सोमवार, 15 दिसंबर 2025

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ।
शून्य का खोया सितारा हो गया हूंँ।।

मैं सहारा क्या बनूँगा और का?
जब स्वयं ही बेसहारा हो गया हूँ।।

सगर-पुत्रों! कौन तारेगा तुम्हें?
गंग की विपरीत धारा हो गया हूँ।।

नासमझ निज झुंड से कटता गया 
शत्रुओं का सहज चारा हो गया हूँ।।

सूर्य-सा तन तेज सारा ढल गया
शाम का गुमसुम नजारा हो गया हूँ।।

जिंदगी में और पर आश्रित हुआ 
वृद्ध या बालक दुबारा हो गया हूँ।।

- राजेश मिश्र

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।