मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा। 
कामनाओं के प्रलोभन पर अटकता ही रहा।।

दुरदुराकर दूर करता जब कभी आता यहाँ,
स्नेह या फिर विवशता, लेकिन फटकता ही रहा।।

लड़खड़ाया जब कभी, उसको सँभाला हाथ दे 
पर उसी की आँख में हरदम खटकता ही रहा।।

मन दिलासा दे रहा था डर नहीं कोई मगर,
वह अगर कह दे 'नहीं'? यह दिल धड़कता ही रहा।।

विघ्न-बाधाएँ बहुत थीं जिंदगी में हर कदम,
किंतु कब जीवन रुका? पल-पल सरकता ही रहा।।

विरह का शोला उठा तुमसे बिछड़कर के प्रिये!
उम्र तो ढलती गई, पर वह धधकता ही रहा।।

- राजेश मिश्र 

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