मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

अब तो दरस दिखाओ मेरी मैया

अब तो दरस दिखाओ मेरी मैया।

प्यासे नयन तकें बरसों से ,
आकर प्यास बुझाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

हरि-हर-ब्रह्मा, सुर-मुनि सेवें,
सेवा भाव जगाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

कनक कलेवर, लाल चुनरिया,
माँग सिंदूर सजाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

टीका, कुण्डल, मोती सोहे,
चंद्रवदन दरसाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

पुष्प- हार, असि-खप्पर धारी,
सिंह चढ़ी चलि आओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

रक्तबीज, महिषासुर घाती,
स्वजन कृपा बरसाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

काम, क्रोध, मद, लोभ, शोक सँग,
मत्सर, मोह मिटाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

 - राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

आओगे जब तुम रामलला

आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।
नयनन से नीर बहायेंगे, अँसुवन जल चरण पखारेंगे।।

हम रुचि-रुचि भोग लगायेंगे,
अपने हाथों से खिलायेंगे,
जब थककर तुम सो जाओगे,
हम बैठे चरण दबायेंगे।
तुम सोओगे, हम जागेंगे, अपलक प्रभु तुम्हें निहारेंगे।
आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।।

तेरा पूजन, तेरा वन्दन,
पल-पल प्रभु तेरा ही चिन्तन,
तन में भी तुम, मन में भी तुम,
तेरा ही जग में अभिनन्दन।
चलते फिरते सोते-जगते, प्राणों में तुम्हीं को धारेंगे।
आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।।

बस यही अनुग्रह कर देना,
निज चरणों में आश्रय देना।
जब भूल कभी हो जाये तो,
मत चरण-शरण से तज देना।
तुम अवसर देना प्रभु हमको, हम आपनी भूल सुधारेंगे।
आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।।

- राजेश मिश्र

ठुमुकि चलत रघुराई

ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
आनंद मन न समाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

गिरत उठत पुनि-पुनि प्रभु धावत
भागत दूर निकट फिरि आवत
किलकत हँसत ठठाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

रुकत झुकत घुटनन से झाँकत
करत ठिठोली मातहि ताकत
अद्भुत करें लरिकाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

नृप दसरथ सब भाँति निछावर
निरखि-निरखि पुलकित प्रिय रघुबर
गुड़ गूँगा ज्यों खाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 17 जनवरी 2024

राम भजो मन

राम ही सत् हैं, राम ही चित् हैं
राम ही घन आनन्द हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

राम सगुण हैं, राम ही निर्गुण,
निराकार साकार हैं।
राम ही ब्रह्मा, राम ही विष्णु,
राम ही शिव अवतार हैं।
राम ही सोम, सूर्य अरु अग्नि 
वायु, वरुण अरु इन्द्र हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

राम ही धरती, राम गगन हैं,
राम ही चौदह लोक हैं।
राम ही चेतन कण-कण में हैं,
राम ही हर आलोक हैं।
राम ही स्वर हैं, राम ही लय हैं,
राम ही ताल और छन्द हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

राम ही प्राण हैं, त्रिविध शरीर हैं,
पञचकोश भी राम हैं।
राम ही चित्त हैं, राम ही मन हैं,
बुद्धि-अहं भी राम हैं।
राम ही भोग हैं, राम ही योग हैं,
राम जीव हैं, ब्रह्म हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

- राजेश मिश्र

राम घर आये हैं

प्रेम-रस सराबोर सब अङ्ग,
नयन जल छाये हैं।
राम घर आये हैं।।

अवध में अद्भुत है आनन्द,
बज रहे ढोलक झाल मृदङ्ग,
चहूँ दिशि बिखरे नाना रङ्ग,
नारि-नर नाचें भरे उमङ्ग,
देखि लक्ष्मण सीता प्रभु सङ्ग,
हृदय हर्षाये हैं।
राम घर आये हैं।।१।।

सुशोभित सुरभित बंदनवार,
डगर पर फूलों की भरमार,
चौक पूरे हैं हर घर-द्वार,
गगन में गूँजे मङ्गलचार,
देखने अनुपम दृश्य अपार,
देव-मुनि धाये हैं।
राम घर आये हैं।।२।।

प्रजा जन छोड़ सकल संसार,
जुटे हैं भव्य राम-दरबार,
भरे आँखो में स्नेह अपार,
परम प्रभु रूप अनूप निहार,
विकल हो‌ सारे हृदयोद्गार,
दृगों से ढाये हैं।
राम घर आये हैं।।३।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 जनवरी 2024

कहाँ हैं रामलला?

कर सोलह श्रृंगार, अयोध्या अपलक डगर निहार
कहां हैं रामलला?
आनंद अपरंपार, बहे नयनों से अविरल धार
कहां हैं रामलला?

सदियों लड़कर शुभ दिन आया
हर्षोल्लास लोक तिहुँ छाया
घड़ी मिलन की अब आई है
सिहरन सी तन में छाई है

वाणी है लाचार, धड़कती छाती बारंबार,
कहां हैं रामलला?
कर सोलह श्रृंगार, अयोध्या अपलक डगर निहार
कहां हैं रामलला?

झलक दिखी रघुवर सुजान की 
कृपायतन करुणानिधान की
श्याम गात पर पीताम्बर की
नरकेशरि की, कर धनु-शर की

अमित अनंत अपार, छटा लखि लज्जित सकुचित मार
कहां हैं रामलला?
कर सोलह श्रृंगार, अयोध्या अपलक डगर निहार
कहां हैं रामलला?

राम अयोध्या सम्मुख आये
पुलक गात कुछ कहि नहिं जाये
देखि अलौकिक छवि अति न्यारी
तुरत अयोध्या भई सुखारी

भेंटी भर अँकवार, रहा सुख का नहिं पारावार
विराजो रामलला।
कृपासिन्धु सरकार, करो सबके दुख का निस्तार
हमारे रामलला।।

- राजेश मिश्र

दरस दिये रघुराई

दरस दिये रघुराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।
मनहिं मनहिं मुसुकाई, हृदय गति कहि नहिं जाई।।

रूप सलोना सोहत ऐसे
कोटिक काम खडे हों जैसे
भाल तिलक सिर मुकुट बिराजे
कण्ठ माल पीताम्बर साजे

निरखि कलुष मिटि जाई, हृदय गति कहि नहिं जाई।
दरस दिये रघुराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।।

बड़भागी प्रभु दरसन पाया
जनम-जनम का पाप गँवाया
नेह कमल चरणन रज लागा
चंचरीक ज्यों पदुम परागा

सब सुधि-बुथि बिसराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।
दरस दिये रघुराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 13 जनवरी 2024

आये राघव सरकार

आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।
करने निज जन उद्धार, मङ्गल गान करो।।

नील सरोरुह श्यामल सुन्दर।
पूरणकाम राम सुख सागर।।
चिदानन्द सत् पुरुष परात्पर।
षड्विकार तम पुञ्ज दिवाकर।।

परब्रह्म सगुण साकार, मङ्गल गान करो।
आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।।

निरख-निरख प्रभु-छवि अति पावनि।
जन-मन रञ्जनि ताप नसावनि।।
जगजननी की शोभा न्यारी।
पुलक गात झूमें नर-नारी।।

मन मुदित सकल संसार, मङ्गल गान करो।
आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।।

मर्यादा पुरुषोत्तम आये।
धर्म-ध्वजा चहुँ-दिशि फहराये।।
वेद-शास्त्र सब भये सुखारी।
गावें प्रभु की महिमा न्यारी।।

गूँजे है मन्त्रोच्चार, मङ्गल गान करो।
आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।।

- राजेश मिश्र

अइलं अवध रघुराई

अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।
सुर-नर-मुनि हरषाई, नगर-घर बाजे बधाई।।

रामजी अइलं, लछिमन अइलंऽ
देखि सिया के नयन जुड़इलंऽ
भरत मिलेलं हहाई, नगर-घर बाजे बधाई।
अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।।

लखन-सहोदर मगन निहारंऽ
ढरकत अंसुवन चरण पखारंऽ
सब सुधि-बुथि बिसराई, नगर-घर बाजे बधाई।
अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।।

भई उर्मिला-गति बावरि सी
चउदह बरस की अंखियां तरसीं
हरषित तीनों माई, नगर-घर बाजे बधाई।
अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

राम जी आयेंगे

रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।
रख ले नयनों में नीर, राम जी आयेंगे।।

आयेंगे जी भरकर रोना
अँसुवन से चरणों को धोना
हर लेंगे सारी पीर, राम जी आयेंगे।
रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।।
 
भक्ति भाव भोजन करवाना
कोमल शय्या उन्हें सुलाना
वन कठिन सहन की भीर, राम जी आयेंगे।
रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।।

प्रणतपाल दुखभंजन रघुबर
बरसायें नित नेह जनन पर
कृपासिन्धु मतिधीर, राम जी आयेंगे।
रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।।

- राजेश मिश्र।

आज राम घर आयेंगे

द्वार-देहरी दीप जलाओ 
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

पावन-पुरी अवध है हर्षित,
हर्षित भारत सारा है;
है हर्षित हर हिन्दू तन-मन,
प्रेम-गङ्ग हिय धारा है।
हिल-मिल सारे नाचो-गाओ
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

हर नारी है माँ कौशल्या
सुत की अपने राह तके;
हर नर में फिर जीवित दशरथ
राम दरश हित नैन थके।
बूढ़ी आँखों पलक बिछाओ
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

प्रिय हनुमत सन्देशा लाये
प्रभु बस आने वाले हैं;
भरत-रिपुदमन की हर पीड़ा
आज मिटाने वाले हैं।
शान्ता दीदी! थाल सजाओ
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 14 नवंबर 2020

आओ मिलकर दीप जलाएं ।।

आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

हर जन हों खुशहाल यहाँ पर, 
हर मन का अवसाद मिटाएँ ।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

हर कोने से भगे अँधेरा,
हर कोने में जगे उजाला ।
ज्ञान-प्रकाश चहूँ दिशि फैले,
हर हिय भरा प्रेम का प्याला ।।

ऐसी ज्योति जले जग जगमग,
छवि बिलोकि रवि कोटि लजाएँ ।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

भूखे पेट न सोए हरिया,
हर तन कपड़ा, हर मन शिक्षा । 
बिटिया निकले जब जी चाहे, 
बचपन कहीँ न माँगे भिक्षा ।।

घर-घर में पलतीं हों खुशियाँ , 
हम ऐसा इक राष्ट्र बनाएँ ।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

कोविड-19 : चुनौती और अवसर

 आप सभी को सादर नमन!

आज पूरी दुनिया के साथ हमारा देश भी विषाणु जनित एक भयंकर बीमारी से जूझ रहा है। कोविड-19 नामक एक नए कोरोना वायरस से उत्पन्न इस अत्यंत संक्रामक रोग का अभी तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है जो इस दुसाध्य रोग  की भयावहता को असीमित कर देता है। दुनिया के तमाम विकसित देशों की उच्चतम कोटि की चिकित्सकीय सुविधाएं भी इसके सम्मुख बेबस खड़ी है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के अनेक अनेक देशों को इतना असहाय और लाचार शायद ही किसी ने कभी देखा हो। अरबों लोग अपने घरों में कैद हैं। मंगल विजय से दर्पित सूर्य तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा लिए हुए आधुनिक विज्ञान की छत्रछाया में अग्रसर होता मनुष्य एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु के भय से अपने ही घर के दरवाजे से बाहर नहीं निकल पा रहा है। उसकी सारी गतिशीलता समाप्त होती जा रही है। मानों सारा चेतन जड़ होता जा रहा है।

सारा चेतन जड़ होता जा रहा है? क्या  सचमुच? क्या घरों से बाहर निकलना ही चेतनता है या फिर भागते पैर और थिरकते कदम? हमारे शरीर का गतिमान होना ही चेतनता है या विकास की अंधी दौड़ में अपने-पराए को रौंदते हुए आगे बढ़ जाना? अपनी  संस्कृति, परंपरा, मूल्यों और धरोहरों के प्रति उपेक्षा या तिरस्कार चेतनता है या फिर अपनी, अपने पत्नी और बच्चों की असीमित विलासिता पूर्ण लालसाओं की पूर्ति के लिए मां-बाप की मूलभूत आवश्यकताओं की बलि चढ़ा देना? पशुओं जैसी निरंकुशता, उद्दंड स्वेच्छाचारिता, निर्लज्ज नग्नता तथा अनियमित और अमर्यादित संभोग चेतनता है या फिर पैसों से बनते-बिगड़ते सामाजिक संबंध? मुझे तो लगता है कि वह चेतना तो कब की मर चुकी है। आज हमने अनेकानेक अनावश्यक आभासी बंधनों में अपने आप को जकड़ रखा है जिनसे बाहर निकलना अत्यंत मुश्किल है क्योंकि हमें इसका पता भी नहीं है। जैसे जीव इस संसार को ही सत्य मानकर उसी में भ्रमित होता रहता है वैसे ही हम इन अदृश्य एवं आभासी बंधनों में बंध कर इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमें अपनी मौलिकता का कोई ज्ञान ही नहीं रह गया है। हमारा स्वस्थ एवं मौलिक चिंतन मृतप्राय हो गया है और हमारी चेतना - वह तो कब की जड़ हो चुकी है।

कोविड-19 से फैली यह बीमारी निसंदेह एक दुर्जेय आपदा है जिसका सामना संपूर्ण मानव समुदाय को साथ मिलकर करना होगा। अन्य देशों द्वारा की गई या की जा रही गलतियों से सबक लेते हुए भारत सरकार ने उत्कृष्ट दूरदर्शिता का परिचय दिया तथा बहुत पहले से ही उसने युद्ध स्तर पर तैयारियां प्रारंभ कर दीं जिसके परिणाम स्वरूप अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में इसका संक्रमण तेजी से नहीं होने पाया। अगले चरण में इसकी भयानक विभीषिका को प्रारंभिक स्तर पर ही उन्मूलित  करने हेतु पहले जनता कर्फ्यू, अगले ही दिन जिला और राज्य स्तर पर लॉकडाउन तथा अंततः पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा करके सरकार ने अत्यंत दूरदर्शिता एवं दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया है और अवश्यंभावी विजय-पथ पर अपना कदम बढ़ा दिया है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, महानगरपालिकाएं, नगरपालिकाएं, चिकित्सा विभाग, पुलिस, मीडिया तथा अन्य अनेक विभागों के कर्मचारियों के साथ-साथ अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं और व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग इस लड़ाई की अगली पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व कर रहे हैं। उन्हें शत-शत नमन! कोटिशः प्रणाम!

निर्विवाद रूप से यह संपूर्ण विश्व और मनुष्य समाज के लिए एक बहुत ही बड़ी चुनौती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य ने इससे बड़ी और भयानक चुनौतियों का सामना किया है तथा विजय भी पाई है। इस चुनौती पर भी हम अंततः विजय पा ही लेंगे। लेकिन  उसके पूर्व इसके कारण यह जो विनाश हो रहा है और जो विनाश होगा, उसकी तो अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। साथ ही समाज और अर्थव्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव पूरी दुनिया को झकझोर  कर रख देगा। हमें उस आगामी विभीषिका का पूरी ताकत से मुकाबला करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार रहना होगा तथा सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए इस आपदा से उबरने में उसका तन-मन-धन से सहयोग करना होगा और तमाम आलोचनाओं एवं विरोधी टिप्पणियों की भरमार के बीच कदम-कदम पर उसके साथ मजबूती से खड़े रहना होगा।

 इतिहास गवाह है कि हमारे समक्ष जितनी बड़ी चुनौती आती है उतनी ही बड़े समाधान की आवश्यकता होती है। और यह हमें उतनी अधिक संभावनाएं और उतना ही बड़ा अवसर प्रदान करती है। क्योंकि यह एक बड़ी चुनौती है अतः जाते-जाते यह हमें एक लंबी छलांग लगाने के लिए उतना ही बड़ा अवसर और प्टलेफॉर्म प्रदान करेगी। हमें इस समय सारी दुश्चिंता को भूलकर उस आने वाले अवसर के बारे में सोचना चाहिए। यह जो लॉक डाउन का समय है और जिसके बारे में "कैसे कटेगा" सोचकर अधिकांश लोग हलकान हो रहे हैं, अत्यंत अनमोल है। प्रकृति ने हमें एक मौका दिया है चिंतन करने का, रुक कर पीछे झांकने का और देखने का कि हम जिस दिशा में जा रहे हैं वह सही है या नहीं? सोचने का कि इस आपा-धापी में हम जो पीछे छोड़ आए हैं उसे पुनः कैसे प्राप्त किया जा सकता है? शांतचित्त होकर मनन करने का कि आगे का रास्ता जिस मंजिल की ओर जाता है वह हमारी भावी पीढ़ी के लिए सही है या नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि तेजी से आगे बढ़ने के चक्कर में हम सही राह से भटक गए हैं और अपनी अनमोल चीजों से दूर होते जा रहे हैं?

 अंततोगत्वा इस कठिन समय में देश की संपूर्ण जनता को साथ खड़े देखकर आंखें खुशी से भींग जाती हैं। इस राष्ट्र और समाज को एकजुट करने के लिए जो प्रयास हमारे कुछ महापुरुष एवं स्वयंसेवी संस्थाएं वर्षों से करती चली आ रही है तथा जिसके लिए उन्होंने अनगिनत बलिदान दिए हैं, उसे 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात एक नया आयाम मिला और आज इस विपत्ति के समय में उसका मूर्त रूप देखकर छाती छप्पन इंच की हो जाती है। हां, कुछ पप्पुओं-गप्पुओं को इससे अलग रख सकते हैं जो खुद घोड़ी नहीं चढ़ सके इसलिए दूसरे घुड़सवारों पर पत्थर फेंकते रहते रहते हैं। जयचंद तो हर युग में हुए हैं लेकिन वर्तमान सरकार और इसकी भावी पीढ़ी के पास उनका अचूक इलाज है। 

एक बार पुनः आप सभी का वंदन और अभिनंदन! 

- राजेश मिश्र

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

यादों के झरोखों से

कर्मरत इस थकित मन ने,
ज्यों तनिक विश्राम पाया।
मौन ज्यों मुखरित हुआ अरु
सलिल सुरभित कुनमुनाया।
ज्यों झुकीं पलकें दृगों पर
ज्यों तिमिर आँखों में आया।
खोल खिड़की स्मृति-पटल की
बिम्ब तेरा झिलमिलाया।।

याद फिर आने लगे वो
प्यार के मौसम सुहाने।
झूमतीं गातीं हवाएँ
वो मधुर मीठे तराने।
खिलखिलाती-सी चहकती
चन्द्रिमा के वो फसाने।
मिलन के मासूम-से वो
स्नेह में लिपटे बहाने।।

देखना, पलकें झुकाना,
पर नहीं कुछ बोल पाना।
साथ रहना, कुछ न कहना,
किन्तु कब प्रिय दूर जाना?
दिवस हो या हो निशा, कब
चैन किंचित कौन पाया?
खोल खिड़की स्मृति-पटल की
बिम्ब तेरा झिलमिलाया।।१।।

जब कभी भी तुम गुजरती
कृष्ण केशों को उड़ाती।
साँस से अपनी गमकती,
साँस मेरी महमहाती।
मदन के तूणीर-से ले
स्नेह-शर दृग पर नचाती।
भेदती मेरे हृदय को
विजय दर्पित मुस्कुराती।।

यूँ लगे तपती धरा पर 
वारि-बूँदें गिर रही हों।
मृत्तिका सोंधी सुरभि से
श्वाँस सुरभित कर रही हो।
प्रिय धरित्री को जलद ने
नेह-वर्षा से भिगाया।
खोल खिड़की स्मृति-पटल की
बिम्ब तेरा झिलमिलाया।।२।।

मधुर दिन वे मधुर रातें,
मधुर बातें प्यार की वो।
गीत मीठे मिलन के वे
लहरियाँ शृंगार की वो।
केलियाँ, अठखेलियाँ मृदु
प्रेममय अभिसार की वो।
तुनकने की, रूठने की 
फिर मधुर मनुहार की वो।

क्या तुम्हें भी याद हैं वे
पल सुनहरे, दिन सुहाने?
महकती मदमस्त रातें 
मिलन के अपने ठिकाने?
मन ये पूछे, मन ये सोचे
मैं कभी कुछ कह न पाया।
खोल खिड़की स्मृति-पटल की
बिम्ब तेरा झिलमिलाया।।३।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 9 नवंबर 2019

राम की अयोध्या

सदा ही रही है सदा ही रहेगी,
पुरी पावनी पूजनीया अयोध्या।
सभी जानते हैं सभी मानते हैं,
सदा राम की वंदनीया अयोध्या।।

जहाँ राम जन्मे जहाँ राम खेले,
जहाँ राम राजें वही है अयोध्या।
रहेगी सदा राम की ही अयोध्या,
सदा राम की ही रही है अयोध्या।।

रविवार, 27 अक्टूबर 2019

आये हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे

आए हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे।
सिय लक्ष्मण संग पधारे, आज मेरे द्वारे।।

प्रभु ने आज दया दिखलाई।
जनम-जनम की निधि है पाई।।
सुर-मुनि को भी दुर्लभ हैं जो।
आज हमारे द्वार खड़े वो।।

दशरथ के प्राण अधारे, आज मेरे द्वारे।
आए हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे।।

प्रिय हनुमान साथ में आए।
तन-मन झूमे, दृग जल छाए।।
बावरि की गति भई हमारी।
दर्शन दिए भगत भय हारी।।

बन चातक नैन निहारें, आज मेरे द्वारे।
आए हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे।।

धन्य-धन्य यह अधम शरीरा।
जिसको स्पर्श किए रघुवीरा।।
चाहूँ नहिं कैवल्य परम पद।
केवल प्रभु चरणों की चाहत।।

सेवूँ नित साँझ-सकारे, आज मेरे द्वारे।
आए हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे।।

सिय लक्ष्मण संग पधारे, आज मेरे द्वारे।
आए हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे।।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

जड़ों से जुड़ा अस्तित्व

कल रात को नींद नहीं आ रही थी। बहुत देर तक बिस्तर पर करवटें बदलने के पश्चात् बेडरूम से निकल आया और हॉल की खिड़की के पास खड़ा होकर गमलों में लगे पौधों को अनायास ही घूरने लगा। पिछली बार इन्हें इतने ध्यान से कब देखा था, याद नहीं। वह तो आज इनका सौभाग्य था कि मोबाइल बेडरूम में ही रह गया था और रात अधिक होने के कारण टीवी चालू नहीं किया, अन्यथा इन पर ध्यान देने के लिए फुर्सत कहाँ? सामान्यतः ये भी बूढ़े माँ-बाप की तरह सुबह-शाम पानी और महीने दो महीने में मिटटी-खाद पाकर पड़े रहते हैं किसी कोने में। तीव्र विकास के इस दौर में समय इतना मूल्यवान है कि इन अनप्रोडक्टिव चीज़ों के लिए टाइम कौन बर्बाद करे! जीने के लिए जरूरी खाना-पानी मिल रहा है, यही क्या कम है? व्यस्तता इतनी कि फेसबुक और व्हाट्सऐप के लिए भी समय नहीं। न तो फेसबुकिया मित्रों के पोस्ट पढ़ पा रहे हैं और न ही लाइक या कमेंट कर पा रहे हैं। दुष्परिणाम यह कि यदि कुछ पोस्ट करते हैं या फिर प्रोफाइल पिक्चर चेंज करते हैं तो अब पहले की तरह लाइक-कमेंट भी नहीं मिल पाते।  व्हाट्सऐप पर चैट करने के लिए समय नहीं मिल पाता और कुछ ख़ास मित्रगण फोन कर हालचाल पूछने में समय व्यर्थ करने से बाज नहीं आते, वह भी पूरे परिवार-खानदान, सगे-सम्बन्धियों सबका। क्या समय आ गया है? कौन इनको समझाए?

मुझे याद है कि बचपन में हम लोगों के पास बहुत समय रहा करता था। इतवार को या फिर त्यौहारों और गर्मी की छुट्टियों में जब समय ही समय रहता था, सुबह उठकर बासी रोटी-तरकारी, रोटी-दही या फिर जो भी उपलब्ध हो, खा-पीकर यार-दोस्तों को आवाज़ देते निकल लेते थे बागीचे की ओर मौसमी खेल खेलने। कभी हमें देर हो जाती तो दोस्त लोग बुला लेते। लेकिन यदि किसी दिन छोड़कर निकल जाते तो दुःख का पारावार न रहता। लगता जैसे हमसे बड़ा गरीब इस दुनिया में तो कोई है ही नहीं। और यदि कोई ख़ास मित्र मामा-बुआ के घर चला जाता तो पूछिए ही मत! लगता था कि उस साल की गर्मी की छुट्टी बर्बाद हो गयी है। एक राज की बात और जो सबको नहीं बता सकते - आजकल इन ख़ास दोस्तों को याद करने के लिए समय ही कहाँ मिलता है? हम तो फेसबुक-व्हाट्सऐप के मित्रों के लिए ही बमुश्किल थोड़ा-बहुत समय निकाल पाते हैं!

मौसमी फलों की तरह वे मौसमी खेल भी बड़े पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होते थे। आज हम एक पर एक फ्री का ऑफर देखकर टूट पड़ते हैं लेकिन वे तो पूरे के पूरे फ्री ही होते थे। फिर भी पता नहीं क्यों लोगों के जीवन से विलुप्त होते गए।

मैं भी कहाँ इन फालतू के पचड़ों में पड़ गया। समय मूल्यवान है, अतः मुद्दे की बात करके आगे बढ़ता हूँ। पहले लोगों के पास फालतू समय था इसलिए एकांतवास का भी मौका मिल जाता था और चिंतन-मनन भी कर लेते थे। टीवी-मोबाइल तो छोड़िये, उन्हें तो समाचार-पत्र भी नसीब नहीं था। तो सोचते भी क्या थे? चिंतन-मनन का विषय भी क्या था? वही ले-देकर परिवार-गाँव के बारे में सोचते थे, सगे-सम्बन्धियों के बारे में सोचते थे, मित्रों के बारे में सोचते थे, या फिर कुछ सामाजिक-धार्मिक विषयों पर चिंतन-मनन कर लेते थे। देश-दुनिया का न उन्हें पता था, न उसके बारे में सोच सकते थे। और आज? इस इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के युग में ज्ञान-गंगा की ऐसी बाढ़ है कि लोगों को मिल रही सूचनाओं पर प्रतिक्रिया देने का भी समय नहीं है, चिंतन-मनन का फालतू समय कहाँ से मिलेगा? शहरों में लोग मुर्गी के दड़बे जैसे एक-दो कमरे के घर में रहते हैं अतः उनको एकांतवास और चिंतन-मनन का समय मिलना तो बहुत पहले बंद हो गया था, टीवी-मोबाइल के आने के बाद तो गाँव के लोगों के लिए भी यह दुर्लभ हो गया।

लेकिन कल रात को जब मैं आकर चुपचाप खिड़की पर खड़े होकर निर्विकार भाव से गमले में लगे पौधों को घूर रहा था तो लगभग दस-पंद्रह मिनट के बाद मेरे मस्तिष्क के चिंतन-मनन वाले भाग को लगा कि वर्षों बाद उसके अच्छे दिन आने वाले हैं और मुझे उसकी आवश्यकता पड़ने वाली है। सीजन की जुताई-बुवाई के बाद लम्बे समय से घर के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी भोथरी, मुर्चाई हुई चकरकी -पतरकी कुदाल जैसे अगले सीजन के पहले लोहार की धधकती भट्ठी में तपकर और धार पाकर चमक उठती है, वैसे ही पूरे जोश के साथ कर्मपथ पर अग्रसर होने के लिए तैयार हो गया वह। बाघ, गौरैया, मोर, लोमड़ी, सियार आदि अनेक विलुप्तप्राय प्राणियों को सरकार या फिर पशु-प्रेमियों की सक्रियता के कारण जैसे अपने अस्तित्व पर आये खतरे से लड़ने का मौका मिला, उसे लगा कि मैंने उसे भी उसका अस्तित्व बचाने का एक अवसर दे दिया। फिर गमलों के पौधों को घूरते हुए जो विचार मन में आया अब उसकी बात कर लेते हैं।

मेरी खिड़की के गमले में श्रीमती जी की कृपा से कई परिचित-अपरिचित पौधों का पेट पल रहा है। इनमें नीम और पारिजात जैसे कुछ पौधे भी हैं जिनको मैंने बचपन से धरती की गोद में पलते-बढ़ते और फूलते-फलते देखा है। अब जब चिंतन-मनन शुरू हो गया तो कई तरह के विचार मन-मस्तिष्क में कौंधने लगे। अचानक सोचने लगा कि ये पौधे तो कई साल से इन गमलों में लगे हैं, लेकिन लम्बाई-चौड़ाई-मोटाई में कोई बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं दिखाई देता है।  एक समय के बाद ठहर से गए हों जैसे! यदि ये बाहर सीधे धरती की गोद में पल रहे होते तो... ? अपरिमित विकास हुआ होता इनका, कितने बड़े पेड़ बन चुके होते। कितने पक्षियों का बसेरा होते। कितने आते-जाते पथिकों को छाया देते। कितने भ्रमरों-मधुमक्खियों को अपने मधुरस से तृप्त करते। कितने सजातीय पौधों को जन्म दे चुके होते। इनकी अपनी शान होती, अपना अस्तित्व होता। क्या वही शान, वही अस्तित्व मेरी खिड़की के गमलों में आकर इनको मिला है? यदि हम लोग दस-पंद्रह दिनों के लिए बाहर चले जाएँ और इन्हें पानी न मिले तो... ? जब तक ये धरती की गोद में रहते हैं, किसी को इनकी देख-रेख करने की जरूरत नहीं पड़ती।  ये आत्मनिर्भर होते हैं प्रकृति से अपनी सारी आवश्यकताओं को स्वयं ही पूरा करने में पूर्णतया सक्षम होते हैं। किन्तु जब गमलों की सुंदरता के प्रति आकृष्ट होकर दूसरों के कृपापात्र बन जाते हैं तो जब तक सामने वाला मिटटी-खाद-पानी देता रहेगा तब तक जीवित रहेंगे, लेकिन जिस दिन बंद कर दिया, अस्तित्व का संकट आ जायेगा। और जीवित रहकर भी इनका क्या वैसा विकास हो पाता है जैसा धरती की गोद में होता है? क्या वह मान-सम्मान और यश मिलता है? कदापि नहीं, क्योंकि अपनी जमीन छोड़कर ये गमलों में आ बैठे हैं। अपनी जड़ों से उखड़ चुके हैं।

पौधे तो फिर भी पौधे हैं, वे स्वयं चलकर गमलों में नहीं आते। कौन जाने उनको गमलों में आकर कैद हो जाना और दूसरों की कृपा पर पलना पसंद भी है या नहीं? लेकिन हम तो मनुष्य हैं। इस पृथ्वी पर सबसे अधिक विकसित जीव, और उस पर भी विश्व की सर्वाधिक सम्मानित प्राचीनतम सभ्यता-संस्कृति की उपज जिसके आदि के बारे में कोई नहीं जानता। सब केवल कुछ खुदाई से मिली गिनी-चुनी वस्तुओं और स्वयंभू इतिहासकारों के स्वयंसिद्ध विश्लेषण के आधार पर अनुमान लगाने और इसका प्रादुर्भाव की खोज का दम्भ भरते हैं। फिर भी हम क्या कर रहे हैं? क्या हम स्वेच्छा से जाकर दूसरों के गमलों में अपने को कैद नहीं कर दे रहे हैं? क्या हम दूसरों की कृपा पर निर्भर नहीं होते जा रहे हैं? क्या हम अपने धर्म-समाज-संस्कृति-परंपरा रूपी जमीन को छोड़कर दूर नहीं जा रहे हैं? क्या हम अपनी जड़ों से कटते नहीं जा रहे हैं? कल्पना कीजिये कि पृथ्वी के सारे नीम के पौधों को यदि गमले में लगाकर कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाय और उनको खाद-पानी न दिया जाय तो क्या उनका अस्तित्व रह जाएगा? नहीं न? ऐसे ही यदि हम अपने धर्म-समाज-संस्कृति-परंपरा को छोड़ दें और उनसे दूर हो जायँ तो क्या हमारे अस्तित्व पर संकट नहीं आ जाएगा? हम अगली पीढ़ी को दोष देते हैं किन्तु यह कभी नहीं देखते कि हमने स्वयं इनका कितना निर्वहन किया? क्या हमने अपने पूर्वजों की सीख को अपने जीवन में कोई स्थान दिया? क्या हमने अगली पीढ़ी के लिए एक सही उदाहरण प्रस्तुत किया? क्या हमने उनका सही मार्गदर्शन किया? हमें सोचने की आवश्यकता है।

कल मेरे मस्तिष्क का चिंतन-मनन वाला भाग मौका पाकर ऐक्टिव हो गया था तो मैंने इतना लेक्चर दे दिया। हो सकता है कि कल फिर मैं बाकी चीजों में इतना व्यस्त हो जाऊँ कि चिंतन-मनन तो दूर यह भी भूल जाऊँ कि इस मुद्दे पर मैंने ऐसा कुछ लिखा भी था। लेकिन यदि मेरे आज के इस क्षणिक आवेग वाले लेख से किसी का मन-मस्तिष्क पल भर के लिए चिंतन-मनन की ओर चला जाय तो वही मेरे इस अनप्रोडक्टिव समय का प्रोडक्ट होगा।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

प्रभु की अनुकम्पा

हर दुख सहकर घबराकर भी
छल-छद्म नहीं मैं सीख सका
प्रभु की अनुकम्पा पाकर ही
इस कल्मष से मैं वीत सका

मुझको तुझ पर विश्वास सदा
तू पग-पग मुझे सँभालेगा
हो भँवर भयंकर कितनी भी
तू हरदम मुझे निकालेगा

तेरे सम्बल के कारण ही
यह पाप न मुझको खींच सका
प्रभु की अनुकम्पा पाकर ही
इस कल्मष से मैं वीत सका

मैं कदम-कदम ठोकर खाया
अरु दर-दर पर अपमान सहा
ध्रुव अटल भरोसा तेरा था
जीवन-पथ पर बढ़ता ही रहा

तेरी अनुभूति रही ऐसी
यह अधम मुझे नहिं रीझ सका
प्रभु की अनुकम्पा पाकर ही
इस कल्मष से मैं वीत सका

रविवार, 8 सितंबर 2019

कलि के दोहे

करते कलयुग में सदा, वंचक ही हैं राज ।
वचन-कर्म में भेद अरु, नहिं प्रपंच से लाज ।।

मैं हूं, मैं बस मैं यही, है कलयुग का नेम ।
करुणा मरती जा रही, सूख रहा है प्रेम ।।

वंचक का कलिकाल में, करते हैं सब मान ।
सच्चरित्र का हो भले, मन में बहु सम्मान ।।

नंगा जो जितना बड़ा, उतना पूजा जाय ।
कलि में अपमानित रहे, जिसका सरल सुभाय ।।

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

कायर

बैठी थी वह
दो मिनट का अवकाश लेकर
अपने दुधमुँहे बच्चे के साथ
ममता से सराबोर
समेटे हुए आँचल में उस नवजात को
स्तनपान कराती, दुलराती !

मगन था वह भी
माँ के आँचल तले
अमृत-रस-पान करता हुआ
परमसुख, परमानंद की अनुभूति के साथ !

तभी अचानक !
एक झटका लगा
जोर का, बहुत जोर का
लगा जैसे आ गया हो
कोई प्रलयंकारी भूकम्प
काँप उठी हो धरती
चिग्घाड़ उठा हो आसमान
और वह नवजात
जा गिरा दूर अपनी माँ की गोद से
कंकड़ीली, ऊबड़-खाबड़
तप्त भूमि पर.

गिरी पड़ी थी उसकी माँ भी
तड़पती, कराहती असीम वेदना से
पकड़े हुए अपनी पीठ को
एक हाथ से,
और फैलाये हुए दूसरा हाथ
अपने अबोध शिशु की ओर
चीखती, चिग्घाड़ती, बिलबिलाती, गिड़गिड़ाती
देखती हुई कातर आँखों से
कभी अपने निरपराध निरीह पुत्र को
तो कभी उस
दैत्याकार, बर्बर, क्रूर
ठेकेदार को,
जिसकी लात के आघात से
धरती पर पड़ी कराह रही थी वह
और उसका बच्चा भी.

रो रहे थे माँ बेटे
तड़प रहे थे, चिग्घाड़ रहे थे
और..
इस अपार वेदना और करुण क्रन्दन के बीच
सोच रहा था वह नन्हा मासूम
प्रयास कर रहा था समझने का
इस पूरे घटनाक्रम को,
और कोशिश कर रहा था जानने की -
"क्यों मारा उसने मेरी माँ को?
क्या अपराध था उसका?
क्या सुबह से शाम तक
दुर्दिन और दुर्भाग्य के
पाटों के बीच पिसना, फिर भी
अपनी अस्मत की रक्षा हेतु संघर्षरत रहना
यही अपराध था उसका?
या फिर,
पति के आकस्मिक निधन के पश्चात् भी
समाज से लड़ते हुए
स्वाभिमान से जीने का प्रयत्न ?
क्या अपने भूख से तड़पते
बिलखते बच्चे के लिए
दो मिनट का अवकाश लेना उसका अपराध था?
या फिर,
भूखे भेड़ियों के समक्ष
आत्मसमर्पण न करना?

और यह कायर तमाशबीन भीड़ !
मौन है जो हस्तिनापुर के सभासदों की भाँति,
जैसे वे मौन थे
द्रौपदी के चीरहरण के समय
आमंत्रण देते भयंकर विनाश को.
दबा रखा है इन्होंने
प्रतिरोध के स्वर को
प्रतीक्षा में
अपनी-अपनी बारी की.

अरे कायरों !
मिटोगे तुम भी एक दिन
एक-एक कर, असहाय
एकदूसरे का मुँह ताकते
किन्तु, हाथ छुड़ाते हुए
मिटोगे तुम भी,
यदि अभी भी नहीं जागे
मिटोगे तुम भी एक दिन !

राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।