रविवार, 1 सितंबर 2024

उपजी न कहीं कविता मन में

कवि कबसे बैठ विचार रहा, ढूँढ़े सारे जड़-चेतन में।
उपजी न कहीं कविता मन में।।

ढूँढ़े सन्तप्त सूर्य-कर में,
शीतल सुधांशु की छाया में।
ढूँढ़े झिलमिल ताराङ्गण में,
वसुधा की श्यामल काया में।

उद्वेलित सिन्धु तरङ्गों में, चञ्चल समीर के नर्तन में।
उपजी न कहीं कविता मन में।।

उत्तुङ्ग अचल गिरि-श्रृङ्गों में,
नदियों के उर्वर समतल में।
अति दुर्गम दुसह पठारों में,
निष्फल निस्तेज मरुस्थल में।

सर, सरि, सुग सरित् सरोवर में, गृह-ग्राम-नगर-वन-उपवन में।
उपजी न कहीं कविता मन में।।

शुचि वेदों में, वेदाङ्गों में,
दर्शन, आगम सब ग्रन्थों में।
पशु-पक्षी-कीट-पतङ्गों में,
तरुणी के कोमल अङ्गों में।

जीवन के सित-तम भावों में, गोचर संसृति के कण-कण में।
उपजी न कहीं कविता मन में।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

रो मत बेटी!

रो मत बेटी! शस्त्र उठा तू, 
दुर्धर दुर्गा रूप है।
कालरात्रि तू, वक्ष चीर दे,
तेरी शक्ति अनूप है।।

बहुत हुआ अब, बहुत सहा अब,
चुप रहना भी पाप है।
कर दे भस्म दरिन्दों को तू,
ज्वाला है, तू ताप है।

चेन्नम्मा, लक्ष्मी, झलकारी,
रत्ना, चम्पा रूप है।।
कालरात्रि तू, वक्ष चीर दे,
तेरी शक्ति अनूप है।।

कलि-कलुषित इन हैवानों को,
क्यों जीवन अधिकार हो?
हृदय क्रोध धर, शिरोच्छेद कर,
हलका भू का भार हो।

अबला कब थी? रुद्र-शक्ति तू,
चण्डी का पतिरूप है।
कालरात्रि तू, वक्ष चीर दे,
तेरी शक्ति अनूप है।।

- राजेश मिश्र

बँटोगे तो कटोगे

कितनी बार बताएं तुमको?
सोये रहे, निपट जाओगे।
अब तो योगी भी बोले हैं,
बँट जाओगे, कट जाओगे।।

पल-पल संकट बढ़ा आ रहा,
शत्रु सतत सिर चढ़ा आ रहा।
समय नहीं है अब सोने का,
सोकर सरबस खो देने का।

शस्त्र-शास्त्र से सज्जित ही तुम,
उसके सम्मुख डट पाओगे।।
अब तो योगी भी बोले हैं,
बँट जाओगे, कट जाओगे।।

विपदा चौखट तक आ पहुँची,
क्यों तुमको यह भान नहीं है?
बहू-बेटियाँ चीख रही हैं,
फटते तेरे कान नहीं हैं?

राम-कृष्ण की सन्तानें तुम,
मातृ दमन क्या सह जाओगे?
अब तो योगी भी बोले हैं,
बँट जाओगे, कट जाओगे।।

मार भगाओ, या मर जाओ,
बस इतना अधिकार तुम्हें है।
कायर बन चुप रहते हो तो,
जीवन पर धिक्कार तुम्हें है।

भारत माता तुम्हें पुकारे,
क्या तुम पीछे हट पाओगे?
अब तो योगी भी बोले हैं,
बँट जाओगे, कट जाओगे।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 29 अगस्त 2024

नेवान कइसे होई

बड़ी लंबी राति बा, बिहान कइसे होई?
तनिकऽ सा पिसान बा, नेवान कइसे होई?

घरे घीउ-दूध नाहीं,
गाइ गभिनाइल।
खरचा पहाड़ जइसन, 
करजा नऽ भराइल।

लइका रूख-सूख खाइ जवान कइसे  होई?
तनिकऽ सा पिसान बा, नेवान कइसे होई?

कुछहू तऽ भेजि देतऽ
अबकी महिनवां।
फिसियो भराइल नाहीं,
पढ़ी कइसे मुनवां।

संगी-संघातिन में फिर मान कइसे होई?
तनिकऽ सा पिसान बा, नेवान कइसे होई?

रजुआ कऽ काका ओके
भेजलेन हं नरखा।
आवे के कहले बाटें
पड़ले पे बरखा।

मिलन मोर- तोर ए परान कइसे होई?
तनिकऽ सा पिसान बा, नेवान कइसे होई?

- राजेश मिश्र

देश क्या बचे?

खण्ड-खण्ड हो गया समाज, देश क्या बचे!
जाति-जाति में विभक्त आज, देश क्या बचे!

है बिछा दिया बहेलिये ने जाल इस तरह,
बँट गया कबूतरों का झुण्ड आज लोभ में।
खड्ग खींचकर खड़ा स्वबन्धु बन्धु के विरुद्ध, 
आर्त क्रुद्ध वृद्ध विवश हाथ मले क्षोभ में। 

खो चुके समस्त लोक-लाज, देश क्या बचे!
खण्ड-खण्ड हो गया समाज, देश क्या बचे!

ओज नष्ट, बुद्धि भ्रष्ट, वेग स्वार्थ का प्रबल,
धर्म के विरुद्ध युद्ध धर्म-पुत्र लड़ रहा।
नीति राजनीति की अनीति से सनी हुई,
लोकतन्त्र का कुतन्त्र, धर्मतन्त्र मर रहा।

शक्ति शून्य सा दिखे विराज, देश क्या बचे!
खण्ड-खण्ड हो गया समाज, देश क्या बचे!

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 27 अगस्त 2024

सुदामा की व्यथा

सँकुचत सुदामा चललँ, मनवाँ में भार बा।
कइसे कहब कान्हा से, हालि का हमार बा।।

कँखियाँ दबवले बाटँ, तनि एक चाउर।
रहि-रहि कूढ़त बाटँ, लागत ह बाउर।
पउँवाँ उठावँ जइसे, बड़का पहाड़ बा।।
कइसे कहब कान्हा से, हालि का हमार बा।।

बचपन क बतिया अब्बो, जियरा दुखारी।
छोटहन क गठरी अब त, भइल होइ भारी। 
कइसे भरब ऊ जवन, पहिला उधार बा।।
कइसे कहब कान्हा से, हालि का हमार बा।।

देखत सुदामा कान्हा, मिललँ हहाई।
करजा उतरलँ सारा, दुइ मूठ खाई।
छत्र तीनि लोक क ई, मितऊ तुहार बा।।
भरल भाव नैन चारो, बरसत अपार बा।।

- राजेश मिश्र

लाज राखो प्रभु मोर

हे गिरिधारी! कृष्णमुरारी!
हे माखन के चोर! लाज राखो प्रभु मोर।

श्याम गात पीताम्बर धारी।
वाम अङ्ग वृषभानु दुलारी ।।
वर वैजन्ती माल वक्ष पर।
पंकज लोचन वेणु अधर धर।।

छवि अति न्यारी, जन मन हारी,
कान्ति काम की थोर, लाज राखो प्रभु मोर।

तुम भक्तों के प्राण अधारे।
तुमको भक्त प्राण से प्यारे।।
कष्ट जनों का देख न पाते।
सरबस छोड़ दौड़ कर आते।।

विनय हमारी, हे बनवारी! 
देखो मेरी ओर, लाज राखो प्रभु मोर।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 11 अगस्त 2024

जागो हिंदू, जागो!

जगो जगो उठो उठो
हुँकारते बढ़े चलो,
कराल शत्रु सामने
तृषार्त खड्ग खींच लो।

कराहती पुकारती 
दुखी निढाल भारती,
प्रतप्त शत्रु रक्त से
प्रदग्ध भूमि सींच दो।।

नहीं दया, नहीं क्षमा
निकृष्ट म्लेच्छ वंश को,
उदारता नहीं कोई 
दुराशयी फकीर को।

दुरारुढ़ी दुराग्रही 
कुदृष्टियुक्त लंपटी
नराधमी पिशाच को
बनो प्रचंड चीर दो।।

उठो सुपुत्र राम के,
उठो सुपुत्र कृष्ण के,
अभिन्न अंश रुद्र के,
सुसज्ज अस्त्र-शस्त्र हो।

पवित्र मातृभूमि की
मृदा मलो ललाट पर,
शिवा, प्रताप, पुष्य सा
प्रवीर हो, जयी बनो।।

© राजेश मिश्र 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

अब तो दरस दिखाओ मेरी मैया

अब तो दरस दिखाओ मेरी मैया।

प्यासे नयन तकें बरसों से ,
आकर प्यास बुझाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

हरि-हर-ब्रह्मा, सुर-मुनि सेवें,
सेवा भाव जगाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

कनक कलेवर, लाल चुनरिया,
माँग सिंदूर सजाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

टीका, कुण्डल, मोती सोहे,
चंद्रवदन दरसाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

पुष्प- हार, असि-खप्पर धारी,
सिंह चढ़ी चलि आओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

रक्तबीज, महिषासुर घाती,
स्वजन कृपा बरसाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

काम, क्रोध, मद, लोभ, शोक सँग,
मत्सर, मोह मिटाओ मेरी मैया।
अब तो दरस…

 - राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

आओगे जब तुम रामलला

आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।
नयनन से नीर बहायेंगे, अँसुवन जल चरण पखारेंगे।।

हम रुचि-रुचि भोग लगायेंगे,
अपने हाथों से खिलायेंगे,
जब थककर तुम सो जाओगे,
हम बैठे चरण दबायेंगे।
तुम सोओगे, हम जागेंगे, अपलक प्रभु तुम्हें निहारेंगे।
आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।।

तेरा पूजन, तेरा वन्दन,
पल-पल प्रभु तेरा ही चिन्तन,
तन में भी तुम, मन में भी तुम,
तेरा ही जग में अभिनन्दन।
चलते फिरते सोते-जगते, प्राणों में तुम्हीं को धारेंगे।
आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।।

बस यही अनुग्रह कर देना,
निज चरणों में आश्रय देना।
जब भूल कभी हो जाये तो,
मत चरण-शरण से तज देना।
तुम अवसर देना प्रभु हमको, हम आपनी भूल सुधारेंगे।
आओगे जब तुम रामलला, हम पलकन डगर बुहारेंगे।।

- राजेश मिश्र

ठुमुकि चलत रघुराई

ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
आनंद मन न समाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

गिरत उठत पुनि-पुनि प्रभु धावत
भागत दूर निकट फिरि आवत
किलकत हँसत ठठाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

रुकत झुकत घुटनन से झाँकत
करत ठिठोली मातहि ताकत
अद्भुत करें लरिकाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

नृप दसरथ सब भाँति निछावर
निरखि-निरखि पुलकित प्रिय रघुबर
गुड़ गूँगा ज्यों खाई, हरष हियँ तीनहुँ माई।
ठुमुकि चलत रघुराई, हरष हियँ तीनहुँ माई।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 17 जनवरी 2024

राम भजो मन

राम ही सत् हैं, राम ही चित् हैं
राम ही घन आनन्द हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

राम सगुण हैं, राम ही निर्गुण,
निराकार साकार हैं।
राम ही ब्रह्मा, राम ही विष्णु,
राम ही शिव अवतार हैं।
राम ही सोम, सूर्य अरु अग्नि 
वायु, वरुण अरु इन्द्र हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

राम ही धरती, राम गगन हैं,
राम ही चौदह लोक हैं।
राम ही चेतन कण-कण में हैं,
राम ही हर आलोक हैं।
राम ही स्वर हैं, राम ही लय हैं,
राम ही ताल और छन्द हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

राम ही प्राण हैं, त्रिविध शरीर हैं,
पञचकोश भी राम हैं।
राम ही चित्त हैं, राम ही मन हैं,
बुद्धि-अहं भी राम हैं।
राम ही भोग हैं, राम ही योग हैं,
राम जीव हैं, ब्रह्म हैं।
राम भजो मन, राम भजो मन
राम ही परमानन्द हैं।।

- राजेश मिश्र

राम घर आये हैं

प्रेम-रस सराबोर सब अङ्ग,
नयन जल छाये हैं।
राम घर आये हैं।।

अवध में अद्भुत है आनन्द,
बज रहे ढोलक झाल मृदङ्ग,
चहूँ दिशि बिखरे नाना रङ्ग,
नारि-नर नाचें भरे उमङ्ग,
देखि लक्ष्मण सीता प्रभु सङ्ग,
हृदय हर्षाये हैं।
राम घर आये हैं।।१।।

सुशोभित सुरभित बंदनवार,
डगर पर फूलों की भरमार,
चौक पूरे हैं हर घर-द्वार,
गगन में गूँजे मङ्गलचार,
देखने अनुपम दृश्य अपार,
देव-मुनि धाये हैं।
राम घर आये हैं।।२।।

प्रजा जन छोड़ सकल संसार,
जुटे हैं भव्य राम-दरबार,
भरे आँखो में स्नेह अपार,
परम प्रभु रूप अनूप निहार,
विकल हो‌ सारे हृदयोद्गार,
दृगों से ढाये हैं।
राम घर आये हैं।।३।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 जनवरी 2024

कहाँ हैं रामलला?

कर सोलह श्रृंगार, अयोध्या अपलक डगर निहार
कहां हैं रामलला?
आनंद अपरंपार, बहे नयनों से अविरल धार
कहां हैं रामलला?

सदियों लड़कर शुभ दिन आया
हर्षोल्लास लोक तिहुँ छाया
घड़ी मिलन की अब आई है
सिहरन सी तन में छाई है

वाणी है लाचार, धड़कती छाती बारंबार,
कहां हैं रामलला?
कर सोलह श्रृंगार, अयोध्या अपलक डगर निहार
कहां हैं रामलला?

झलक दिखी रघुवर सुजान की 
कृपायतन करुणानिधान की
श्याम गात पर पीताम्बर की
नरकेशरि की, कर धनु-शर की

अमित अनंत अपार, छटा लखि लज्जित सकुचित मार
कहां हैं रामलला?
कर सोलह श्रृंगार, अयोध्या अपलक डगर निहार
कहां हैं रामलला?

राम अयोध्या सम्मुख आये
पुलक गात कुछ कहि नहिं जाये
देखि अलौकिक छवि अति न्यारी
तुरत अयोध्या भई सुखारी

भेंटी भर अँकवार, रहा सुख का नहिं पारावार
विराजो रामलला।
कृपासिन्धु सरकार, करो सबके दुख का निस्तार
हमारे रामलला।।

- राजेश मिश्र

दरस दिये रघुराई

दरस दिये रघुराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।
मनहिं मनहिं मुसुकाई, हृदय गति कहि नहिं जाई।।

रूप सलोना सोहत ऐसे
कोटिक काम खडे हों जैसे
भाल तिलक सिर मुकुट बिराजे
कण्ठ माल पीताम्बर साजे

निरखि कलुष मिटि जाई, हृदय गति कहि नहिं जाई।
दरस दिये रघुराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।।

बड़भागी प्रभु दरसन पाया
जनम-जनम का पाप गँवाया
नेह कमल चरणन रज लागा
चंचरीक ज्यों पदुम परागा

सब सुधि-बुथि बिसराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।
दरस दिये रघुराई, हृदय गति कहि नहिं जाई।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 13 जनवरी 2024

आये राघव सरकार

आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।
करने निज जन उद्धार, मङ्गल गान करो।।

नील सरोरुह श्यामल सुन्दर।
पूरणकाम राम सुख सागर।।
चिदानन्द सत् पुरुष परात्पर।
षड्विकार तम पुञ्ज दिवाकर।।

परब्रह्म सगुण साकार, मङ्गल गान करो।
आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।।

निरख-निरख प्रभु-छवि अति पावनि।
जन-मन रञ्जनि ताप नसावनि।।
जगजननी की शोभा न्यारी।
पुलक गात झूमें नर-नारी।।

मन मुदित सकल संसार, मङ्गल गान करो।
आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।।

मर्यादा पुरुषोत्तम आये।
धर्म-ध्वजा चहुँ-दिशि फहराये।।
वेद-शास्त्र सब भये सुखारी।
गावें प्रभु की महिमा न्यारी।।

गूँजे है मन्त्रोच्चार, मङ्गल गान करो।
आये राघव सरकार, मङ्गल गान करो।।

- राजेश मिश्र

अइलं अवध रघुराई

अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।
सुर-नर-मुनि हरषाई, नगर-घर बाजे बधाई।।

रामजी अइलं, लछिमन अइलंऽ
देखि सिया के नयन जुड़इलंऽ
भरत मिलेलं हहाई, नगर-घर बाजे बधाई।
अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।।

लखन-सहोदर मगन निहारंऽ
ढरकत अंसुवन चरण पखारंऽ
सब सुधि-बुथि बिसराई, नगर-घर बाजे बधाई।
अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।।

भई उर्मिला-गति बावरि सी
चउदह बरस की अंखियां तरसीं
हरषित तीनों माई, नगर-घर बाजे बधाई।
अइलं अवध रघुराई, नगर-घर बाजे बधाई।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

राम जी आयेंगे

रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।
रख ले नयनों में नीर, राम जी आयेंगे।।

आयेंगे जी भरकर रोना
अँसुवन से चरणों को धोना
हर लेंगे सारी पीर, राम जी आयेंगे।
रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।।
 
भक्ति भाव भोजन करवाना
कोमल शय्या उन्हें सुलाना
वन कठिन सहन की भीर, राम जी आयेंगे।
रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।।

प्रणतपाल दुखभंजन रघुबर
बरसायें नित नेह जनन पर
कृपासिन्धु मतिधीर, राम जी आयेंगे।
रे बिकल मना! धरु धीर, राम जी आयेंगे।।

- राजेश मिश्र।

आज राम घर आयेंगे

द्वार-देहरी दीप जलाओ 
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

पावन-पुरी अवध है हर्षित,
हर्षित भारत सारा है;
है हर्षित हर हिन्दू तन-मन,
प्रेम-गङ्ग हिय धारा है।
हिल-मिल सारे नाचो-गाओ
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

हर नारी है माँ कौशल्या
सुत की अपने राह तके;
हर नर में फिर जीवित दशरथ
राम दरश हित नैन थके।
बूढ़ी आँखों पलक बिछाओ
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

प्रिय हनुमत सन्देशा लाये
प्रभु बस आने वाले हैं;
भरत-रिपुदमन की हर पीड़ा
आज मिटाने वाले हैं।
शान्ता दीदी! थाल सजाओ
आज राम घर आयेंगे।
घर-घर मङ्गल-गान बजाओ 
आज राम घर आयेंगे।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 14 नवंबर 2020

आओ मिलकर दीप जलाएं ।।

आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

हर जन हों खुशहाल यहाँ पर, 
हर मन का अवसाद मिटाएँ ।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

हर कोने से भगे अँधेरा,
हर कोने में जगे उजाला ।
ज्ञान-प्रकाश चहूँ दिशि फैले,
हर हिय भरा प्रेम का प्याला ।।

ऐसी ज्योति जले जग जगमग,
छवि बिलोकि रवि कोटि लजाएँ ।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

भूखे पेट न सोए हरिया,
हर तन कपड़ा, हर मन शिक्षा । 
बिटिया निकले जब जी चाहे, 
बचपन कहीँ न माँगे भिक्षा ।।

घर-घर में पलतीं हों खुशियाँ , 
हम ऐसा इक राष्ट्र बनाएँ ।।
आओ मिलकर दीप जलाएँ ।।

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...