बुधवार, 13 नवंबर 2024

ढूँढ़ूँ मैं प्रिय राम कहाँ हो?

ढूँढ़ूँ मैं प्रिय राम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?

तुम बिन नैन चैन नहिं पायें,
सूखें इक पल, पुनि भर आयें।
इत-उत देखें, राह निहारें,
पथरायें, पुनि-पुनि जी जायें।

लोचन ललित ललाम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?………(१)

अंग शिथिल हैं, तन कुम्हलाया,
हुआ अचंचल, मन मुरझाया।
हाहाकार हृदय करता है,
बुद्धि-विवेक ने ज्ञान गँवाया।

तन-मन के आराम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?………(२)

तुम बिन शशधर-भानु रुके हैं,
दिवस आदि-अवसान रुके हैं।
श्याम वदन दर्शन-वन्दन हित,
सतत टूटते प्राण रुके हैं।

ढूँढ़ रहे अविराम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?………(३)

- राजेश मिश्र 

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