रविवार, 10 अक्टूबर 2010

जय माँ अम्बे!

मेरे मन के अंध तमस में ज्योतिर्मय उतरो ||
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

नहीं कहीं कुछ मुझमें सुंदर,
काजल सा काला सब अन्दर |
प्राणों के गहरे गह्वर में करुणामयि उतरो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

नहिं जप-योग, न यज्ञ प्रबीना,
ज्ञानशून्य मैं सब विधि हीना |
ज्ञानचक्षु जागृत कर अम्बे जगमग जग कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

जीवन की तुम एक सहारा।
शक्ति स्वरूपा जगदाधारा।
नवजीवन नवज्योति भरो माँ पापमुक्त कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी। सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।।  चाहे जितना भी थकती हूँ, पर अविरल बहती रहती हूँ। प...