रविवार, 14 दिसंबर 2025

अपरिमित कष्ट होता है

पुराने घाव मत छेड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।
अगर कटु सत्य, मत बोलो, अपरिमित कष्ट होता है।।

छुवा तुमने गुलों को जब हँसे वे खिलमिलाकरके,
न काँटों से प्रिये! लिपटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

नहीं सम्भव, नहीं कह दो, न झूठे स्वप्न दिखलाओ,
न देकर आसरा तोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

भला है तो भला कह दो, बुरा है तो बुरा कह दो,
मगर कुल-जाति मत उघटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

न हो संगी समय फिर भी अकेले बीत जाता हैं,
न अपनाकर कभी छोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

जिन्होंने थाम कर उँगली सिखाया दौड़ना जग में,
न उनसे मुँह कभी मोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

- राजेश मिश्र

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।