अगर कटु सत्य, मत बोलो, अपरिमित कष्ट होता है।।
छुवा तुमने गुलों को जब हँसे वे खिलमिलाकरके,
न काँटों से प्रिये! लिपटो, अपरिमित कष्ट होता है।।
नहीं सम्भव, नहीं कह दो, न झूठे स्वप्न दिखलाओ,
न देकर आसरा तोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।
भला है तो भला कह दो, बुरा है तो बुरा कह दो,
मगर कुल-जाति मत उघटो, अपरिमित कष्ट होता है।।
न हो संगी समय फिर भी अकेले बीत जाता हैं,
न अपनाकर कभी छोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।
जिन्होंने थाम कर उँगली सिखाया दौड़ना जग में,
न उनसे मुँह कभी मोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।
- राजेश मिश्र
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