मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

तुमको खोकर खो जायेंगे

गीत हमारे उपजे तुमसे तुममें ही लय हो जायेंगे।।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

तुमसे ही प्रातः होती है 
रात तुम्हारे सँग सोती है
रवि-राकेश तुम्हीं से भासित
संध्या भी रक्तिम होती है 

तुमसे ही उगते हैं तारे बिन तुम सब गुम जायेंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।१।।

तुमसे कलियाँ मुसकाती हैं
विकसित होकर इतराती हैं
हँसता है यह मधुमय मधुबन
भृंगावलियाँ भी गाती हैं

सुमन-सुमन सुरभित तुमसे तुम बिन बिन सौरभ हो जाएंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

तुमसे ही पंछी गाते हैं 
पंख तुम्हीं से बल पाते हैं 
और तुम्हारा ही संबल ले
नभ में निर्भय मंडराते हैं

तुमसे ही जगमग जीवन है तुम बिन शव सम हो जायेंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

- राजेश मिश्र

प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।

चिर विरह देकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।

दोष मेरा क्या? भला कुछ तो बताओ,
छोड़कर मुझको अकेले यूँ न जाओ।
स्वप्न जितने संग मिल हमने सजाये
कल्पनाओं के महल जो भी बनाये।

भस्म सब कुछ कर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।१।।

जो नयन निशि-दिन तुम्हारी राह तकते,
भंगिमाओं पर तुम्हारे नत थिरकते।
जगत से निर्लिप्त नित तुमको निहारें,
कामनायें संपदा सुख त्याग सारे।

अश्रु उनमें भर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।

हृदय-मंदिर में सदा तुमको बिठाया,
भोग तन-मन का सदा तुमको लगाया।
किए अर्पित भावना के पुष्प सारे,
नित रहा जीवन समर्पित हित तुम्हारे श।

भूल क्या? तजकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।

- राजेश मिश्र

आखेटक आँखों से कह दो

आखेटक आँखों से कह दो कुछ तो अब आराम करें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।

भृकुटि-कमान काम-सी चंचल
तीक्ष्ण तीर हावों-भावों के।
सन-सन सन-सन चलते रहते 
भर देते अगणित घावों से।

निर्दय व्याध दृगों से कह दो थोड़ा तो विश्राम करें। 
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।१।।

हृष्ट-पुष्ट कंचन काया पर
दृष्टि सहज ही रुक जाती है।
मंद-मंद मनमोहक चालें 
गजगामिनि! मन ललचाती हैं।

आमंत्रक अंगों से कह दो यूँ मत मेरे प्राण हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।२।।

कोमल कलियों-से अधरों पर 
मधुर हँसी जब-जब आती है। 
तन-मन उपवन को शब्दों के 
सौरभ से महका जाती है।

मुस्काते होंठों से कह दो बेसुध कर मत ध्यान हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।३।।

- राजेश मिश्र

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा। 
कामनाओं के प्रलोभन पर अटकता ही रहा।।

दुरदुराकर दूर करता जब कभी आता यहाँ,
स्नेह या फिर विवशता, लेकिन फटकता ही रहा।।

लड़खड़ाया जब कभी, उसको सँभाला हाथ दे 
पर उसी की आँख में हरदम खटकता ही रहा।।

मन दिलासा दे रहा था डर नहीं कोई मगर,
वह अगर कह दे 'नहीं'? यह दिल धड़कता ही रहा।।

विघ्न-बाधाएँ बहुत थीं जिंदगी में हर कदम,
किंतु कब जीवन रुका? पल-पल सरकता ही रहा।।

विरह का शोला उठा तुमसे बिछड़कर के प्रिये!
उम्र तो ढलती गई, पर वह धधकता ही रहा।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ।
शून्य का खोया सितारा हो गया हूंँ।।

मैं सहारा क्या बनूँगा और का?
जब स्वयं ही बेसहारा हो गया हूँ।।

सगर-पुत्रों! कौन तारेगा तुम्हें?
गंग की विपरीत धारा हो गया हूँ।।

नासमझ निज झुंड से कटता गया 
शत्रुओं का सहज चारा हो गया हूँ।।

सूर्य-सा तन तेज सारा ढल गया
शाम का गुमसुम नजारा हो गया हूँ।।

जिंदगी में और पर आश्रित हुआ 
वृद्ध या बालक दुबारा हो गया हूँ।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 दिसंबर 2025

अपरिमित कष्ट होता है

पुराने घाव मत छेड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।
अगर कटु सत्य, मत बोलो, अपरिमित कष्ट होता है।।

छुवा तुमने गुलों को जब हँसे वे खिलमिलाकरके,
न काँटों से प्रिये! लिपटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

नहीं सम्भव, नहीं कह दो, न झूठे स्वप्न दिखलाओ,
न देकर आसरा तोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

भला है तो भला कह दो, बुरा है तो बुरा कह दो,
मगर कुल-जाति मत उघटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

न हो संगी समय फिर भी अकेले बीत जाता हैं,
न अपनाकर कभी छोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

जिन्होंने थाम कर उँगली सिखाया दौड़ना जग में,
न उनसे मुँह कभी मोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

अमन की आशा

भाईचारे के नकाब में 
छलती रही अमन की आशा।
पीठ में खंजर भोक-भोंक कर
चलती रही अमन की आशा।।

गंगा की उज्ज्वल धारा के
श्यामल यमुना से संगम पर
तहजीबों का नाम चलाकर
पलती रही अमन की आशा।।

श्रुति-पुराण को, धर्म-ध्यान को
ऋषि-मुनियों के अगम ज्ञान को
झूठ और पाखंड बताकर
फलती रही अमन की आशा।।

कभी जाति के नाम लड़ाकर 
कभी कहीं आतंक मचाकर
हिंदू-रक्त-तेल पी-पीकर
जलती रही अमन की आशा।।

बहन बेटियों के गौरव को 
धर्म बदलकर छत से, बल से 
सदियों से पैरों के नीचे 
दलती रही अमन की आशा।।

अब भी सोते रह जाओगे 
लुट जाओगे, मिट जाओगे
जाग्रत जन को सदा-सदा से
खलती रही अमन की आशा।।

- राजेश मिश्र

पहला-पहला पत्र तुम्हाराजबसे मैंने पाया है

पहला-पहला पत्र तुम्हारा
जबसे मैंने पाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।

कितना प्यारा पल होगा जब
पत्र तुम्हारा बाँचूँगा।
प्रथम पत्र का अनुपम अनुभव
अंतस् ही में जाँचूँगा।

वक्ष लगाए घूम रहा हूँ
जबसे यह खत आया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।१।।

जो भी काम अधूरा दिखता
तुरत वहाँ लग जाता हूँ
तज आलस्य-प्रमाद, सजग हो
सद्य उसे निपटाता हूँ

नहीं चाहता कोई आए
कहते तुम्हें बुलाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।२।।

विह्वल विह्वल हृदय हमारा 
सँभली सँभली धड़कन है
तपन बढ़ रही, अधर शुष्क हैं
अंग अंग में कंपन है

अनियंत्रित तन, झूम रहा मन
स्वेद माथ पर छाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।३।।

भीड़ चतुर्दिक, अवसर ढूँढूँ
पत्र खोल पढ़ पाऊँ मैं।
तुम अति दूर, बताओ कैसे
हिय का हाल बताऊँ मैं?

जिनका साथ सदा से प्रिय था,
सबसे जी उकताया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।४।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 7 दिसंबर 2025

मैंने तुमको देखा है

दबे पाँव छुप-छुपकर जाते मैंने तुमको देखा है।
खिड़की का परदा सरकाते मैंने तुमको देखा है।।

चाहे जितना भी बोलो तुम मुझसे तुमको प्रेम नहीं,
मेरी चर्चा पर मुसकाते मैंने तुमको देखा है।।

कल तक दाँत-कटी-रोटी का जिससे घन संबंध रहा, 
आज उसी से आँख चुराते मैंने तुमको देखा है।।

छोटी सी इक चूक हुई है, क्यों इतने उद्वेलित हो?
गलती करते और छुपाते मैंने तुमको देखा है।।

अपने बारे में कुछ सुनकर इतना क्षूब्ध न होवो तुम,
निंदा-रस आनंद उठाते मैंने तुमको देखा है।।

बात-बात पर नैतिकता की बात उठाना ठीक नहीं, 
उन गलियों में आते-जाते मैंने तुमको देखा है।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

प्रिय! तुमने अन्याय किया है।

प्रिय! तुमने अन्याय किया है।

वाणी से जो-जो करना था, आँखों से अंजाम दिया है।
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।

भाव हृदय के जब भी शब्दों में ढल आए 
क्रूर मौन से लड़कर बोल नहीं बन पाए 
विवश वाक् की हर पीड़ा को मर्यादा का नाम दिया है। 
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।१।।

अधरो की कलियों ने जब-जब खुलना चाहा
मधुमय हो श्रवणों में जब-जब घुलना चाहा
प्रेम-पयस् पावन-प्रवाह को निर्दयता से थाम लिया है। 
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।२।।

चंचल निर्मल कोमल दृग किसको बतलाएँ
सबके कर्तव्यों का थककर बोझ उठाएँ
तुमने इन नाजुक अंगों को हद से बढ़कर काम दिया है।
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

धर्म-ध्वजा फहराई है

सदियाँ बीतीं, शुभ दिन आया, अवधपुरी हर्षाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर्षित हैं सब देव-देवियाँ
हर्षित हैं धरतीवासी 
मन प्रसन्न आशान्वित नाचें
संभल, मथुरा अरु काशी

शीघ्र हमें भी मुक्ति मिलेगी, आँख सजल हो आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर शरणागत, दुखी-दीन को
हमने हृदय लगाया है 
किंतु कृतघ्नों ने पीछे से 
हम पर छुरा चलाया है 

छद्मयुद्ध में धर्म निभाकर हमने जान गँवाई है। 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

करुणा और प्रेम से हमने 
उनके आँसू पोंछे हैं
प्रत्युत्तर में अश्रु दिया है 
वे घाती हैं, ओछे हैं

कायरता माना सबने जब हमने दया दिखाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

रक्तबीज हैं शेष अभी भी
धर्मयुद्ध नित जारी है
उन्हें समूल नष्ट करने की 
अपनी भी तैयारी है

साँपों और सँपोलों का वध करने की रुत आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर हिंदू अब जाग रहा है 
म्लेच्छ मिलेंगे गारत में 
लहर लहर लहराएगा अब
हर घर भगवा भारत में

खोया यश पाने के क्रम में यह पहली अँगड़ाई है 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 23 नवंबर 2025

रहोगी तुम ही मन में

तुम्हीं थी मन में मेरे, तुम्हीं हो मन में मेरे, 
रहोगी तुम ही मन में,
रहोगी तुम ही मन में।।

मैं कल भी था तेरा ही
मैं अब भी हूँ तेरा ही
यही बस माँगा जग में
रहूँ हरदम तेरा ही

तुम्हीं बहती रहती थी, तुम्हीं बहती रहती हो,
लहू बन मेरे तन में,
लहू बन मेरे तन में।।१।।

तुम्हीं से धड़का यह दिल 
तुम्हीं से धड़क रहा दिल 
रहोगी जब तक दिल में 
तभी तक धड़केगा दिल

तुम्हीं धड़कन थी मेरी, तुम्हीं धड़कन हो मेरी,
रहोगी तुम धड़कन में,
रहोगी तुम धड़कन में।।२।।

नहीं थी तुम जीवन में 
नहीं था कुछ जीवन में 
तुम्हीं सँग सज-धज आईं
बहारें इस जीवन में

तुम्हीं जीवन थी मेरा, तुम्हीं जीवन हो मेरा 
रहोगी तुम जीवन में,
रहोगी तुम जीवन में।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

जागो सनातनियों

उदयाचल से सूरज निकला
घोर अँधेरा भाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।

वर्षों बाद समय बदला है 
तुम उन्नीस से बीस हुए।
रही सैकड़ों साल गुलामी 
तब फिर सत्ताधीश हुए। 

सतत सतर्क रहो तुमसे यह
वचन राष्ट्र अब माँग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।१।।

हाँ वे अब कमजोर हुए हैं
लेकिन हार नहीं मानी है।
चुप हैं, पर मौका मिलते ही
हमला करने की ठानी है।

घाती हैं, वे घात करेंगे
उनका यह अंदाज रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।२।।

काश्मीर में सिद्ध किया फिर
जड़ उन्मादी अंधे हैं वे।
देश-राष्ट्र का अर्थ न कोई
बस इस्लामी बंदे हैं वे।

लाल चौक रिपु रुधिर से धो दो 
जो मस्तक का दाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।३।।

- राजेश मिश्र 

कुटिल भ्रमर तेरी यादें

कुटिल भ्रमर तेरी यादें।।

हृदय-कमल पर मँडराती हैं 
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।

मन मादकता भर जाती हैं 
तन को घायल कर जाती हैं 
हौले-हौले कर घातें।।२।।

अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम 
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 19 नवंबर 2025

सबका साथ नहीं हो सकता

एक पक्ष सिर पर बैठाए, अरु दूजा तलवार चलाए
सबका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।

सदियों का इतिहास देख लो 
दूर देख लो, पास देख लो 
काफिर तो काफिर हैं, उनका
अपनों से नित घात देख लो 

एक पक्ष सँग ईद मनाए, अरु दूजा पत्थर बरसाए
सबका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।१।।

वे धर्मान्ध कुटिल कामी खल
कुत्सित क्रूर भेड़ियों के दल
खाल भेद की ओढ़ घूमते 
मौका मिलते ही करते छल

भाँति-भाँति जेहाद चलाएँ, हर चौराहे पर फट जाएँ
उनका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।२।।

उनके जेहन में किताब है
हूर मिलेंगी, यही ख्वाब है
दुनिया में यदि अमन-चैन है 
फिर इनको अतिशय अज़ाब है

जितनी ऊँची शिक्षा पाते , उतने कट्टर होते जाते 
उनका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।३।।

लय = रंचमात्र, थोड़ा, अल्प।
अज़ाब = तकलीफ, दुख, कष्ट।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 17 नवंबर 2025

कुछ तो आस अभी बाकी है

आशाएँ अब भी जीवित हैं, कुछ तो साँस अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

दूर भले उड़ जाए पंछी
साँझ ढले घर आ जाता है 
राह लक्ष्य की खो जाए पर
घर का रस्ता पा जाता है

उड़ने दो उन्मुक्त गगन में, मन विश्वास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

बाँध सका है जग में कोई 
पानी और जवानी को कब?
हृदय उमड़ते भावों से नित
निकली नई कहानी को कब?

तन-मन तृप्त हुए कब किसके? शाश्वत प्यास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

ऐसे क्यों निस्तेज पड़े हो 
मरघट के मुर्दों जैसे तुम?
जब तक तन में प्राण शेष हैं 
हार भला सकते कैसे तुम?

उठो और निज स्वाँग रचाओ, जीवन-रास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

- राजेश मिश्

शनिवार, 15 नवंबर 2025

ख्वाहिशों का हर घरौंदा बारिशों में बह गया

मैं सदा से बेसुरा था, बेसुरा ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।

सुर नहीं थे, लय नहीं थी, ताल का साया नहीं 
गीत सारे घुट मरे, भय में रहा, गाया नहीं 
मुझे कोई क्यों सुनेगा? सोचता ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।१।।

जब जहाँ जिसने पुकारा, साथ पाया है मुझे 
हर कदम बाँटी हँसी, सबने रुलाया है मुझे
मान दे भी हो तिरस्कृत, चुप रहा, सब सह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।२।।

च्युत हुआ कर्तव्य से, कोई कभी अवसर न था 
हर चुनौती से लड़ा, भागा नहीं, कायर न था 
तप्त रवि का दर्प तोड़ा, जुगनुओं से दह गया। 
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।३।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

वसुधैव कुटुंबकम

बात-बात पर रटते रहते 
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

शत्रु चतुर्दिक घात लगाए 
हम आंखें मूंदें बैठे ।
घुन बनकर खोखला कर रहे
सदियों से घर में पैठे।
कायरता का बना आवरण 
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

संस्कृति-संस्कृत से पराङ्मुख
अति दयनीय दशा में है।
डगमग डग मग चला जा रहा
धुत निरपेक्ष नशा में है।
शास्त्र न माने, किंतु उचारे
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

पूरी पृथ्वी ही कुटुंब है
पग-पग पर उपदेश करे।
निज कुटुंब में अपनों से ही
नित-प्रति लेकिन द्वेष करे।
भाई दुश्मन, दुश्मन भाई
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

यूँ अकारण कुछ न था

रुदित उनका दूर जाना, यूँ अकारण कुछ न था।
और मेरा लौट आना, यूँ अकारण कुछ न था।

द्रोहियों की भीड़ से जब फौज पर पत्थर चले,
भीड़ पर गोली चलाना, यूँ अकारण कुछ न था।

हर खुशी हर पल निछावर बाल-बच्चों पर किया,
मातु-पितु का रूठ जाना, यूँ अकारण कुछ न था।

खेत में दिन-रात खटकर जिंदगी जिनकी कटी,
गाँव उनका छोड़ जाना, यूँ अकारण कुछ न था।

वही आँगन, चार भाई जन्मकर पल-बढ़ गए,
भीत उस आँगन उठाना, यूँ अकारण कुछ न था।

आज यदि घर से निकल हिंदू सड़क पर आ गए,
धैर्य उनका टूट जाना, यूँ अकारण कुछ न था।

जो कभी आँखें मिलाकर बात भी करता न था,
आज उसका घर बुलाना, यूँ अकारण कुछ न था।

जन्मदात्री से अधिक वात्सल्य जिसका राम पर,
ठान हठ वन को पठाना, यूँ अकारण कुछ न था।

जन्म भर जो धर्म को बस गालियाँ देता रहा,
मंदिरों में सिर नवाना, यूँ अकारण कुछ न था।

- राजेश मिश्र 

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

अनकही ही रह गईं

मौन कितनी ही वफाएँ अनकही ही रह गईं।
फलित होकर भी दुआएँ अनकही ही रह गईं।

तूलिका अरु कैनवस मेरे लिए हासिल न था,
अतः मेरी कल्पनाएँ अनकही ही रह गईं।

कहूँ तुमसे मैं कभी साहस जुटा पाया नहीं,
मनस् पलती कामनाएँ अनकही ही रह गईं। 

हम सुरा में, सुंदरी में रम गए कुछ इस तरह,
साधकों की साधनाएँ अनकही ही रह गईं। 

तर्क का, कुविचार का व्यभिचार अद्भुत देखकर,
स्वस्थ उनकी धारणाएँ अनकही ही रह गईं। 

आज जन-दरबार का फिर था हमें न्यौता मिला,
पर हमारी समस्याएँ अनकही ही रह गईं। 

सहिष्णुता व अहिंसा के व्यूह में हम यूँ फँसे,
कुछ हमारी आस्थाएँ अनकही ही रह गईं।

भूख से संघर्ष करते रह गए हम उम्र भर,
हृदय की मृदु भावनाएँ अनकही ही रह गईं। 

जब कभी लिखने चले यादों में ऐसे खो गए, 
तुम्हारी कमसिन अदाएँ अनकही ही रह गईं।

सोचते थे तुम कहीं रुसवा न हो जाओ प्रिये,
जिंदगी की कुछ कथाएँ अनकही ही रह गईं।

- राजेश मिश्र

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...