अरे मवाली, माँ को गाली! माँ का क्यों अपमान करे?
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।
भटक रहा था फल लेकर जब अपने कुत्सित कर्मों का,
मिले आसरा, भोग सके फल, पहले के अपकर्मों का।
आगत पीड़ा से परिचित थी, फिर भी कुक्षि प्रदान किया,
मृत्यु-तुल्य दारुण-दुख सहकर तुझको जीवन दान दिया।
उस माता की योनि पावनी पापी! तू बदनाम करे।
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।१।।
माँ तेरी हो, माँ मेरी हो, माँ इसकी या उसकी हो।
माँ तो माँ है, वही रहेगी, फिर चाहे माँ जिसकी हो।
माँ को गाली, भले और की, गाली सारी माँओं को,
तेरी माँ भी तड़पी होगी पा तुझसे इन घावों को।
प्रसव-वेदना से भी बढ़कर माँ को कष्ट प्रदान करे।
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।२।।
यह जीवन तो व्यर्थ हो गया, आगे और गँवायेगा।
कुत्ते, कीट-पतंगों से भी अधम योनि में जायेगा।
जनम-जनम तक भटकेगा तू कीड़ा बनकर नाली में।
भोगेगा तू नरक अनगिनत माँ को दी एक गाली से।
ऐसी कोई शक्ति न जग में जो तेरा कल्याण करे।
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।३।।
- राजेश मिश्र