शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

तुम आए नवजीवन आया

मुरझाया-सा मन मुसकाया सूने-बूढ़े गाँव में।
तुम आए नवजीवन आया सूने-बूढ़े गाँव में।।

अनमनि गइयाँ लगीं रँभाने, 
चिड़ियाँ चह-चह चहक उठीं।
क्षीण-ज्योति बाबा-आजी की
आँखें फिर से चमक उठीं।

तुम्हें देख आँगन हरषाया सूने-बूढ़े गाँव में।
तुम आए नवजीवन आया सूने-बूढ़े गाँव में।।१।।

गूँगी-सी माँ की बोली अब
कोयल सा रस भरती है।
कई बरस के बाद कड़ाही 
छन-छन पूड़ी तलती है।

पकवानों ने घर महकाया सूने-बूढ़े गाँव में।
तुम आए नवजीवन आया सूने-बूढ़े गाँव में।।२।।

खेतों में हरियाली आई
ताल-पोखरे उमग पड़े।
परिजन, पशु, पक्षी, पौधे सब
विह्वल तन-मन सजल खड़े।

पीपल-पात पुन: लहराया सूने-बूढ़े गाँव में।
तुम आए नवजीवन आया सूने-बूढ़े गाँव में।।३।।

- राजेश मिश्र 

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