छलती रही अमन की आशा।
पीठ में खंजर भोक-भोंक कर
चलती रही अमन की आशा।।
गंगा की उज्ज्वल धारा के
श्यामल यमुना से संगम पर
तहजीबों का नाम चलाकर
पलती रही अमन की आशा।।
श्रुति-पुराण को, धर्म-ध्यान को
ऋषि-मुनियों के अगम ज्ञान को
झूठ और पाखंड बताकर
फलती रही अमन की आशा।।
कभी जाति के नाम लड़ाकर
कभी कहीं आतंक मचाकर
हिंदू-रक्त-तेल पी-पीकर
जलती रही अमन की आशा।।
बहन बेटियों के गौरव को
धर्म बदलकर छत से, बल से
सदियों से पैरों के नीचे
दलती रही अमन की आशा।।
अब भी सोते रह जाओगे
लुट जाओगे, मिट जाओगे
जाग्रत जन को सदा-सदा से
खलती रही अमन की आशा।।
- राजेश मिश्र
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