शनिवार, 27 दिसंबर 2025

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता।
चतुर्दिक प्रेम का सूखा कहीं सोता नहीं मिलता। 
जहाँ जाते जगत में तुम हँसी बस ढूँढते रहते,
इसी कारण कभी कोई कहीं रोता नहीं मिलता।।

धधकती भू, तड़पते जन, सिसकते फेफड़े निशिदिन,
हवा का शुद्ध शहरों में, कहीं झोंका नहीं मिलता।

जहाँ लहलह लहरती थी फसल मौसम कोई भी हो,
पड़े परती उन्हें कोई कहीं बोता नहीं मिलता।

सुनी थी श्रवण की गाथा सदा हमने लड़कपन में, 
दुखद अब वृद्ध कोई भी कहीं ढोता नहीं मिलता।

लुटेरे-चोर-हत्यारे सदा थे किंतु अब कोई 
लहू के दाग छुप-छुपकर कहीं धोता नहीं मिलता।

प्रिये! जब तुम मिला करती मगन मन नाच उठता था,
वही मन किंतु अब विह्वल कहीं होता नहीं मिलता।

- राजेश मिश्र 

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