सोमवार, 15 सितंबर 2025
इसी देह में रहती तुम भी
रविवार, 14 सितंबर 2025
एक 'कबी'जी की व्यथा
हिंदी हिंदू-सी उदार है
हिंदी हिंदू-सी उदार है।
सरल सुलभ सबकी शिकार है।
हर आगंतुक को अपनाया,
पर देखो दुश्मन हजार हैं।
कभी कहीं घुसपैठ से पीड़ित,
राजनीति की कहीं मार है।
कन्वर्जन के कुटने करते,
शब्दों पर प्रतिदिन प्रहार हैं।
सब सहकर भी हँसती रहती,
सहनशक्ति इसकी अपार है।
स्वतंत्रता की सेनानी यह,
इसके तेवर धारदार हैं।
जिसने पहला शब्द सिखाया,
मस्तक नत यह बार-बार है।
संस्कृत के नातिन की नातिन,
चंदन भारत के लिलार है।
- राजेश मिश्र
शनिवार, 13 सितंबर 2025
चले जाना
शुक्रवार, 12 सितंबर 2025
अभी कहानी बाकी है
बुधवार, 10 सितंबर 2025
ललकार
मंगलवार, 9 सितंबर 2025
जागो सनातनियों
सोमवार, 8 सितंबर 2025
मोहन! मुरली मधुर बजाना
रविवार, 7 सितंबर 2025
तुम मेरी पहली प्रीत बने
शनिवार, 6 सितंबर 2025
न जाने क्यों
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
गुरु-वंदना
रविवार, 24 अगस्त 2025
देश में ही हम विदेशी हो गए हैं
शुक्रवार, 22 अगस्त 2025
आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो
बुधवार, 20 अगस्त 2025
अश्रु
मुक्तक
मंगलवार, 19 अगस्त 2025
क्यों आती सपनों में मेरे?
जब दिल मेरा तोड़ दिया है
मुझे तड़पता छोड़ दिया है
शपथ-वचन तुम सभी भुलाकर
चली गई जब मुझे रुलाकर
क्यों आती सपनों में मेरे?
पल भर को भी सोचा होता
मन को अपने टोका होता
पग जब उठे दूर जाने को
कोई और अंक पाने को
ठिठकी होती, सँभली होती
दुनिया अपनी बदली होती
पर तुमने तो दृष्टि घुमा ली
तब, जब मुझसे आँख चुरा ली
क्यों आती सपनों में मेरे?……(१)
मैं तो मगन-मगन रहता था
ताप-शीत हँस-हंँस सहता था
तुमसे ही सारी दुनिया थी
तुम मेरी प्यारी दुनिया थी
भोर तुम्हारी उठती पलकें
हंसीं शाम थीं झुकती पलकें
रात रँगीली, दिवस निराला
तुमने तहस-नहस कर डाला
क्यों आती सपनों में मेरे?……(२)
चलो मान लें अगर विवश थी
स्ववश नहीं थी, तुम परवश थी
एक नजर तो डाली होती
पलकें जरा उठा ली होती
हाँ, वाणी चुप रह सकती थी
आँखें तो सब कह सकती थीं
लेकिन मुझसे नजर बचाकर
चली गई मुख अगर फिराकर
क्यों आती सपनों में मेरे?……(३)
- राजेश मिश्र
शनिवार, 16 अगस्त 2025
लम्पट भँवरा
माली! तेरे सुघड़ बाग में
नवयौवनयुत हरित लता पर
जबसे प्यारी कली खिली है
लम्पट मधुकर दृष्टि गड़ाए
उसको प्रतिदिन निरख रहा है
मन में अपने मचल रहा है
जिस दिन भी यह फूल बनेगी
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
कली, छली का भाव न जाने
वह अबोध, पशु क्या पहचाने
उसको सब सच्चे लगते हैं
अच्छी है, अच्छे लगते हैं
कोई नहीं पराया उसको
अपना लेती मिलती जिसको
सोच रहा वह कुटिल मधुप पर
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
गुनगुन गुनगुन गुनगुन करता
बगिया में निशि-वासर फिरता
लता-लता, हर विटप निहारे
भँवरा भटके मारे-मारे
कहाँ, कौन, कब कली खिल रही
किस ममता के अङ्क पल रही
पता लगाता, मन मुसुकाता
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
चञ्चरीक जब तान सुनाए
भोले माली! तू हरषाए
नहीं जानता, वह लम्पट है
उसकी मीठी तान कपट है
बगिया की गलियों में घूमे
चूसे कुसुम, कली को चूमे
कली-कली को चूम बोलता
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
- राजेश मिश्र
शुक्रवार, 15 अगस्त 2025
तेरी लीला वह ही जाने, तू जतलाए जिसको
स्वतंत्रता दिवस
वीरों ने निज रक्तधार से
धरती को नहलाया।
सात समुन्दर पार पहुँचकर
ऊधम खूब मचाया।।
खोकर पुत्र-कन्त माँ-बहनों
ने आँसू न बहाया।
छाती ताने खड़ा तिरंगा
तब जाकर लहराया।।
- राजेश मिश्र
गुरुवार, 14 अगस्त 2025
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...
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लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और...
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मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है। मानव हैं हम, द्वेष सहज है।। निर्बल को जब सबल सताए, वह प्रतिकार नहीं कर पाए, मन पीड़ा से भर जाता है, द्वेष हृदय घ...
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बीते पलों के अफ़साने लिख रहा हूँ। जिंदगी मैं तेरे तराने लिख रहा हूँ॥ हालत कुछ यूँ कि वक्त काटे नहीं कटता, वक्त काटने के बहाने लिख रहा हूँ॥...