
भक्त-वत्सल भाव-भूखे दौड़कर बाहें गहें।।

क्या कभी सोचा कि हमने कर्म अपना भी किया?
छाँव में जिसकी पले हम छाँव क्या उसको दिया?
जो अयोध्या-धाम प्रभु का पुण्य जन्मस्थान है।
परम पावन भूमि है वह हम सभी का मान है।।

हो रहा है जो वहाँ पर क्या नहीं अन्याय है?
समय से यदि मिल न पाये न्याय क्या वह न्याय है?
हो यही अंतिम लड़ाई आज यह संकल्प लें।
देर अब होने न पाये कार्य प्रभु का कर चलें।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 17 अगस्त 2019

माँ भारती

शोभे शुभ्र हिमाद्रि, शिरोभूषण शिख सुन्दर ।
पाँव पखारत उदधि, मगन मन मुदित मनोहर ।।

सिञ्चति सुरसरि सूर्य-सुता पावन शीतल जल ।
शस्य श्याम परिधान, परम परिकीर्ण परिचपल ।।

सुरभित सरस समीर, श्वाँस त्रय ताप नसावन ।
चारु चंद्रिका चपल, मधुर स्मित सरल सुहावन ।।

गुञ्जत गायन गाथ, दसों-दिश जल-थल-नभ में ।
वेद-ऋचा धुनि नाद, गहन गिरि-कानन जन में ।।

ज्ञान-ध्यान-तप-योग, दिया तूने संसृति को ।
चरमोत्कर्ष प्रदान, किया अनुपम विधि-कृति को ।।

अञ्चल अमिय असीम, दिव्य औषधि की जननी ।
सुयश अमित माँ कहत, थकित गणनायक अँकनी ।।

सुर-नर-मुनि नित पूज्य, परम पावन ऐश्वर्या ।
धन्य-धन्य वह देह, मिटे माँ की परिचर्या ।।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

हे जननि! तव चरण-वंदन

हे जननि! तव चरण-वंदन

वार दूँ तुझ पर ये तन-मन
हे जननि! तव चरण वंदन

दिव्य है तू इस धरा पर
स्वर्ग है चरणों में तेरे
तू ही बहती है लहू बन
माँ मेरी रग-रग में मेरे

धूप जो भव-दु:ख ये सारा
तू है छाया, तू ही उपवन
हे जननि!...

तेरे अमृत-रस-धार से ही
नवल जीवन हो सुसिंचित
दृष्टि तेरी है कृपामयि
वचन प्रति पल प्रेम पूरित

तू प्रकृति की सृजन-शक्ति
तू प्रकृति का प्रथम चिन्तन
हे जननि!...

तू ही शक्ति, तू ही दुर्गा
तू ही लक्ष्मी, तू ही काली
ये सभी हैं रूप तेरे
तू ही प्रति कण बसने वाली

तेरी महिमा सबसे न्यारी
गायें प्रतिपल सुर-नर-मुनि जन
हे जननि!...

है अभागा पुरुष वह
जो प्रेम से सिंचित न तेरे
धैर्य धारे धरा-सी तू
चाहे कितने दु:ख घनेरे

सोख लेती कष्ट दारुण
विष की गर्मी जैसे चंदन
हे जननि!...

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

हरि दर्शन

हरि दर्शन
तड़पत है मन
तकें नयन

मृदु वचन
पवित्र आचरण
सत्य कथन

सेवा मगन
सहायक निर्धन
प्रभु चिन्तन

मन दर्पण
सब प्रभु अर्पण
कृपा अयन

प्रभु मिलन
हर्षित तन-मन
धन्य जीवन

गोरी चली है

गोरी चली है
सज-के, सँवर-के
ललचें लाल

कोमल पाँव
महावर दमके
करे निहाल

मादक ध्वनि
छम-छम पायल
हिरनी-चाल

चूड़ी छनके
कँगना खन-खन
लोग बेहाल

कानों झुमके
कमर करधनी
बिंदिया भाल

लाल अधर
कपोल दमकते
ज्यों उषाकाल

माँग में टीका
द्युति दामिनि की है
नागिन बाल

रसिया सारे
मर-मिट जाये हैं
नेत्र विशाल

ज्यों कामायिनी
जगत धन्य हुआ
रूप कमाल

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

साया

नज़रें उठाकर देख मैं तेरा साया हूँ
छुप के छुपाकर देख मैं तेरा साया हूँ
दिल से लगाकर देख मैं तेरा साया हूँ
पास में आकर देख मैं तेरा साया हूँ

दु:ख की धूप में तुझे नज़र मैं आती हूँ
सुख की छाँव में मैं ओझल हो जाती हूँ
पग-पग तेरे साथ मैं तेरा साया हूँ
दिन हो या हो रात मैं तेरा साया हूँ

चाह हमेशा यही खुशी के रंग बिखेरूँ
जब-जब हो तुम थकित अंक में अपने ले लूँ
चाँद मेरे हमराह मैं तेरा साया हूँ
तेरी ही मुझे चाह मैं तेरा साया हूँ

विधि का है यह मेल मैं तेरे साथ में हूँ
जीवन का यह खेल मैं तेरे साथ में हूँ
थक ना, ना कर आह मैं तेरा साया हूँ
भर ले मन में उछाह मैं तेरा साया हूँ

हार नहीं मानूँगी मैं अंतिम साँसों तक
वचन निबाहूँगी पिया आखिरी रातों तक
मुझमें समाकर देख मैं तेरा साया हूँ
हर जनम बुलाकर देख मैं तेरा साया हूँ

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

हमारा प्यारा गाँव

मैं
तुम
निकले
शहर को
तकता रहा
जाते युवाओं को
हमारा प्यारा गाँव.

मैं
तुम
रहते
शहर में
बाट जोहता
बूढ़ी सूनी आँखों
हमारा प्यारा गाँव.

सोमवार, 19 मार्च 2012

खुश रहती है वह

खुश रहती है वह, क्योंकि
खुश रहना उसकी आदत है
उसका स्वभाव है
उसकी जाति है
उसका धर्म है।

खुश रहती है वह, क्योंकि
ढूँढ लेती है खुशियाँ
प्रतिदिन के कामों में
जीवन की छोटी-छोटी बातों में
अपनी सकारात्मक सोच के साथ।

खुश रहती है वह, क्योंकि
वह किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखती
किसी से प्रत्युपकार नहीं चाहती
बस, बढ़ती जाती है अपने कर्तव्य पथ पर
निर्विकार, प्रसन्नचित्त।

और खुश रहती है निरन्तर!

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

जिंदगी मैं तेरे तराने लिख रहा हूँ

बीते पलों के अफ़साने लिख रहा हूँ।
जिंदगी मैं तेरे तराने लिख रहा हूँ॥
हालत कुछ यूँ कि वक्त काटे नहीं कटता,
वक्त काटने के बहाने लिख रहा हूँ॥
नदिया किनारे, पेड़ों की छाँव में,
देखे थे जो सपने सुहाने लिख रहा हूँ॥
हँसते-खेलते, अठखेलियाँ करते,
खूबसूरत गुज़रे ज़माने लिख रहा हूँ॥
धुंधली ना पड़ जाएँ यादें हमारी,
नयी कलम से गीत पुराने लिख रहा हूँ॥
जिसके गवाह थे वो झुरमुट, वो झाड़ियाँ,
तेरे-मेरे प्यार की दास्तानें लिख रहा हूँ॥

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नवल वर्ष तेरा अभिनन्दन हो!

नवल वर्ष तेरा अभिनन्दन हो!

नवल चेतना, नवल सृजन हो,
मंजुल मंगल परिवर्तन हो,
नवल वर्ष की मधुर छाँव में
पुलकित प्रमुदित जन-जीवन हो!
नवल वर्ष तेरा…………………(१)

नवल राह हो, नवल चाह हो,
नवल सोच हो, नव उछाह हो,
नवल भावना, नवल कामना
नवल कर्म, नव जागृत मन हो!
नवल वर्ष तेरा…………………(२)

नव गिरि-कानन, गगन नवल हो,
नवल पवन हो, चमन नवल हो,
मानवता की नवल पौध हो,
और नवल जीवन-दर्शन हो!
नवल वर्ष तेरा…………………(३)

- राजेश मिश्र

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

हिंद को बदलने की कसम हमने खाई है

भूख है, गरीबी है, दर्द है, रुसवाई है।
वोट से हिंद की जनता की ये कमाई है।
देश का पैसा गया स्विस बैंकी खातों में,
संसदी नदी में घोटालों की बाढ़ आई है।
खाकी हो, खादी हो, बेदाग कोई नहीं,
अख़बार और टीवी से तौबा है, दुहाई है।
दूध-घी नदारद हैं बच्चों की थाली से,
पिज्जा और बर्गर की पूछ है, पहुनाई है।
हम तो चुप ना रहेंगे, बोलेंगे, मुँह खोलेंगे,
हिंद को बदलने की कसम हमने खाई है।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

सरोज

मैं पुनि समुझि देखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥

प्राननाथ करुनायतन सुन्दर सुखद सुजान।
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥६४॥

श्रीरामचरितमानस का पाठ कर रही सरोज के कानों में अचानक सास की उतावली आवाज सुनाई दी - "अरे बहुरिया, अब जल्दी से ये पूजा-पाठ बंद कर और रसोई की तैयारी कर। दो-तीन घड़ी में ही बिटवा घर पहुँच जाएगा। अब ट्रेन के खाने से पेट तो भरता नहीं है, इसलिए घर पहुँचने के बाद उसे खाने का इंतजार न करना पड़े।" सरोज ने पाठ वहीं बंद कर दिया और भगवान को प्रणाम कर उठ गयी। शिवम को दूध देकर रसोई की तैयारी में लग गयी. आज भानू चार वर्षों के पश्चात् मुंबई से वापस आ रहा था।

भानू और सरोज का विवाह लगभग छः वर्ष पूर्व हुई था। दोनों साथ-साथ कॉलेज में पढ़ते थे और अपनी कक्षा के सर्वाधिक मेधावी विद्यार्थियों में से एक थे। पढ़ाई के दौरान ही एक दूसरे के संपर्क में आये और प्यार परवान चढ़ा। घरवालों ने विरोध किया तो भागकर शादी कर ली। इसी मारामारी में पढ़ाई से हाथ धो बैठे और जीवन में कुछ बनने, कुछ करने का सपना सपना ही रह गया। इस घटना के समय दोनों स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष में अध्ययनरत थे।

घर से भागने के लगभग पाँच-छः महीने पश्चात् दोनों के माता-पिता ने आपस में विचार-विमर्श किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि उनके कड़े रुख से बच्चों का जीवन और कष्टकारक ही होगा। अतः एक-दूसरे को अपना सम्बन्धी स्वीकार कर उन दोनों को समझा-बुझाकर किसी तरह से घर वापस ले आये। घर आने के लगभग सात महीने पश्चात् सरोज ने एक बड़े ही प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम शिवम रखा गया। शिवम के जन्म के पश्चात् भानू के सामने तमाम नए छोटे-बड़े खर्चे आने लगे, जिनके लिए रोज-रोज पिताजी से पैसा माँगना अच्छा नहीं लगता था। अतः बहुत सोच-विचार करने के पश्चात् उसने घर छोड़ने का निश्चय किया और अपने एक मित्र के पास मुंबई चला गया।

भानू बचपन से ही अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि तथा बातचीत में पारंगत था। जहाँ भी जाता था, अपनी बातों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता था। भगवान ने शारीरिक सुन्दरता भी दी थी। कुल मिलकर वह एक अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। मुंबई में उसे एक मल्टीनेशनल कम्पनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव का जॉब मिल गया। अपनी तीव्र बुद्धि और कड़ी मेहनत से कुछ महीनों में ही वह अपने सीनियर्स का चहेता बन गया और उसके प्रदर्शन को देखते हुए समय से पूर्व ही उसे प्रोमोशन मिल गया।

कमाई में बढ़ोत्तरी तथा खाने-पीने की समस्या  के कारण वह अपने परिवार को मुंबई बुलाना चाहता था। माँ से बात की तो माँ ने कहा कि गाँव में खेती-बारी और दादाजी की स्थिति को देखते हुए वह और पिताजी तो मजबूर थे, किन्तु वह चाहे तो सरोज को ले जा सकता था। बस क्या था, पहुँच गया अगले महीने सरोज और शिवम को लेने। किन्तु होनी को कुछ और ही स्वीकार था। घर पहुंचते ही उसकी सारी प्रसन्नता हवा हो गई। आस-पास की औरतों ने माँ को अच्छी तरह से समझा दिया था कि अगर एक बार बहू को बेटे के साथ रहने को भेज दिया, तो बेटे और बहू दोनों से हाथ धो बैठोगी। अतः माँ ने अपने स्वास्थ्य का बहाना कर सरोज को रोक लिया और भानू को मन मसोसकर अकेले वापस लौटना पड़ा।

मुम्बई पहुँचने के पश्चात् भानू हमेशा खोया-खोया रहने लगा। उसका मन खिन्न हो गया था। धीरे-धीरे घर पर फोन करना भी कम कर दिया। महीने, दो महीने में एक बार बात कर लेता था। शुरू-शुरू में शिवम की यादें उसे बेचैन कर देती थीं, लेकिन उसका आवेग भी अब कम हो गया था। खुश होने का कोई बहाना नहीं था। खोखली हँसी के पीछे से उदासी झाँकती रहती थी। उसका सतत उदास चेहरा सहकर्मियों को खटकने लगा। सबने समझाने की कोशिश की, किन्तु कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ।

दुखित मन, युवा शरीर और उस पर अकेलेपन का दर्द; थोड़ी सी भी सहानुभूति और प्यार मिलने पर बरबस खिंचा चला जाता है। उस पर यदि यह सहानुभूति और प्यार एक खूबसूरत लड़की से मिले तो...! 

इस घटना के कुछ महीनों के पश्चात् भानू की मुलाकात आस्था नामक एक लड़की से हुई। एक मीटिंग के दौरान दोनों संपर्क में आये और जान-पहचान कब दोस्ती से होते हुए प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला। आस्था बहुत ही खूबसूरत और तेज-तर्रार लड़की थी। एक दिन अचानक उसने भानू के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा और हत्प्रभ भानू ने बिना कुछ सोचे-समझे एक महीने का समय माँग लिया। लोग कहते हैं कि इश्क-मुश्क छुपाये नहीं छुपता। किसी तरह से भानू के घर वालों को यह बात पता चल गयी। माँ ने समझाने की कोशिश की, तो असर विपरीत पड़ा और अंततः भानू ने आस्था से शादी कर ली।अभागी, हतबुद्धि सरोज अचानक लगे इस झटके से उबर न सकी और इस सारे घटनाक्रम में मौन रही। वह समझ न सकी कि उसे किस अपराध का दंड मिल रहा है!

आस्था एक निहायत ही समझदार और सुलझी हुई लड़की थी। वह मुम्बई में ही पैदा हुई और पली-बढ़ी थी। स्कूली शिक्षा पूरी करके उच्च-शिक्षा के लिए लन्दन चली गयी थी। भानू से मिलने के कुछ महीनों पहले ही मुम्बई वापस लौटी थी। उसे पता न था कि भानू पहले से ही विवाहित है। जब पता चला तो पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी। वह अपने आपको अत्यन्त अपमानित और ठगी हुई महसूस करने लगी। लेकिन इससे भी बढ़कर उसके दिल पर यह बात बोझ बनकर बैठ गयी कि एक औरत होकर उसने अनजाने में ही सही, दूसरी औरत का सुहाग छीन लिया है और उस निरपराध को जीवन भर के लिए अँधेरे कुएँ में धकेल दिया है। अतः गर्भवती होते हुए भी उसने अपने माता-पिता से विचार-विमर्श करके भानू को तलाक दे दिया।

भानू की स्थिति अब बद से बदतर हो चली। निराशा और हताशा ने उसे चारों ओर से घेर लिया। घर लौटने की राह उसने स्वयं ही बंद कर दी थी। मुम्बई में उसके जानने वाले लोग उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगे। मान-प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी। हमेशा शराब के नशे में धुत रहने लगा। काम में मन नहीं लगता था और परफोर्मेंस दिन-प्रतिदिन खराब होती गयी। परिणाम यह हुआ कि नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। यह बात जब घरवालों को पता चली तो माँ ने पिताजी को अपनी कसम देकर किसी तरह से उसे वापस लाने पर सहमत कर लिया। आज पिताजी उसे मुम्बई से लेकर वापस आ रहे थे।

घर पहुँचने के पश्चात् सबसे दण्ड-प्रणाम कर ओसारे में माँ के पास सिर झुकाकर बैठ गया। किसी से भी आँख मिलाने की हिम्मत नहीं हुई। शिवम दूर से ही अजीब नजरों से देखता था, फिर भाग जाता था। माँ ने सिर पर हाथ फेरकर हालचाल पूछा तो अपराध-बोध से फफक-फफककर रो पड़ा। माँ ने समझा-बुझा कर शांत किया और कहा कि रोने से तो अब कुछ भी वापस नहीं आने वाला है, अतः आगे की सोचो। इन्हीं सब बातों में दिन बीत गया।

रात को अपने कमरे में कदम रखने के पहले उसने काफी सोच-विचार किया कि सरोज से किस तरह से क्षमा माँगे। जिस घड़ी की वह अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा था, अंततः वह आ गई। घर के कामों से निवृत्त होकर सरोज जब कमरे में आयी, तो भानू के हृदय की धड़कन बढ़ गयी। दोनों बहुत देर तक पलंग के अलग-अलग किनारों पर चुपचाप लेटे विचारों में खोये रहे। फिर भानू ने ही बातचीत प्रारंभ की तथा अपने किये पर लज्जित होते हुए सरोज से क्षमा माँगी और कहा कि भगवान ने उसके कर्मों का दंड उसे दे दिया है। सरोज ने कहा कि उसे क्षमा माँगने की आवश्यकता नहीं है। भानू के मन से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया। फिर उसने अपना हाथ सरोज के हाथ की तरफ बढ़ा दिया। इससे पहले कि वह अपना हाथ सरोज के हाथ पर रखता, सरोज ने झटके से अपना हाथ खींच लिय।  भानू उसके चेहरे की ओर देखने लगा, जो कि इस समय एकदम कठोर एवं भावहीन था। तभी सरोज ने ठन्डे लहजे में कहा - "यह आपका घर है, अतः आपके यहाँ रहने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि एक बूढ़े माँ-बाप को उनका बेटा वापस मिल जाएगा, जिसके लिए वे दिन-रात आँसू बहाया करते थे। शिवम को भी मैं पिता के प्यार से वंचित नहीं करना चाहती। किन्तु, कृपा करके आप मुझे स्पर्श करने की चेष्टा मत कीजियेगा। अब आप मेरे लिए पर-पुरुष हैं और मैं जीते-जी अपने पति के अलावा किसी और पुरुष को अपना शरीर छूने की अनुमति नहीं दे सकती। आपके साथ इस कमरे में मैं केवल इसलिए हूँ, ताकि उन तीनों की ख़ुशी में खलल न पड़े।"

भानू अवाक् सरोज का मुँह ताकता रहा। उसे एक दुखद, एकाकी, घुटन से भरा हुआ भविष्य आगे दिखाई दे रहा था। यही उसकी सजा थी. यही उसका पश्चात्ताप था।

- राजेश मिश्र

रविवार, 21 नवंबर 2010

अहमद चाचा

लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और जैसे-जैसे विमान आसमान की ऊँचाई की ओर बढ़ता गया, वह आस-पास के वातावरण से बेसुध अतीत में मग्न होता चला गया. माँ की ममता, पिताजी का प्यार, मित्रों के साथ मिलकर धमाचौकड़ी करना, गाँव के खेल, नदी का रेता, हरे-भरे खेत, अनाजों से भरे खलिहान और वहां कार्यरत लोगों की अथक उमंग, तीज त्यौहार की चहल-पहल आदि ह्रदय को रससिक्त करते गए.

गाँव के खेलों की बात ही कुछ और है. चिकई, कबड्डी, कूद, कुश्ती, गिल्ली-डंडा, लुका-छिपी, ओल्हा-पाती, कनईल के बीज से गोटी खेलना, कपड़े से बनी हुई गेंद से एक-दूसरे को दौड़ा कर मारना आदि-आदि. मनोरंजन से भरपूर ये स्वास्थ्यप्रद खेल शारीरिक और मानसिक उन्नति तो प्रदान करते ही हैं, इनमें एक पैसे का खर्च भी नहीं होता है. अतः धर्म, जाति, सामाजिक-आर्थिक अवस्था से निरपेक्ष सबके बच्चे सामान रूप से इन्हें खेल सकते हैं.

इन सबसे अलग एक सबसे प्यारी चीज़ थी जिसके लिए वह वर्षों व्याकुल रहा, वह थे अहमद चाचा. हिन्दुओं के इस गाँव में एक अहमद चाचा का ही परिवार मुस्लिम समुदाय से था. लेकिन उनका कहना था कि आज पचपन वर्ष की उम्र हो जाने तक भी उन्हें इस बात का कभी अहसास भी नहीं हुआ था. होली, दीवाली, ईद, बकरीद सबके साथ ही मनाते थे. पाँच वक्त के नमाज़ी थे, किन्तु गाँव में कहीं भी भजन-कीर्तन हो, उनकी उपस्थिति अनिवार्य रहती थी.

अहमद चाचा के दादाजी श्याम के गाँव से दो कोस दूर स्थित शाहपुर नामक गाँव के बाशिंदे थे. उनकी तीन बीवियों से सात पुत्र तथा तीन पुत्रियाँ थीं. अहमद चाचा के वालिद हुसैन मियाँ उनकी सबसे छोटी बीवी की पहली संतान थे. उन्होंने परिवार-समाज सबसे बगावत कर गाँव के ही एक दलित युवती से शादी कर ली और परिणामतः  घर से निकाल दिए गए. कहीं शरण नहीं मिली. श्याम के दादाजी को पता चला तो उन्होंने दो बीघे ज़मीन, घर बनाने के लिए थोड़ी सी जगह और तीन-चार पेड़ का एक छोटा सा बागीचा देकर उन्हें अपने गाँव में ही बसा दिया. हालाँकि कुछ लोगों ने विरोध अवश्य किया था, किन्तु धीरे-धीरे सब शान्त हो गया और हुसैन मियाँ ने अपनी व्यवहारकुशलता से सबके दिलों में जगह बना ली.

अहमद चाचा उनकी एकमात्र सन्तान थे और बचपन से ही अपने वालिद के साथ श्याम के खेत-खलिहान का कारोबार देखते थे. श्याम के पिताजी हर एक कार्य में उनसे विचार-विमर्श अवश्य करते थे. श्याम का बचपना उनके बाँहों के झूले में ही व्यतीत हुआ था. वह जैसे ही उन्हें देखता था, दौड़कर उनकी गोदी में चढ़ जाता था और दोनों हाथ से उनकी दाढ़ी सहलाने लगता था. कभी-कभी वह अपनी दाढ़ी प्यार से श्याम के चेहरे पर रगड़ देते थे और वह चिल्ला उठता था.

अहमद चाचा के कुल पाँच औलादें हुईं जिनमें से तीन पुत्रियाँ और दो पुत्र थे. पुत्रियों की शादी हो गई और वे अपने-अपने घर चली गयीं. छोटा लड़का दसवीं में पढ़ रहा था, जब साँप के काटने से उसकी मृत्यु हो गयी. अब परिवार में अहमद चाचा के अलावा उनका बड़ा लड़का असलम, उसकी बीवी तथा दो बच्चे थे. असलम ने श्याम के पिताजी की सहायता से पास के बाज़ार में फर्नीचर की एक दुकान खोल ली थी, जो अब काफी अच्छी चलने लगी थी.

दिल्ली के इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर उतरने के पश्चात् ट्रेन पकड़कर श्याम दूसरे दिन अपने गाँव पहुँचा. पिताजी पास के गाँव में एक मित्र की लड़की की शादी में गए हुए थे, इसलिए कार लेकर ड्राईवर अकेला ही स्टेशन पर आया हुआ था. घर पहुँचते ही अम्मा उसे गले लगाकर फफक-फफककर रो पड़ीं. श्याम की आँखों से भी आँसुओं की धारा बह चली. कितना तड़पा था वह इस प्यार और दुलार के लिए!

कुछ देर के पश्चात् जब बातचीत का सिलसिला थमा और वह नहा-धोकर, चाय पीकर घर से निकलने लगा, तो अम्मा ने पूछा - "अरे! आते ही खाना-पीना खाए बिना किधर को निकल पड़े? अभी खाना खाकर आराम कर लो, फिर शाम को सबसे मिलना."

श्याम ने कहा - "अभी आधे घंटे में अहमद चाचा से मिलकर आ रहा हूँ, फिर खाना खाऊंगा."

अम्मा का चेहरा अचानक सफ़ेद पड़ गया. श्याम किसी अनहोनी की आशंका से दहल गया. अम्मा के चेहरे को ध्यान से देखते हुए पूछा - "क्या हुआ? सब ठीक तो है न? अहमद चाचा मुझे लेने के लिए स्टेशन भी नहीं गए थे और यहाँ भी कहीं नहीं दिख रहे हैं. उनकी तबियत तो ठीक हैं न?"

अम्मा के मुँह से बोल नहीं फूटे. उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी. श्याम के ह्रदय की धड़कन बढ़ गयी, हाथ-पाँव काँपने लगे. मन कड़ा करते हुए उसने फिर पूछा - "अम्मा, तुम बोलती क्यों नहीं? क्या हुआ अहमद चाचा को?"

अम्मा ने रोते हुए धीरे से कहा - "अहमद मियाँ अब नहीं रहे."

श्याम के पैरों तले से जैसे ज़मीन खिसक गयी हो. उसके ह्रदय पर वज्राघात सा हुआ. वह धम्म से ज़मीन पर बैठ गया. निश्चल, निर्विकार, स्तब्ध सामने की दीवार को घूरता रहा. अम्मा के बार-बार झकझोरने और बुलाने पर उसकी ख़ामोशी टूटी. फिर रोते हुए पूछा - "कैसे हुआ?"

अम्मा ने बतलाया - "तुम्हारे लन्दन जाने के कुछ दिनों पश्चात् ही असलम और उसकी बीवी से उनका झगड़ा शुरू हो गया था. वे दोनों कहते थे कि हिन्दुओं के इतने बड़े गाँव में अकेला मुस्लिम परिवार होने की वजह से वह लोग सुरक्षित नहीं हैं. अतः यहाँ की ज़मीन-जायदाद बेचकर किसी मुस्लिम गाँव में जाकर रहना चाहते थे. असलम के ससुराल वाले भी दोनों को इस बात के लिए उकसा रहे थे. किन्तु अहमद मियाँ जिद पर अड़े थे कि जिस माटी से पैदा हुए, उसी में दफ़न होंगे. उनका कहना था कि उनके वालिद साहब की और उनकी उम्र इसी गाँव में गुज़र गयी. इतने सालों में किसी ने उन्हें अहसास तक नहीं होने दिया कि वे मुसलमान हैं. उनके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं किया गया. गाँव के किसी भी सम्मानित हिन्दू से कम उनकी इज्ज़त नहीं होती है. फिर अचानक यह हिन्दू-मुसलमान का मसला कहाँ से आ गया और असुरक्षा की बात कहाँ से आ गयी? दो-तीन साल तक यह झगड़ा चलता रहा. तभी अचानक एक दिन पता चला कि अहमद मियाँ ने ज़हर खाकर ख़ुदकुशी कर ली है. लेकिन गाँव के अधिकांश लोगों का मानना है कि असलम और उसकी बीवी ने ही उनको ज़हर दिया था."

"और अब असलम कहाँ है?" - श्याम ने पूछा.

"अपने ससुराल के गाँव में कुछ ज़मीन खरीदी है, वहीँ रह रहा है." - अम्मा ने बताया.

"उनकी ज़मीन?" - श्याम की आँखों से बहने वाली अश्रुधारा तेज हो गयी.

"वैसे ही पड़ी है." - अम्मा का जवाब था. "गाँव के लोगों ने न तो खुद खरीदा और न ही किसी और को खरीदने दिया."

श्याम के ह्रदय पर मानों कोई पत्थर रख दिया गया हो. वह लड़खड़ाते हुए क़दमों से अपने कमरे की ओर चल पड़ा. गाँव आने की सारी ख़ुशी जाती रही. उसकी हालत उस वणिक के जैसी हो गयी थी जो व्यापर में अपना मूलधन गवाँकर खाली हाथ घर लौटा हो.

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीये तो रोज जलते हैं, फिर दीपावली क्यों?

दीये तो रोज़ जलते हैं,
फिर दीपावली क्यों?
इस एक दिन के लिए,
इतनी प्रसन्नता/इतनी उतावली क्यों?

हाँ, दीये तो रोज़ जलते हैं,
किन्तु, अकेले
सुदूर, कोने में कहीं
सिमटे हुए
एक-दूसरे से अलग
भयानक अँधेरे में घुटते हुए
पल-पल क्षीण होती रोशनी के साथ
अन्त की ओर अग्रसर
दूसरों को प्रकाशित करने की कोशिश में
स्वयं बुझते हुए
जहाँ नहीं पहुंचता है
एक दीये का प्रकाश दूसरे दीये तक
अकेले जलते हैं, अकेले ही बुझ जाते हैं
बिना अपनी कोई पहचान छोड़े
बिना अपना कोई निशान छोड़े
दफ़न हो जाते हैं अतीत के गर्त में
खो जाते हैं इतिहास के पन्नों में

पर इस एक दिन
जलते हैं सारे दीये साथ-साथ
एक-दूसरे को प्रकाशित करते हुए
एक-दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होते हुए
इस जहाँ को जगमगाते
हर घर/गाँव/समाज/देश से
अँधेरे को भगाते
जलते हैं एक साथ
और जीत जाते हैं
काले घनघोर अँधेरे से

आइये, हम भी साथ खड़े हों, साथ चलें
साथ बढ़ें, साथ लड़ें
मानवता की जंग
विजय हमारी ही होगी
फिर चारों ओर होगा
अमन का उजियारा
चारों तरफ होगी सुख-शांति/
प्रेम और सद्भाव
सारे भेद-भाव भूलकर
मानवता मानवता को गले से लगा लेगी,
वही सच्ची दीवाली होगी!
वही सच्ची दीवाली होगी!!
वही सच्ची दीवाली होगी!!!

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

जड़ और चेतन

श्रांत/क्लांत/निश्चल
दरवाजे के चौखट पर बैठीं
अम्मा!
निर्निमेष भाव से
एकटक
देखे जा रही थीं
कड़क/तपती/खड़ी दुपहरी में तपते
किन्तु, छाया प्रदान करते
टिकोरों से लदे हुए
अमोले को।

निश्चय किया था
उन्होंने और पिताजी ने
रोपेंगे एक वृक्ष
अपने पुत्र के जन्म के मौके पर;
और रोपा था इस अमोले को
अपने एकमात्र पुत्र के जन्म के समय।

इस तरह
जन्म दिया था दो पुत्रों को
एक जड़;
एक चेतन!

दोनों बढ़े
विकसित हुए
स्वावलम्बी हुए।

जड़ अभी भी वहीं खड़ा है
चुपचाप
तपती/चिलमिलाती धूप में
शीतल छाया प्रदान करता;
अम्मा-पिताजी के परिश्रम का/
प्रेम और वात्सल्य का/
त्याग का
प्रतिफल प्रदान करता।

और चेतन...?

खो गया है कहीं
दुनिया की भीड़ में
उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर
आधुनिकता का हाथ थामे हुए
पुरातन सोच/
पुरातन परम्पराओं से
पीछा छुड़ाकर,
विवश बुढ़ापे को
अकेलापन/घुटन देकर
खो गया है कहीं
हमारा चेतन!

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

हम भारतीयों के भी बड़े ठाट होते हैं

हम भारतीयों के भी
बड़े ठाट होते हैं,
बारह चार की गाड़ी को पहुँचने में
बारह आठ होते हैं।
समय से कहीं भी
हम नहीं पहुँचते,
देर से पहुँचना/प्रतीक्षा करवाना/दूसरों का समय नष्ट करना
बड़प्पन की निशानी समझते॥

अपना लिया है हमने
पाश्चात्य गीत/संगीत/नृत्य/
भाषा-बोली/खान-पान/रहन-सहन,
किन्तु, नहीं अपना सके
उनकी नियमितता/राष्ट्रीयता/अनुशासन।

करते हैं आधुनिकता का पाखण्ड,
भरते हैं उच्च सामाजिकता का दम्भ;
कहते हैं हमारी सोच नई है,
किन्तु, मानवता मर गई है!

भूलते जा रहे हैं
अपनी उत्कृष्ट
सभ्यता/संस्कृति/संस्कार/स्वाभिमान/
माता-पिता-गुरु का
मान-सम्मान/
गाँव/समाज/खेत/खलिहान/
देशप्रेम/राष्ट्रसम्मान!

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर
अपनी बात कहने का
साहस नहीं कर पाते हैं,
गली-नुक्कड़ पर भाषणबाजी करते
जाति-धर्म के नाम पर
लोगों को भड़काते/आग लगाते हैं।

नहीं समझते हैं कि
कश्मीर/लेह/लद्दाख दे देने में
नहीं है कोई बड़ाई,
यह कोई त्याग नहीं है
यह तो है कदराई।

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है
समय है, सँभल जाओ;
अरे वो सुबह के भूले बुद्धू
शाम को तो घर आओ!

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

मैं नारी हूँ !

मैं नारी हूँ !

विधाता की अनुपम सृष्टि/
ममतामयी दृष्टि/
भावनाओं की वृष्टि।

मैं जीवनदायिनी
पालक/पोषक हूँ,
सारे दुखों की
अवशोषक हूँ ।

प्रेम की
परिभाषा हूँ,
ज्ञानियों की
जिज्ञासा हूँ,
थकित मन की
आशा हूँ,
कामुक तन की
अभिलाषा हूँ ।

साक्षात दुर्गा हूँ
काली/लक्ष्मी/पार्वती
वीणावादिनी हूँ मैं,
मोहिनी/रम्भा/मेनका
कामायिनी हूँ मैं ।

भक्तों की
भक्ति हूँ मैं,
प्रकृति की
सृजन-शक्ति हूँ मैं ।

मैं नारी हूँ !

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

गाँधीजी को एक संक्षिप्त रिपोर्ट

गाँधी तेरे देश का, हो गया बंटाधार।
जित देखो तित व्याप्त है, झूठ और भ्रष्ट्राचार॥
झूठ और भ्रष्ट्राचार, द्वेष, हिंसा, बेईमानी,
शहर-गाँव की बाबा तेरे यही कहानी॥
खूनी हो गई खाकी, चोर हो गई खादी,
बंटाधार हो गया तेरे देश का गाँधी॥

बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है

भैया! हाल-चाल कैसा है?  बाबू! सब कुछ ठीक-ठाक है।। आय अठन्नी, खर्च रुपइया  बरसों पहले ब्याई गइया दूध उठौना ही आता है  काम चाय का चल जाता है  ...