मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

आखेटक आँखों से कह दो

आखेटक आँखों से कह दो कुछ तो अब आराम करें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।

भृकुटि-कमान काम-सी चंचल
तीक्ष्ण तीर हावों-भावों के।
सन-सन सन-सन चलते रहते 
भर देते अगणित घावों से।

निर्दय व्याध दृगों से कह दो थोड़ा तो विश्राम करें। 
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।१।।

हृष्ट-पुष्ट कंचन काया पर
दृष्टि सहज ही रुक जाती है।
मंद-मंद मनमोहक चालें 
गजगामिनि! मन ललचाती हैं।

आमंत्रक अंगों से कह दो यूँ मत मेरे प्राण हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।२।।

कोमल कलियों-से अधरों पर 
मधुर हँसी जब-जब आती है। 
तन-मन उपवन को शब्दों के 
सौरभ से महका जाती है।

मुस्काते होंठों से कह दो बेसुध कर मत ध्यान हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।३।।

- राजेश मिश्र

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।