शनिवार, 20 दिसंबर 2025

मन मगन मनमीत मुझको मिल गए

व्योम-प्रांगण में सितारे खिल गए।
मन मगन मनमीत मुझको मिल गए।।

प्यार से देखा, मिले कुछ इस तरह,
अधर पर मुसकान दे, ले दिल गए।।

व्यर्थ की बकवाद तो करता रहा,
पर समय पर होंठ उसके सिल गए।।

मेहनताना तय प्रदर्शन पर हुआ,
सब निकम्मे काम पर फिर पिल गए।।

योग्यता पर जाति यूँ हावी हुई,
देश तज परदेश सब काबिल गए।।

दूसरों का दर्द ही ढोता रहा,
क्या पता कब पाँव मेरे छिल गए।।

- राजेश मिश्र

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।