हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।
भृकुटि-कमान काम-सी चंचल
तीक्ष्ण तीर हावों-भावों के।
सन-सन सन-सन चलते रहते
भर देते अगणित घावों से।
निर्दय व्याध दृगों से कह दो थोड़ा तो विश्राम करें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।१।।
हृष्ट-पुष्ट कंचन काया पर
दृष्टि सहज ही रुक जाती है।
मंद-मंद मनमोहक चालें
गजगामिनि! मन ललचाती हैं।
आमंत्रक अंगों से कह दो यूँ मत मेरे प्राण हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।२।।
कोमल कलियों-से अधरों पर
मधुर हँसी जब-जब आती है।
तन-मन उपवन को शब्दों के
सौरभ से महका जाती है।
मुस्काते होंठों से कह दो बेसुध कर मत ध्यान हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।३।।
- राजेश मिश्र
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