जबसे मैंने पाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।
कितना प्यारा पल होगा जब
पत्र तुम्हारा बाँचूँगा।
प्रथम पत्र का अनुपम अनुभव
अंतस् ही में जाँचूँगा।
वक्ष लगाए घूम रहा हूँ
जबसे यह खत आया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।१।।
जो भी काम अधूरा दिखता
तुरत वहाँ लग जाता हूँ
तज आलस्य-प्रमाद, सजग हो
सद्य उसे निपटाता हूँ
नहीं चाहता कोई आए
कहते तुम्हें बुलाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।२।।
विह्वल विह्वल हृदय हमारा
सँभली सँभली धड़कन है
तपन बढ़ रही, अधर शुष्क हैं
अंग अंग में कंपन है
अनियंत्रित तन, झूम रहा मन
स्वेद माथ पर छाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।३।।
भीड़ चतुर्दिक, अवसर ढूँढूँ
पत्र खोल पढ़ पाऊँ मैं।
तुम अति दूर, बताओ कैसे
हिय का हाल बताऊँ मैं?
जिनका साथ सदा से प्रिय था,
सबसे जी उकताया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।४।।
- राजेश मिश्र
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