सोमवार, 11 नवंबर 2024

हिंदू-हिंदू भाई-भाई

छोड़ो जाति-पाँति की बातें, हिंदू-हिंदू भाई-भाई।
तज दो मन की कड़वी यादें, हिंदू-हिंदू भाई-भाई।।

हम सब मनु की संतानें हैं,
वर्ण कर्मवश चार हुए।
जाति कुशलता की परिचायक,
भिन्न-भिन्न व्यापार हुए।

गाधितनय ब्रह्मर्षि कहाते, हिंदू-हिंदू भाई-भाई।
तज दो मन की कड़वी यादें, हिंदू-हिंदू भाई-भाई।।१।।

इक शरीर हैं, अंग अलग हैं ,
एक हृदय की धड़कन है।
पोषित होते उसी उदर से,
सबमें रमे वही मन है।

रक्त एक है, भेद कहाँ से? हिंदू-हिंदू भाई-भाई।
तज दो मन की कड़वी यादें, हिंदू-हिंदू भाई-भाई।।२।।

राम-कृष्ण ने जाति देखकर 
किसको निम्न-उच्च माना?
जो भी आया, हृदय लगाया,
अपने जैसा ही जाना।

हम क्यों अलग नीति अपनायें? हिंदू-हिंदू भाई-भाई।
तज दो मन की कड़वी यादें, हिंदू-हिंदू भाई-भाई।।३।।

- राजेश मिश्र 

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।
- भगवद्गीता अ. ४, श्लो. १३

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...