सोमवार, 25 नवंबर 2024

पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में

पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।

पंखों में ले, प्राण पवन से,
निर्भयता मन में।
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।

तोड़ सकल जंजीरें, उड़ जा,
चुपके, धीरे-धीरे उड़ जा।
ममता की यह नदी भयावह,
निकल भँवर से, तीरे उड़ जा।

तड़प रहा तूँ, भला बता क्यूँ
उलझा बन्धन में?
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।१।।

दुखड़ा तेरा कौन सुनेगा?
सुनकर भी कोई न गुनेगा।
अपना हो या होय पराया,
नित नव नूतन जाल बुनेगा।

ठाट-बाट के, जाल काट के
उड़ जा कानन में।
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।२।।

एक राम को अपना कर ले,
नाव नाम की, भव से तर ले।
मोहनि मूरति साँवरिया की,
नेह लगा ले, उर में धर ले।

कर ले पावन, कलुषित जीवन,
लग हरि चरनन में।
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।३।।

- राजेश मिश्र 

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।