प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।
दोष मेरा क्या? भला कुछ तो बताओ,
छोड़कर मुझको अकेले यूँ न जाओ।
स्वप्न जितने संग मिल हमने सजाये
कल्पनाओं के महल जो भी बनाये।
भस्म सब कुछ कर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।१।।
जो नयन निशि-दिन तुम्हारी राह तकते,
भंगिमाओं पर तुम्हारे नत थिरकते।
जगत से निर्लिप्त नित तुमको निहारें,
कामनायें संपदा सुख त्याग सारे।
अश्रु उनमें भर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।
हृदय-मंदिर में सदा तुमको बिठाया,
भोग तन-मन का सदा तुमको लगाया।
किए अर्पित भावना के पुष्प सारे,
नित रहा जीवन समर्पित हित तुम्हारे श।
भूल क्या? तजकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।
- राजेश मिश्र
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