सोमवार, 15 सितंबर 2025

इसी देह में रहती तुम भी

देखो, बस मुझको मत देखो, 
खुद को भी देखो मुझमें ही। 
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।

तुमसे पहले एकाकी था 
सब सूना-सूना लगता था।
भरी सभा हो, भरा मंच हो
पर ऊना-ऊना लगता था।

एकाकीपन गया तुम्हीं से 
तुमसे पूरा खालीपन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।१।।

सुंदर सुष्ठु सुडौल देह यह 
सप्त-धातु से परिपूरित थी।
हृष्ट-पुष्ट तन दृष्टि सभी की 
अंदर क्या है, कब परिचित थी? 

तुमको पा चंचल मन नाचे
मधुर-मधुर गाए धड़कन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।२।।

ये तन केवल साधन ही थे 
आज मिले, कल फिर बिछड़ेंगे।
जनम-जनम का साथ हमारा
कोई तन ले आन मिलेंगे।

भाव हमारे यही रहेंगे
और यही होंगे चेतन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।३।।

ऊना = अपूर्ण, अधूरा।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 सितंबर 2025

एक 'कबी'जी की व्यथा

आज सुबह जैसे ही फेसबुक खोला, एक महिला का मित्रता अनुरोध दिखा। प्रोफाइल लॉक थी, फोटो थोड़ा छोटा था और आँखें कुछ कमजोर होने के कारण चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। फिर भी इतना अंदाज तो लग ही गया कि कोई उम्रदराज महिला हैं, न कि शिकारी फेसबुक बाला। अतः मित्रता अनुरोध स्वीकार कर लिया। 

फोटो को बड़ा करके देखा तो उजड़े बालों वाली, लटके गालों वाली, शुष्क-वक्षा, लंबोदरी देवीजी कुछ जानी-पहचानी सी लगीं। बहुत देर तक सोचता रहा, परन्तु याद नहीं आया कि कहाँ देखा है। अतः दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गया। किंतु देवीजी ने पीछा नहीं छोड़ा। उनका चेहरा रह-रहकर विचारों के द्वार पर थपकी देता रहा और मुझसे पूछता रहा—"पहचान कौन?"

छुट्टी का दिन था, अतः थोड़ी देर बाद फिर मोबाइल लेकर बैठ गया। फोटो को एक बार फिर बड़ा करके देखा और अचानक एक घटना मस्तिष्क में कौंध गई।

कल की ही बात थी। एक मित्र के यहाँ जुटान थी। एक 'कबी' जी भी आए थे। भाई लोग जुटे थे तो पकौड़ी-चाय के साथ हँसी-ठिठोली भी हो रही थी और ठहाके भी गूँज रहे थे। लेकिन 'कबी' जी अनमने-से, दु:ख की चादर ओढ़े, एक कोने में अछूत से बैठे थे, जैसे कोरोना के संभावित मरीज हों। पकौड़ी और चाय को भी उन्होंने मना कर दिया था। उनकी यह दशा मुझे खटकने लगी। जब रहा नहीं गया तो मैं उनका स्वास्थ्य परीक्षण करने उनके पास पहुँच गया। 

मैंने पूछा—"कैसे हैं भाई साहब? मुँह कुछ उतरा-उतरा दिख रहा है। स्वास्थ्य तो ठीक है न?"

उन्होंने कहा—"अरे! नहीं, स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है।"

मैं: "घर पर कोई समस्या है क्या? भाभी-बच्चे सब लोग ठीक-ठाक हैं न?"

'कबी' जी: "हाँ-हाँ, सब लोग ठीक-ठाक हैं। कोई समस्या नहीं है।"

मैं: "तो फिर आप इतना लम्बा सा मुँह लटकाए क्यों बैठे हैं?"

'कबी' जी ने‌ वहाँ बैठे समाज की तरफ दृष्टि डालते हुए कहा—"छोड़िए जाने दीजिए, यहाँ इस विषय पर बात करना ठीक नहीं होगा।"

उनके मंतव्य को समझते हुए मैंने कहा—"चिंता मत कीजिए। हमारी बातचीत की ओर किसी का ध्यान नहीं है। बताइए क्या बात है?"

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद 'कबी' जी ने कहा—"अरे यार! क्या बताएँ। आजकल पोस्ट पर लाइक-कमेंट आना बहुत कम हो गए हैं। कितना भी अच्छा लिखो, दोहरे अंकों तक भी नहीं पहुँचते हैं।"

बात तो सही थी। उनकी पीड़ा का कुछ-कुछ अनुभव तो मुझे हुआ, लेकिन मैं उसे पूरी तरह नहीं समझ सकता था क्योंकि मेरे लाइक-कमेंट दोहरे अंकों में पहुँचते हैं। मेरे प्रिय चिरंजीवी अनुज राकेश मिश्र 'सरयूपारीण' तो तिहरे अंको का आनंद ले रहे हैं। फिर भी उनके दर्द को साझा करते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई और कहा—

"कृपा कहीं अटकी हुई है। कुछ दिन का अवकाश ले लीजिए, चिंतन-मनन कीजिए और नए कलेवर में नया विषय लेकर आइए। खोया यश अवश्य प्राप्त होगा।"

मेरा सुझाव उन्हें रास नहीं आया। 'वृद्धिरेचि' की भाँति उनकी अधीरता बढ़ गई और बोले—"अवकाश ले लूँ? आप जानते हैं न कि एक बार पोस्ट करना बंद कर दिया तो जो भी रहे-सहे प्रशंसक हैं, वे भी नहीं बचेंगे। अच्छा मजाक कर लेते हैं आप।"

मैंने कहा—"तो फिर अलग-अलग ग्रुप में पोस्ट कीजिए। हो सकता है कुछ प्रशंसक बढ़ जाएँ।"

वह बोले—"वह भी करके देख लिया, कोई लाभ नहीं।"

मैंने कहा—"जो आपके पुराने प्रशंसक रहे हैं, उनको टैग करके देखिए।"

उन्होंने कहा—"कोशिश की थी। कुछ दिन तक तो सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी। फिर उन्होंने उपेक्षा करना प्रारंभ कर दिया।"

मैंने कहा—"वैसे आपकी मित्रता सूची 5000 की ऊपरी सीमा तक पहुँच गई है। क्यों न उन लोगों को अपने मित्रता सूची से हटा दीजिए जो प्रतिक्रिया नहीं देते हैं, और नए लोगों को आने दीजिए। इससे संभवत: कुछ लाभ हो।"

उन्होंने कहा—"वह भी करके देख लिया। कुछ नहीं हुआ।"

जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ती जा रही थी, वह और भी अधीर होते जा रहे थे। धैर्य तो मेरा भी टूटने लगा था। अतः थोड़ा सा तंज कसते हुए मैंने कहा—"फिर तो मुझे इस जीवन में कोई उपाय नहीं सूझ रहा। अब प्रभु से प्रार्थना करिए कि अगले जन्म में आपको महिला बनाएँ, क्योंकि वे यदि अपना फोटो डालकर केवल इतना भी लिख देती हैं कि "कैसी लग रही हूँ", तो भी चार अंको का लाइक-कमेंट एंजॉय करती हैं।" और कहने के बाद थोड़ा सा मुस्कुरा दिया।

वह कुछ देर मेरी ओर टकटकी लगाए देखते रहे, फिर बिना कुछ कहे झटके से उठे और चल दिए। मित्रों में से कुछ मुझसे अप्रसन्न हो गए, तो कुछ ने सांत्वना देते हुए कहा—"कोई बात नहीं भाई! सब ठीक हो जाएगा।" शाम को मैं भारी मन से घर वापस आया और मन-ही-मन उनसे कई बार क्षमा भी माँगी‌।

लेकिन मुझे क्या पता था कि उनका पुनर्जन्म इतनी जल्दी हो जाएगा, और वह भी उसी शरीर और उसी प्रौढ़वस्था के साथ। 24 घंटे के भीतर हुए उनके इस पुनर्जन्म से मैं हत्प्रभ था और अब भी हूँ।

- राजेश मिश्र

हिंदी हिंदू-सी उदार है

हिंदी हिंदू-सी उदार है।

सरल सुलभ सबकी शिकार है।


हर आगंतुक को अपनाया,

पर देखो दुश्मन हजार हैं।


कभी कहीं घुसपैठ से पीड़ित,

राजनीति की कहीं मार है।


कन्वर्जन के कुटने करते,

शब्दों पर प्रतिदिन प्रहार हैं।


सब सहकर भी हँसती रहती,

सहनशक्ति इसकी अपार है।


स्वतंत्रता की सेनानी यह,

इसके तेवर धारदार हैं।


जिसने पहला शब्द सिखाया,

मस्तक नत यह बार-बार है।


संस्कृत के नातिन की नातिन,

चंदन भारत के लिलार है।


- राजेश मिश्र

शनिवार, 13 सितंबर 2025

चले जाना

चन्द दिन और रुक जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

तुम्हें देखा नहीं अब तक
तुम्हें जाना नहीं अब तक
जरा मैं देख लूँ तुमको
जरा मैं जान लूँ तुमको

निकट कुछ और आ जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

नयन थे राह पर अटके
श्रवण चौकस, कहीं खटके
कोकिला कूक उठती थी
हृदय में हूक उठती थी

हृदय मेरे उतर जाओ, चले जाना। 
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

जले दिन-रात बरसों से
मिले हो बाद बरसों के
अगर तुम आज जाओगे
कहो, कब लौट आओगे

वजह जीने की दे जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

अभी कहानी बाकी है

दृग में पानी बाकी है।
अभी कहानी बाकी है।

साँस शिशिर की टूट रही,
कोंपल आनी बाकी है।

हार अभी से मत मानो,
अभी जवानी बाकी है।

निर्णय अभी अधर में है,
खींचातानी बाकी है।

जीते नहीं अभी भी तुम,
इक्का-रानी बाकी है।

बहुतेरी बातें बदलीं,
पर मनमानी बाकी है।

रिश्ता अपना जीवित है,
अभी रवानी बाकी है।

अब भी वह रहती मुझमें,
याद सुहानी बाकी है।

जिससे उस पर दिल आया
वह नादानी बाकी है।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 10 सितंबर 2025

ललकार

वे जो घात लगाये बैठे
सतत लार टपकाये बैठे 
श्रीलंकाई, बांग्लादेशी
नेपाली घटनाओं जैसी 
घटना कोई भारत में हो 
देश हमारा गारत में हो
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।१।।

हाँ कुछ सदियों पराधीन थे
बँटे हुए थे, दीन-हीन थे
लेकिन वह पल बदल गया है
भारतवासी सँभल गया है
अब कोई आक्रांता आये
इस धरती पर आँख उठाये
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।२।।

अरब फारसी यूनानी हो
हूण मुगल या क्रिस्तानी हो 
डीप स्टेट, दलाल हों उसके
बार-मेड या लाल हों उसके
अरि पूरब पश्चिम उत्तर में
आस्तीन के साँप जो घर में
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।३।।

श्रेष्ठ हमारे महाबली थे
लेकिन दुश्मन क्रूर छली थे
ये शरणागत के रक्षक थे
वे अपनों के ही भक्षक थे
मानवता को नृशंसता से 
जिनने कुचला बर्बरता से
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।४।।

भारत जिनको खटक रहा है
गले सनातन अटक रहा है 
या तो अपनी सोच बदल लें
अब भभूत माथे पर मल लें
छोड़ें टोपी, क्रॉस उतारें
केसरिया बाना तन धारें
या भ्रम उनका दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।५।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

जागो सनातनियों

उदयाचल से सूरज निकला
घोर अँधेरा भाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।

वर्षों बाद समय बदला है 
तुम उन्नीस से बीस हुए।
रही सैकड़ों साल गुलामी 
तब फिर सत्ताधीश हुए। 

सतत सतर्क रहो तुमसे यह
वचन राष्ट्र अब माँग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।१।।

हाँ वे अब कमजोर हुए हैं
लेकिन हार नहीं मानी है।
चुप हैं, पर मौका मिलते ही
हमला करने की ठानी है।

घाती हैं, वे घात करेंगे
उनका यह अंदाज रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।२।।

काश्मीर में सिद्ध किया फिर
जड़ उन्मादी अंधे हैं वे।
देश-राष्ट्र का अर्थ न कोई
बस इस्लामी बंदे हैं वे।

लाल चौक रिपु रुधिर से धो दो 
जो मस्तक का दाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।३।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 8 सितंबर 2025

मोहन! मुरली मधुर बजाना

मोहन! मुरली मधुर बजाना।

मन प्यासा है, अभिलाषा है,
मीठी तान सुनाना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

जिस मुरली-धुन राधा रीझी
गोपिन सुध-बुध खोईं।
धेनु स्रवैं पय बिनु बछड़ा के 
तान सुनाओ सोई।

श्रवण हमारे, विकल मुरारे!
इनका क्लेश नसाना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

नष्ट अधर्म हुआ जिस धुन से
धर्म-ध्वजा फहराई।
भरी सभा में कौतुक करके 
अनुजा-लाज बचाई।

हे अविनाशी! पाप-विनाशी 
छेड़ो वही तराना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

जिस धुन उपजी पावन गीता
अर्जुन मोह मिटाया।
पढ़त-सुनत जन-मन दुखभंजक
मुक्ति-मार्ग बतलाया।

हे यदुनंदन! असुरनिकंदन!
नेह-मेह बरसाना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 7 सितंबर 2025

तुम मेरी पहली प्रीत बने

जग की सारी खुशियाँ पा ली
तुम जो मेरे मीत बने।
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।

प्रथम मिलन पर आंखें अपनी 
ज्यों ही दो से घार हुईं।
मन-वीणा के तारों में मृदु 
मद्धिम सी झनकार हुई।।
स्वर, लय, ताल उठे हो चेतन 
और नए संगीत बने।
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।१।।

धीरे-धीरे मौन नैन का 
मुखरित वाणी तक आया।
मधुर-मधुर शब्दों में ढलकर
कानों से जा टकराया।
छंदों की गोदी जा बैठा
अरु जीवन के गीत बने।
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।२।।

पाना और गँवाना, जग में
यही सदा व्यापार रहा।
सुखद मिलन, दुखप्रद बिछुड़न ही
प्रेम-नदी आधार रहा।
हो संयोग-वियोग सभी में
त्याग प्रेम की रीत बने। 
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।३।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 6 सितंबर 2025

न जाने क्यों

न जाने क्यों!
देखकर तुमको पिघलता है मेरा मन,
ज्यों हिमालय पिघलता हो,
छू सुनहरी रश्मियों को।।

भाव-जल पूरित तुम्हारे युगल-लोचन,
लजा देते हैं अपरिमित उदन्वत् को।
जलधि जल खारा, दृगों के भाव मधु सम,
सिक्त करते, तृप्त करते, तप्त हृत को।

न जाने क्यों!
देखकर तुमको उमगता है मेरा मन,
तृषित सागर उमगता ज्यों 
अंक भरकर निर्झरी को।।

सघन घन जैसे तुम्हारे कृष्ण कुन्तल,
खेलते हैं चन्द्रमुख से नत निरंतर।
तन अलौकिक सत्त्वगुण की मूर्ति कोई
आ गई हो उतरकर देवी धरा पर। 

न जाने क्यों!
देखकर तुमको विनत होता मेरा मन,
पृथुल पुष्कर विनत हो ज्यों 
चूमकर विश्वम्भरा को।।

उदन्वत् = समुद्र 
पृथुल = विशाल 
पुष्कर = आकाश
विश्वम्भरा = पृथ्वी

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

गुरु-वंदना

गुरु वह दीपक जो जलकर भी 
देता है उजियारा।
सद्गुरु-कृपा काट देती है 
जड़ भव-बंधन सारा।।

उदित जहाँ से बहती झर-झर
सतत ज्ञान की धारा।
तरणी बनकर भवसागर से 
जिसने पर उतारा।।

संस्कार की गंगा-यमुना 
जिससे नित बहती है।
जिसकी छाया में मानवता 
नित पलती रहती है।।
 
जिसका सुमिरन, जिसका चिंतन 
कठिन क्लेश है हरता।
उन गुरु-चरणों में नत तन-मन
जीवन जहाँ सँवरता।

- राजेश मिश्र

रविवार, 24 अगस्त 2025

देश में ही हम विदेशी हो गए हैं

वे घृणा के बीज ऐसे बो गए हैं,
देश में ही हम विदेशी हो गए हैं।

मनुज हो या श्वान या पशु और कोई,
आप घर बेघर स्वदेशी हो गए हैं।

मान लो! सम्भव नहीं उनको जगाना,
जागते हैं, और मुँह ढँक सो गए हैं।

सेज कुक्कुर, सड़क पर माता-पिता हैं,
पतित होकर आज क्या हम हो गए हैं।

मरे कोई, जिए कोई, फर्क क्या है,
आँख के आँसू कहीं पर खो गए हैं।

अज्ञ हैं घर में हमारे कौन, कैसा
दूसरों में व्यस्त इतने हो गए हैं।

रो रहे होंगे कहीं पर बैठकर वे,
धर्म पर, इस राष्ट्र पर मिट जो गए हैं।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो

आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।

हाँ, सुनाओ गीत कोई
प्रेम हो, अनुराग भी हो।
हो सरस सङ्गीत सज्जित
ताल स्वर लय राग भी हो।

मनस् मीठे भाव भर दे, प्रीति का पैगाम दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।१।।

या सुनाओ परम पावन 
कथा दमयंती की नल की।
अमित साहस शौर्य निष्ठा
त्याग तप धीरज अचल की।

आत्मगौरव आत्मचिन्तन ज्ञान दे सम्मान दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।२।।

या सुनाओ तान मीठी
कृष्ण की प्रिय बाँसुरी की।
राधिका के समर्पण की 
गोपिका मन माधुरी की।

तृषित तन-मन तृप्त कर दे, भक्ति का वरदान दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।१।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 20 अगस्त 2025

अश्रु

हर दशा में साथ रहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।
मौन रह हर बात कहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।।

चिर प्रतीक्षित कामना जब
पूर्ण हो जाती कभी 
हर्ष का संदेश लेकर 
ढुलक पड़ते हैं तभी 
टीस को ले साथ बहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(१)

प्रिय हमें बिछड़ा हुआ जब 
कोई सहसा आ मिले
भावना उर की उफनती
साथ अपने ले चलें
मगन मन का हाल कहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(२)

दाहता दुख जब अपरिमित 
हो व्यथा सहना कठिन
घुट रहे हों हम अकेले
तड़पते हों रात-दिन
दग्ध दिल का दाह सहते 
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(३)

- राजेश मिश्र

मुक्तक

(१)
मेरे भावों की समिधा पर,
तुम चाहे जितना जल डालो।
उसे हविस् कर, राष्ट्र-यज्ञ में,
मैं आहुति देता जाऊँगा।।

हविस् = घृत

(२)

पता है तुमने देखा दरवाजे से जाते मुझको,
हिला था खिड़की का परदा तुम्हारे ओट लेने पर।

(३)

कविगण दया करिए।
कुछ तो नया करिए।।

निशि-दिन इश्क के चर्चे,
और कुछ बयाँ करिए।।

(४)

उसे अति अभिमान था अपने होने का,
वह नहीं है, फिर भी दुनिया चल रही है।

(५)

मेरे पथ पर बीज बोये तुमने कीकर समझकर,
पर मैंने पाया पारिजात के पौथे खिले हुए।

कीकर = बबूल

(६)

ऐसा उलझा हूँ तेरे मधुर मन्दहास के इन्द्रजाल में,
छटपटा रहा हूँ निकलने को, किन्तु गाँठ नहीं मिलती।

७)

लीन थे हम अपनी साधना में,
जगत के प्रपंच से मुँह मोड़कर।
री मेनके! क्यों आई पल भर को
फिर चली गई तड़पता छोड़कर

८)

सुर्ख़ लबों पर तेरे मेरा नाम क्या आया,
हंगामा बरप रहा है महफ़िल में मुसलसल।।

(९)

देखो, बस मुझको मत देखो, 
खुद को भी देखो मुझमें ही। 
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।

(10)

वर्षों बाद छँटे थे बादल चाँद नजर आया था।
अमृतपान कर शुष्क हृदय यह अतिशय हर्षाया था।
किंतु क्षणिक था वह उजियारा घने घनों में खोया,
मैं हतभाग्य, भाग्य में मैंने अँधियारा पाया था।।

(11)

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

क्यों आती सपनों में मेरे?

जब दिल मेरा तोड़ दिया है

मुझे तड़पता छोड़ दिया है 

शपथ-वचन तुम सभी भुलाकर 

चली गई जब मुझे रुलाकर

क्यों आती सपनों में मेरे?


पल भर को भी सोचा होता 

मन को अपने टोका होता 

पग जब उठे दूर जाने को 

कोई और अंक पाने को 

ठिठकी होती, सँभली होती

दुनिया अपनी बदली होती 

पर तुमने तो दृष्टि घुमा ली 

तब, जब मुझसे आँख चुरा ली 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(१)


मैं तो मगन-मगन रहता था 

ताप-शीत हँस-हंँस सहता था 

तुमसे ही सारी दुनिया थी 

तुम मेरी प्यारी दुनिया थी 

भोर तुम्हारी उठती पलकें

हंसीं शाम थीं झुकती पलकें

रात रँगीली, दिवस निराला 

तुमने तहस-नहस कर डाला 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(२)


चलो मान लें अगर विवश थी

स्ववश नहीं थी, तुम परवश थी

एक नजर तो डाली होती

पलकें जरा उठा ली होती

हाँ, वाणी चुप रह सकती थी

आँखें तो सब कह सकती थीं 

लेकिन मुझसे नजर बचाकर

चली गई मुख अगर फिराकर 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(३)


- राजेश मिश्र

शनिवार, 16 अगस्त 2025

लम्पट भँवरा

माली! तेरे सुघड़ बाग में

नवयौवनयुत हरित लता पर

जबसे प्यारी कली खिली है 

लम्पट मधुकर दृष्टि गड़ाए

उसको प्रतिदिन निरख रहा है

मन में अपने मचल रहा है

जिस दिन भी यह फूल बनेगी

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


कली, छली का भाव न जाने

वह अबोध, पशु क्या पहचाने 

उसको सब सच्चे लगते हैं 

अच्छी है, अच्छे लगते हैं 

कोई नहीं पराया उसको

अपना लेती मिलती जिसको

सोच रहा वह कुटिल मधुप पर 

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


गुनगुन गुनगुन गुनगुन करता

बगिया में निशि-वासर फिरता

लता-लता, हर विटप निहारे 

भँवरा भटके मारे-मारे 

कहाँ, कौन, कब कली खिल रही

किस ममता के अङ्क पल रही 

पता लगाता, मन मुसुकाता

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


चञ्चरीक जब तान सुनाए 

भोले माली! तू हरषाए

नहीं जानता, वह लम्पट है

उसकी मीठी तान कपट है

बगिया की गलियों में घूमे

चूसे कुसुम, कली को चूमे 

कली-कली को चूम बोलता 

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

तेरी लीला वह ही जाने, तू जतलाए जिसको

जन्म लिया है कोख से किसकी, 
मिले बधाई किसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…

कौन जानता कारागृह में 
क्या लीला दिखलाई।
हर्षित हैं वसुदेव-देवकी 
झूमे जसुदा माई।
बाबा नंद मगन-मन नाचें 
सुध-बुध किसकी किसको
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(1)

गगनगिरा सुन कैद में डाला 
बहन प्राण से प्यारी।
बालक मारे, नहीं विचारे 
खल पापी कुविचारी।
कंस अभागा कभी न जागा 
मारा चाहे किसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(2)

घर-घर मंगलगान बज रहा 
मुदित नगर नर-नारी।
बाल-वृद्ध वय भूल कूदते 
चहुँदिसि उत्सव भारी।
हे जगवंदन! दारुण बन्धन 
भव का, काटो इसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(3)

- राजेश मिश्र

स्वतंत्रता दिवस

वीरों ने निज रक्तधार से 

धरती को नहलाया।

सात समुन्दर पार पहुँचकर 

ऊधम खूब मचाया।।

खोकर पुत्र-कन्त माँ-बहनों 

ने आँसू  न बहाया‌।

छाती ताने खड़ा तिरंगा 

तब जाकर लहराया।।


- राजेश मिश्र 

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस

"विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" पर व्यथित हृदय की अभिव्यक्ति…

आओ, फिर से याद करें हम 
भरकर आँख में पानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।

पुश्तों से जाने-पहचाने
गाँव, गली, चौबारे।
चूल्हा, चाकी, चौकी, चौखट 
घर, बगिया ये सारे।
इक रेखा से हुए पराये
किसकी कारस्तानी?
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।१।।

धन-दौलत, पुरखों की थाती
लूट लिए आराती।
बेटे कटे, बेटियाँ लुट गईं
फटती है सुन छाती।
लाशों को भर-भर ट्रेनों में
भेजी गई निशानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।२।।

बचते, छुपते, गिरते-पड़ते
जीवन ले जो आए।
अपनापन ले, आस लगाए
आकर हुए पराए।
रोटी, कपड़ा, घर न दे सके 
दुश्चरित्र, अभिमानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।३।।

- राजेश मिश्र

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...