गुरुवार, 14 अगस्त 2025

चित्तभूमियाँ

क्षिप्तं, मूढं, विक्षिप्तमेकाग्रं, निरुद्धमिति चित्तभूमय:।


क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निररुद्ध -  चित्त की ये पाँच भूमियाँ होती हैं।


सारी सृष्टि सत्त्व, राजस् और तमस् - इन तीन गुणों का ही परिणाम है। एक धर्म, आकार अथवा रूप को छोड़कर दूसरे धर्म, आकार अथवा रूप के धारण करने को परिणाम कहते हैं। चित्त इन गुणों का सर्वप्रथम सत्त्वप्रधान परिणाम है। इसीलिए इसको चित्तसत्त्व भी कहते हैं। 


यह सारा स्थूल जगत जिसमें हमारा व्यवहार चल रहा है, रज तथा तमप्रधान गुणो का परिणाम है। इसके बाह्य तथा अभ्यंतर संसर्ग से जो चित्तसत्त्व में क्षण-क्षण गुणों का परिणाम हो रहा है, उसकी चित्तवृत्ति कहते हैं। 


चित्तसत्त्व ज्ञान स्वभाव वाला है। जब उसमें रजोगुण और तमोगुण का मेल होता है तब ऐश्वर्य, विषय प्रिय होते हैं। जब यह तमोगुण से युक्त होता है, तब अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य को प्राप्त होता है। यही चित्त जब तमोगुण के नष्ट होने पर रजोगुण के अंश से युक्त होता है, तब धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्या को प्राप्त होता है। घोड़े की साम्यता ही चित्त की भूमियों या अवस्थाओं का आधार है।


१. क्षिप्त

इसमें रजोगुण की प्रधानता होती है। तम और सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह राग-द्वेषादि के कारण होती है। इस अवस्था में धर्म-अधर्म, राग-विराग, ज्ञान-अज्ञान, ऐश्वर्य तथा अनैश्वर्य में प्रवृत्ति होती है। जब तमोगुण सत्त्वगुण को दबा लेता है तब अधर्म अज्ञानादि और जब सत्त्व तम को दबा लेता है, तब धर्म, ज्ञानादि में प्रवृत्ति होती है। साधारण सांसारिक मनुष्य इसी अवस्था में रहते हैं।


२. मूढ

इस अवस्था में तम प्रधान होता है। रज तथा सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह काम, क्रोध, लोभ और मोह के कारण होती है। चित्र की ऐसी अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति अज्ञान, अधर्म, राग और अनैश्वर्य में होती है। यह अवस्था नीच मनुष्यों की है।


३. विक्षिप्त 

इस अवस्था में सत्त्वगुण प्रधान रहता है तथा रज और तम दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह निष्काम कर्म करने तथा राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ और मोह के छोड़ने से उत्पन्न होती है। इस अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में होती है। किंतु रजोगुण बीच-बीच में विक्षेप उत्पन्न करता रहता है। यह अवस्था ऊँचे मनुष्यों तथा जिज्ञासुओं की है।


४. एकाग्र 

चित्त में एक ही विषय में सदृश वृत्तियों का प्रवाह निरंतर बने रहने को एकाग्रता कहते हैं। यह चित्त की स्वाभाविक अवस्था है। इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण पूरी तरह से दबे हुए रहते हैं। इसे सम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसकी अंतिम स्थिति विवेकख्याति है।


५. निरुद्ध

विवेकख्याति द्वारा जब चित्र और पुरुष के भेद का साक्षात्कार हो जाता है, तब उस विवेकख्याति से भी वैराग्य हो जाता है। यह पर वैराग्य है। इससे उस अंतिम वृत्ति का भी निरोध हो जाता है, केवल पर वैराग्य के संस्कार मंत्र शेष होते हैं। सर्व वृत्तियों के निरोध की इस अंतिम निरुद्धाभावस्था को असम्प्रज्ञात या निर्बीज समाधि भी कहते हैं।


**वह सर्वोच्च, निर्मल ज्ञान जिससे चित्त और पुरुष के भेद का पता चलता है, विवेकख्याति कहलाता है।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!

वचन पावन मत भुलाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!

बस तुम्हारे सँग रहूँगी,
तपन-शीतलता सहूँगी।
सुख सभी तुमको समर्पित,
दुख तुम्हारा बाँट लूँगी।।

विकल तन-मन तरस खाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(१)

भूख को व्रत जान लूँगी,
तरु तले घर मान लूँगी।
कामनाएँ त्याग सारी
इक तुम्हारा नाम लूँगी।।

साथ ले लो, मान जाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(२)

ये महल के भोग सारे,
वसन-भूषन बिन तुम्हारे।
दाहते तन, ले चलो बस
वपुस् वल्कल वस्त्र धारे।।

विरह-दुख में मत जलाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(३)

- राजेश मिश्र

योग करें, नीरोग रहें

शरीर और मन का अन्योन्याश्रित संबंध है। सभी शारीरिक क्रियाओं और कार्यों का मन पर तथा मानसिक संकल्प-विकल्प व भावनाओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता ही है। उसमें मन का शरीर के ऊपर अधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य अपनी मनमानी और आचार-विचार के कारण पग-पग पर समस्याओं को आमंत्रित करता रहता है और दुःखी होता है। मन पर नियंत्रण उसे इन दुःखों से बचा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने विविध योग-प्रक्रियाओं की रचना की, जिन्हें अपनाकर शरीर और मन में संतुलन स्थापित किया जा सकता है और मन को नियंत्रित किया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान भी व्यक्तित्व विकास में मन की भूमिका को पूरी तरह स्वीकार करता है। 

अतः योग करें, नीरोग रहें।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

पातंजल योगसूत्र

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि।।

भोजराज जी द्वारा महर्षि पतंजलि की यह स्तुति योगाभ्यासियों में अत्यंत प्रचलित है।  योग, व्याकरण और आयुर्वेद के क्षेत्रों में उनकी देन अभूतपूर्व है और मानवजन की आने वाली पीढ़ियों को प्रलयान्त तक लाभान्वित करती रहेगी। चूंकि मैं भी कुछ अंशों तक योग से जुड़ा हुआ हूं, अतः यथासंभव और यथाशक्ति किंचित अध्ययन होता रहता है। इसी क्रम में थोड़ा-बहुत अध्ययन 'पातंजल योगसूत्र' का भी हुआ है।

भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा में योग का विशेष स्थान है। इससे संबंधित अनेकानेक ग्रन्थों में 'पातंजल योगसूत्र' का स्थान सर्वोपरि है जो कि योग का सर्वाधिक प्रामाणिक और व्यवस्थित ग्रंथ है। चार पादों (अध्यायों) के केवल 195 सूत्रों में सारा जीवन-दर्शन समेट दिया है जिस पर कई भाष्य और टीकाएं लिखी गईं, लिखी जा रही हैं और लिखी जाएंगी। चाहे जितनी बार गोते लगाइए, इसकी गहराई का पार पाना आसान नहीं है। लेकिन यह सुनिश्चित है कि जितना डूबते जाएंगे, उतना ही आनंद के रस में सराबोर होते जाएंगे और फिर मन यही चाहेगा कि बस यहीं पड़े रहें। प्रत्येक पाद के नाम और सूत्रों की संख्या इस प्रकार है -

१. समाधिपाद - 51 सूत्र 
२. साधनपाद - 55 सूत्र 
३. विभूतिपाद - 55 सूत्र 
४. कैवल्यपाद - 34 सूत्र

प्रथम पाद में योग के स्वरूप समाधि, द्वितीय पाद में उसका साधन, तृतीय पाद में उससे होने वाली सिद्धियों तथा चतुर्थ पाद में कैवल्य का वर्णन किया है।

क्योंकि इस समय संस्कृत-सप्ताह चल रहा है, तो मन में आया कि कुछ और भले नहीं कर सकते, संस्कृत में कुछ पोस्ट तो किया ही जा सकता है। अब इतनी विद्वत्ता तो नहीं है कि संस्कृत में कुछ लेख या कविता इत्यादि लिख सकें, लेकिन कहीं से पढ़कर कुछ लाइनें तो पोस्ट की जा सकती हैं। सोचा कि कुछ अलग विषय लिया जाए तो 'पातंजल योगसूत्र' का विचार मन में आया कि क्यों न इसी का एक सूत्र शब्दार्थ और सूत्रार्थ के साथ प्रतिदिन पोस्ट किया जाए। साथ ही यदि संभव हुआ तो बीच-बीच में किन्ही विषयों पर अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ प्रकाश डालने का भी प्राय एस किया जाए। उसी के प्रति लोगों के ध्यानाकर्षण हेतु यथामति अनधिकार चेष्टा करते हुए यहां इस ग्रंथ के विषय में उल्लेख करने का दुस्साहस किया है। आशा है कि विद्वज्जन मेरी इस धृष्टता के लिए क्षमा करेंगे। 

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

प्रेम की पूंजी तुम्हारी ले हृदय में घूमता हूं।

भीड़ में सबको भुलाकर बस तुम्हीं को ढूंढता हूं।

उम्र अब चढ़ने लगी है, 

थकन भी बढ़ने लगी है,

हर तरह के भार से अब मुक्त होना चाहता हूं,

भूल कर तुमको स्वयं से युक्त होना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


हां हृदय फटता है मेरा, सोचकर तुमसे जुदाई।

इस जुदाई में छिपी है, किंतु दोनों की भलाई।

मोह बढ़ता जा रहा है,

धैर्य घटता जा रहा है,

डिग न जाएं कदम मेरे अडिग रहना चाहता हूं,

छोड़कर अनुकूल धारा उलट बहना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


कठिन था मैंने मगर मन को प्रिये! समझ लिया है।

इस जगत में अभिलषित जो भी रहा वह पा लिया है।

मन को मेरे जानती हो,

तुम मुझे पहचानती हो,

बस तुम्हीं हिय में रही हो पुनः कहना चाहता हूं,

कर लिया संकल्प उस पर अटल रहना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


- राजेश मिश्र 


बुधवार, 18 जून 2025

मुझ पातकी का मोहन! उद्धार नाथ कर दो

मुझ पातकी का मोहन! 
उद्धार नाथ कर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
मुझको सनाथ कर दो।।

मद-राग-द्वेष भगवन्!
पल-पल सता रहे हैं।
मैं निस्सहाय निर्बल
निशि-दिन जता रहे हैं।

बन बल अबल, जड़ों से 
इनका विनाश कर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
मुझको सनाथ कर दो।।१।।

मतिमन्द मैं न जानूँ
कैसे तुम्हें रिझाऊँ?
किस नाम से पुकारूँ?
कैसे समीप आऊँ?

मुख से न कह सको तो,
संकेत मात्र कर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
मुझको सनाथ कर दो।।२।।

तम ने जकड़ रखा है,
पथ सूझता न कोई।
भटकाव, ठोकरें हैं,
अरु आसरा न कोई।

अपनी शरण में ले लो,
पथ पर प्रकाश भर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
 मुझको सनाथ कर दो।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 19 जनवरी 2025

मानव हैं हम द्वेष सहज है

मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है।
मानव हैं हम, द्वेष सहज है।।

निर्बल को जब सबल सताए,
वह प्रतिकार नहीं कर पाए,
मन पीड़ा से भर जाता है, 
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

वचन कठोर बोलता कोई,
जब औकात तोलता कोई,
व्यक्ति जहाँ जब डर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

जब कोई प्रिय वस्तु हमारी,
लगती जो प्राणों से प्यारी,
कोई हमसे हर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

जब जीवन दुखमय हो अपना,
सुख बस बन जाए इक सपना,
औरों का सुख खल जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

कर्महीन जब हम होते हैं,
दैव-दैव करते रोते हैं,
कर्मठ आगे बढ़ जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

आशंका से त्रस्त रहें जब,
तिरस्कार-दुत्कार सहें जब,
प्रेम हृदय का मर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

यद्यपि द्वेष सहज होता है,
किंतु सदा दुखप्रद होता है।
शांति हमारी हर लेता है,
क्रोध-घृणा मन भर देता है।

तिल-तिल हमें जलाता रहता,
रोगी सतत बनाता रहता।
तन-मन को दूषित कर देता,
अंदर विष-ही-विष भर देता।

सुहृद दूर हो जाते सारे,
सुख सपने बन जाते सारे।
कोई निकट नहीं आता है,
यह एकाकी कर जाता है।

सारा ज्ञान नष्ट कर देता।
निर्मल बुद्धि भ्रष्ट कर देता।
पापाचार बढ़ा देता है।
जीवन नर्क बना देता है।

दावानल यह द्वेष सहज है।
इसको तज पाना अचरज है।‌।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 13 जनवरी 2025

चुपके-चुपके मुझको देखें

चुपके-चुपके मुझको देखें,
मैं देखूँ तो छुप जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।

आँखें चञ्चल हिरनी जैसी,
सतत कुलाँचें भरती हैं।
पल को झाँके, पल में भागे,
पल भर सद्य ठहरती है।

खुलती मधुर अधर कलियों पर,
लोलुप भँवरे लुट जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।१।।

कांत-कपोल अरुण आभा से
हृदय-कमल खिल जाता है।
भावों की भावन सुगंध से
मन महमह महकाता है।

दंतावलि-द्युति चकाचौंध पर
लाखों दिनकर झुक जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।२।।

अलकें लोल कलोल निरत नित
अंग-अंग को चूम रहीं।
अन्-अधिकृत अंगों पर जहँ-तहँ
आवारा बन घूम रहीं।

लालायित द्वेषित दृग सबके
मुझ भागी पर उठ जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 11 जनवरी 2025

हिंदी की शुद्धता

हमारी संस्कृति और परंपरा में माता-पिता का स्थान सर्वोच्च है, और इन दोनों में भी माता प्रथम पूजनीया है। कहा गया है कि यदि माता और पिता दोनों साथ में बैठे हों तो पहले माता को प्रणाम करना चाहिए, तत्पश्चात पिता को। उल्लेखनीय है कि जब भगवान राम वनगमन के लिए तत्पर हुए तो माता कौशल्या ने उनसे कहा -

जौं केवल पितु आयसु ताता। 
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।
तौ कानन सत अवध समाना।।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है -

जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

स्कंद पुराण में माता के संबंध में उद्धृत है कि - 

नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गति:। नास्ति मातृसमा त्राण नास्ति मात्सया प्रपा।। 

विभिन्न शास्त्र बार-बार माता की महिमा का बखान करते हैं। साथ ही ध्यातव्य  है कि माता शब्द केवल जन्मदात्री के लिए रूढ़ नहीं है। इसकी व्यापकता जड़ से चेतन और स्थूल से सूक्ष्म तक सर्वत्र है। इन्हीं असंख्य माताओं में एक माता हमारी भाषा भी है। उदाहरण के लिए संस्कृत भाषा की वंदना करते हुए कहा जाता है कि -

वन्दे संस्कृत मातरम्।

राजभाषा और हमारी मातृभाषा हिंदी भी हमारी इन्ही पूजनीय माताओं में से एक है। भारतवर्ष की अनेकानेक भाषाओं की भाँति हिंदी का भी उद्भव-स्रोत संस्कृत ही है और विकास-क्रम संस्कृत - पालि - प्राकृत - अपभ्रंश - अवहट्ट - खड़ी बोली है।

विदेशी आक्रमणों, मुगलों के आधिपत्य और उर्दू के विकास के साथ-साथ हिंदी में अरबी, फारसी इत्यादि विदेशी भाषाओं के शब्द स्थान पाने लगे। कालांतर में एक योजना के अनुरूप भी हिंदी में संस्कृतनिष्ठ शब्दों को इन विदेशी भाषाओं के शब्दों से विस्थापित किया जाने लगा। एक ओर संस्कृत को अत्यंत कठिन और क्लिष्ट बढ़कर लोगों में उसके प्रति भय और द्वेष पैदा किया गया, तो दूसरी ओर हिंदीभाषियों के बीच हिंदी को माँ (जो कि निस्संदेह है भी) और उर्दू को उनकी मौसी बढताकर दुष्प्रचार किया गया ताकि वे निर्विरोध उर्दू के अस्तित्व को स्वीकार कर लें। साथ ही पत्र-पत्रिकाओं तथा शायरियों और गजलों इत्यादि के माध्यम से उर्दू का खूब प्रचार-प्रसार किया गया। संस्कृत और हिंदी के उत्कृष्ट छंदों को बंधन बढताकर छंदमुक्त कविता का प्रचार-प्रसार हुआ, किंतु वहीं शायरी के लिए बहर में ही लिखना आज भी आवश्यक है। ठीक वैसे ही जैसे घूंघट को पिछड़ेपन तथा स्त्री की स्वतंत्केरता -हनन से जोड़ दिया गया और बुर्के को संस्कृति, धर्म और स्त्री की मर्यादा से। 

धीरे-धीरे हिंदी में उर्दू के शब्दों की अधिकता होती गई और इसमें एक बड़ी भूमिका निभाई वामपंथियों और बॉलीवुड के छद्म धर्मनिरपेक्षियों ने। बड़े से बड़ा रचनाकार भी, जो शुद्ध हिंदी में कुछ भी लिखने में समर्थ था, इस चक्रव्यूह में फँसता गया और ख्याति तथा स्वीकार्यता के लोग में उर्दू के प्रयोग की ओर बढ़ता गया। स्थिति ऐसी हो गई कि शुद्ध हिंदी की बात करने वालों को वैसे ही अछूत समझा जाने लगा जैसे हिंदुत्व की बात करने वालों को। 

सोशल मीडिया के आगमन के साथ ही नवोदित रचनाकारों और कवियों को अपने आप को व्यक्त करने के लिए एक ऐसा मंच मिला जहां उन्हें पाठक सहज ही सुलभ थे और किसी मंचीय कवि की चाटुकारिता की आवश्यकता नहीं थी। जो लोग साहित्य के क्षेत्र से नहीं जुड़े थे, किंतु हिंदी और साहित्य में जिनकी रुचि थी, ऐसे अनेकानेक रचनाकारों का प्रादुर्भाव हुआ और उनमें से कई तो इतने उत्कृष्ट हुए कि नामधारी मंचीय रचनाकार भी उनके समक्ष पानी भरते दृष्टिगत होने लगे। धीरे-धीरे हिंदी की शुद्धता पर भी चर्चा प्रारंभ हुई और संस्कृत के पुनरुत्थान के प्रयासों तथा हिंदू पुनर्जागरण के साथ-साथ यह बहस आगे बढ़ती गई। आज सोशल मीडिया पर अनेकानेक ऐसे रचनाकार हैं जिनकी भाषा की शुद्धता और विषय वस्तु के अपनी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ाव को देखकर मन गद्गद् हो जाता है। 

किंतु अभी भी दिल्ली बहुत दूर है और इस दिशा में सफलता हेतु अभी एक लंबी यात्रा तय करनी पड़ेगी। हिंदी के बारे में और हिंदी की शुद्धता के बारे में हमें और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है तथा लोगों को भी इसके प्रति तथा इसके परिणामों के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है। गुलामी की मानसिकता से अपने आप को मुक्त करने के लिए तथा आने वाली पीढ़ियों की सोच को सही दिशा देने के लिए भी यह अत्यंत आवश्यक है। आइए हम सब मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ें और जहाँ तक हो सके हिंदी की शुद्धता को बनाए रखने के लिए अपना योगदान दें।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 8 जनवरी 2025

मनमोहन ने झलक दिखाई

मनमोहन ने झलक दिखाई।
तन-कम्पन मन-नंद न जाई।।

माथे मोर-मुकुट मनभावन,
तन पट-पीत तड़ित सकुचावन,
उर वैजन्ती माल सुहाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।१।।

झर-झर प्रेम नयन-निर्झर से,
भक्तन-जन-मन-मधुवन सरसे,
अधर मधुर मुरली मुसकाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।२।।

अतुलित छवि लखि लज्जित रति-पति,
जन निरखत पावत यदुपति-गति,
पाप-ताप-परिताप नसाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 5 जनवरी 2025

बम्-बम् बोल जगाना है

गोली नहीं चलानी तुमको,
नहीं कृपाण उठाना है।
शून्य, सुषुप्त, अचेतन जन को
बम्-बम् बोल जगाना है।।

कुछ अनभिज्ञ और अवगत कुछ,
कुछ हैं आँखें मूँदे।
कुछ अपनों के ही विरोध में,
निशि-दिन नाचें-कूदें।

सरल नहीं है, पर सम्भव है,
संग सभी को लाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।१।।

कुछ समझेंगे समझाने से,
कुछ भय से जागेंगे।
कुछ निर्बल, सहयोग अपेक्षित,
स्वयं नहीं माँगेंगे।

साम-दान से, दण्ड-भेद से,
अपने साथ मिलाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।२।।

मिल-जुलकर सब संग चलेंगे,
संस्कृति बच जाएगी।
धर्म-ध्वजा चहुँ-दिशि फहरेगी,
सन्तति सुख पाएगी।

"हेयं दुःखम् अनागतम्" का
सबको पाठ पढ़ाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।३।।

**हेयं दुःखमनागतम्।।
(पातंजलि योगसूत्र, साधनपाद, सूत्र १६)

हेयम् - नष्ट करने योग्य 
दु:खम् - दुख
अनागतम् - जो आया न हो, आने वाला हो 

अर्थात् आने वाले दुख नष्ट करने योग्य होते हैं।

- राजेश मिश्र 

गुरुवार, 2 जनवरी 2025

प्रिय! तेरा संदेश मिला है

रीते नैना झर-झर झरते,
झम-झम बरसे सावन।
प्रिय! तेरा संदेश मिला है, 
झूम रहा है तन-मन।।

कितने सावन बीते, सूखे रीते-रीते।
प्रेम-लता को हमने दृग-निर्झर से सींचे।

प्रेम-पुष्प पुनि आज खिला है,
महका है फिर उपवन।
झूम रहा है तन-मन।।१।।

उर ऊसर था मेरा, संग मिला जब तेरा।
उर्वरता भर आयी, आया नया सवेरा।

हरियाली बंजर में छाई,
उदित हुआ मन मधुवन।
झूम रहा है तन-मन।।२।।

विधि को मिलन हमारा, लेकिन रास न आया।
टूटा प्रेम-घरौंदा, हमने साथ बनाया।

चकनाचूर हुए सब सपने,
बिखर गया था जीवन।
झूम रहा है तन-मन।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 24 दिसंबर 2024

छलक रहा तेरा यौवन

दिव्य अनिंद्य अनूप रूप है,
अंग-अंग प्रति उद्दीपन।
मधुशाला के मधु-प्याले सा,
छलक रहा तेरा यौवन।।

दृग-द्वय में मधु मधुर भरा है,
मन मेरा लोलुप भँवरा है।
मदमाती चितवन पर तेरी 
सारा मधुवन तज ठहरा है।

युगल जलज-लोचन को अर्पित,
इस भँवरे का यह जीवन।
छलक रहा तेरा यौवन।।१।।

कृष्ण कुन्तलों से आती है,
चन्द्रवदन-छवि छन-छन कर यों।
श्याम सघन घन-ओट से झाँके
शरत्पूर्णिमा-शुभ-सुधांशु ज्यों।

भींगें सरस सुधा-वर्षा में,
मेरे चकित चकोर-नयन।
छलक रहा तेरा यौवन।।२।।

कमनीया कंचन काया पर,
ज्यों बैठा ऋतुराज सिमटकर।
सद्य-स्फुट कोमल कलिकायें,
आच्छादित तन-तरु पर सुन्दर।

पग-पग झरते सुमन-सुरभि से,
सुरभित हर्षित जड़-चेतन।
छलक रहा तेरा यौवन।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 21 दिसंबर 2024

जब से तुमने दामन छोड़ा

जब से तुमने दामन छोड़ा 
प्रिय! हम हँसना भूल गए।
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।

जिन हाथों को हाथ में लेकर 
घंटों बैठे रहते थे।
मौन मुखर था, बस धड़कन से
बातें करते रहते थे।
उन सुकुमार स्निग्ध हाथों में 
मेहँदी रचना भूल गए। 
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।१।।

जिन नैनों की गहराई में 
पल में डूबे जाते थे।
जल बिन मीन तड़पते थे तुम
जिस दिन देख न पाते थे।
आँसू सारे सूख गए हैं,
नैन छलकना भूल गए।
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।२।।

नख-शिख सजकर, साँझ-सवेरे
तुमसे मिलने आते थे।
मेरे मुखमण्डल पर तेरे
दृग-मधुव्रत मँडराते थे।
जोगन बनकर घूम रहे हैं
सजना-सँवरना भूल गए।
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।३।।

- राजेश मिश्र 

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

वंश-वृक्ष

वंश-वृक्ष तनु-मूल पिता है, माँ शाखा-टहनी-पत्ते।
सुन्दर सस्य*-सुमन बच्चे।।

जड़ अदृश्य आधार वृक्ष का,
भू के अन्दर रहता है।
नित-प्रति नये कष्ट सहकर भी 
उसको थामे रहता है।
तना कठोर खुरदरा दीखे,
अन्दर रस लहराता है।
जड़ें जुटातीं दाना-पानी,
वह ऊपर पहुँचाता है।

पिता कभी करता न प्रदर्शित, कितने भी खाये धक्के।
सुन्दर सस्य-सुमन बच्चे।।१।।

शाखायेॅ-टहनी-पत्ते मिल 
शेष व्यवस्था करते हैं।
जड़ें जुटायें जो धरती से
उसे प्रसंस्कृत करते हैं।
सूरज का प्रकाश ले पत्ते
उससे भोज्य बनाते हैं।
सब अवयव पोषित होते हैं,
और सभी हर्षाते हैं।

माता गृह, गृहिणी, गृहेश्वरी, सोचे सुख-दुख का सबके।
सुन्दर सस्य-सुमन बच्चे।।२।।

स्वस्थ, सुभग, पोषित तरु पर पुनि
कोमल कलियाँ खिलती हैं।
साथ समय के विकसित होतीं,
विकसित होकर फलती हैं।
फल में बीज पनपते-बढ़ते,
बीजों में भवितव्य छुपा।
धर्म और संस्कृति का सारा
तत्त्व और गन्तव्य छुपा।

बच्चों की रखवाली करना, शत्रु मिटाकर या मिट के।
सुन्दर सस्य-सुमन बच्चे।।३।।

सस्य = फल

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

मेरे जीवनसाथी

तुम मनभावन मनमीत मेरे।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

जीवन के पतझड़ की बहार।
निर्झर नयनों का पुलक प्यार।
तेरी साँसों का सुखद स्पर्श,
मलयज शीतल सुरभित बयार।।

मृदु वचन सुभग संगीत तेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

तेरा यौवन, तेरी काया।
काले केशों की घन छाया।
बाहें तेरी ज्यों कमलनाल,
अधरों पर अरुण अरुण छाया।।

हर हाव-भाव में प्रीत तेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

कर झंकृत मन-वल्लकी तार।
धुन छेड़ो जिसमें प्यार-प्यार।
हम डूबें, डूबें, जग डूबे,
हो प्रेम वृष्टि ऐसी अपार।।

कर दो बेसुध हे मीत मेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

जीवनधारा, जीवनसंगिनि।
जीवन नहिं जीवन तेरे बिन।
यूँ ही बरसाती रहना तुम,
यह प्रेम-सुधा मुझ पर निशिदिन।।

हृदयेशा! मन:प्रणीत मेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

वल्लकी = वीणा
मन:प्रणीत = मन को रुचिकर/सुखद

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2024

परिणय-दिवस सिय-राम का

पावन परम, कलि-मल हरन, जग-जननि का, सुखधाम का,
परिणय-दिवस सिय-राम का।।

मन मुदित, पुलकित जानकी,
मूरति हृदय रख राम की।
दुलहन बनी, सज-धज चली ,
होने सदा श्रीराम की।

हरषत चली, सँकुचत चली, करने वरण छविधाम का।।
परिणय-दिवस सिय-राम का।।१।।

शोभा अमित रघुनाथ की,
छवि कोटि हर रतिनाथ की।
मन मुग्ध निरखि विदेह का,
आँखें सजल सिय मातु की।

आनंद-घन, करुणायतन, रघुवर सकल गुण-ग्राम का।
परिणय-दिवस सिय-राम का।।२।।

रिपुदमन, भरत, लखन लला,
श्रुतिकीर्ति, मांडवि, उर्मिला।
चारों युगल लखि क्यों नहीं,
मिथिला विमोहित हो भला।

यह शुभ लगन, मंगलकरन, हो हेतु जग कल्यान का।
परिणय-दिवस सिय-राम का।।३।।

- राजेश मिश्र 

बुधवार, 4 दिसंबर 2024

ओ रे निर्मोही! छोड़ चला किस देश?

ओ रे निर्मोही! छोड़ चला किस देश?

पल भर को भी चित्त न लाया, 
मुझ विरहिनि का क्लेश।
ओ रे निर्मोही!…………।।

कंचन काया धूमिल हो गई 
चिंता रज छाई है।
अंग-अंग प्रिय संग को तरसे, 
तड़पे तरुणाई है।

सूख-सूख तन शूल हो गया, 
रूप-रंग नि:शेष।
ओ रे निर्मोही!…………।।१।।

निशि दिन नैना झरते रहते,
सावन-भादों जैसे।
दुख-नदिया अति बढ़ आई है,
निकलूँ इससे कैसे?

दिवस, मास, संवत्सर बीते,
राह तकूँ अनिमेष।
ओ रे निर्मोही!…………।।२।।

मन मुरझाया, बुद्धि अचेतन,
धड़कन डूबी जाये।
प्राण हठी यह देह न त्यागे,
दुर्दिन दैव दिखाये।

सूरज, शशि, उडुगन से भेजूँ,
नित नूतन संदेश।
ओ रे निर्मोही!…………।।३।।

- राजेश मिश्र 

कपटी बुद्ध हुआ जाता है

अन्तस् आच्छादित घन तम से, बाहर शुद्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।

बोली में सम्मान लिये है,
मुखड़े पर मुस्कान लिये है।
हँस-हँसकर है गले लगाता,
पर कर में किरपान लिये है।

उसके आडम्बर पर देखो, जन-जन लुब्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।१।।

धीरे-धीरे पास पहुँचता
मीठी-मीठी बातें करता।
जब सम्बन्ध सुदृढ़ हो जाता 
अवसर पा पुनि घातें करता।

उसकी काली करतूतों पर, यह मन क्रुद्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।२।।

नये-नये नित स्वाँग रचाता,
भोले-भाले लोग लुभाता।
पापी, पाखण्डी, व्यभिचारी,
स्वप्न-जाल में उन्हें फँसाता।

जिसको उसका सच बतलाओ, वही विरुद्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 1 दिसंबर 2024

मत मार मेरे अल्हड़पन को

मत मार मेरे अल्हड़पन को।

इसमें मेरे प्राण निहित हैं, 
ऊर्जित करते तन-मन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।

मैं अबोध, जग-बोध नहीं है,
पीड़ा है, पर क्रोध नहीं है।
निश्छल, छल मैं समझ न पाऊँ,
अस्वीकृति, प्रतिरोध नहीं है।

निर्झरि निर्मल जल जैसी में,
सिंचित करती जीवन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।१।।

हृदय नवोदित नरम कली है,
सरस, सुगंधित, सद्य खिली है।
मधुर, मदिर, मदमस्त, मनोहर 
भावों की सौरभ मचली है।

दिग्दिगंत में मुक्त विचरती,
भरती, हरती जन-मन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।२।।

सिंदूरी कमनीया काया,
अंग-अंग मधुमास समाया।
खंजन-से मन-रंजन लोचन,
हँसी, कोई वीणा खनकाया।

गजगामिनि, गज निरखि लजाये,
मोहित करती त्रिभुवन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।३।।

- राजेश मिश्र 

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...