मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

संघर्ष हमारा जारी है

पुरखों के त्याग परिश्रम से उत्कर्ष हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।

सदियों से सतत चला आया 
संघर्ष सदा संस्कृतियों का,
कुछ का अस्तित्व अभी बाकी, 
कुछ पुंज शेष स्मृतियों का।
हाँ, शेष वही बस बच पायीं
जिनको निज पर विश्वास रहा,
दुनिया में वही फलीं-फूलीं
जिनको सत्ता का साथ रहा।

हम श्रेष्ठ रहे, हम श्रेष्ठ रहें, अनुतर्ष हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।१।।

चाहे जिस कारण से जग में
जब-जब सत्ता संघर्ष हुआ, 
इक संस्कृति नवजीवन पायी,
इक संस्कृति का अपकर्ष हुआ।
युग-युग से यह चलता आया,
युग-युग तक चलता जाएगा,
जो सतत सतर्क सबल होगा,
केवल वह ही बच पायेगा।

हमने हर युग बलिदान दिया, उत्सर्ग हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।२।।

कुछ संस्कृतियाँ अनुदार अधम
असहिष्णु और अति हिंस्र रहीं,
कुछ अति उदार अरु अति सहिष्णु,
कुछ संस्कृतियाँ सम्मिश्र रहीं।
जो अति उदार अरु अति सहिष्णु 
वे आगे चल इतिहास बनीं,
अनुदार हिंस्र संस्कृतियों का 
अति सरल सहज सब ग्रास बनीं।

हम सह-अस्तित्व समर्थक नित दृढ़ मर्ष हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।३।।

हम रहे उदार सहिष्णु सदा,
हम सबको लेकर साथ चले।
इस सदय सनातन संस्कृति की 
छाया में कितने पौध पले।
हमने निज शोणित से सींचा
शरणागत सब संस्कृतियों को 
नित पाला-पोसा, प्रेम दिया,
बिसरा उनकी अपकृतियों को।

उन्मुख उस पथ पर हैं अब भी, आदर्श हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।४।।

भारत जब तक परतंत्र रहा
हम क्षरणोन्मुख निरुपाय रहे,
नित प्रति जूझे अस्तित्व हेतु
दिन-दिन अनगिन अन्याय सहे।
पुनि संरक्षक सत्ता पाकर
कुछ वर्षों से फल-फूल रहे,
हो अब प्रयास पर्यंत-प्रलय
सत्ता अपने अनुकूल रहे।

संकल्प सभी का हो सबसे अवमर्श हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।५।।

अनुतर्ष  = कामना, इच्छा 
मर्ष = सहनशीलता, धैर्य 
अपकृति = आघात, दूसरा, उत्पीड़न, कुकर्म 
क्षरणोन्मुख = क्षरण + उन्मुख
अवमर्श = सम्पर्क 

- राजेश मिश्र

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता।
चतुर्दिक प्रेम का सूखा कहीं सोता नहीं मिलता। 
जहाँ जाते जगत में तुम हँसी बस ढूँढते रहते,
इसी कारण कभी कोई कहीं रोता नहीं मिलता।।

धधकती भू, तड़पते जन, सिसकते फेफड़े निशिदिन,
हवा का शुद्ध शहरों में, कहीं झोंका नहीं मिलता।

जहाँ लहलह लहरती थी फसल मौसम कोई भी हो,
पड़े परती उन्हें कोई कहीं बोता नहीं मिलता।

सुनी थी श्रवण की गाथा सदा हमने लड़कपन में, 
दुखद अब वृद्ध कोई भी कहीं ढोता नहीं मिलता।

लुटेरे-चोर-हत्यारे सदा थे किंतु अब कोई 
लहू के दाग छुप-छुपकर कहीं धोता नहीं मिलता।

प्रिये! जब तुम मिला करती मगन मन नाच उठता था,
वही मन किंतु अब विह्वल कहीं होता नहीं मिलता।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

वीर बाल दिवस

भारत सतत समृद्ध समर्पित राष्ट्रभक्त दीवानों से।
सत्य सनातन सदा सुरक्षित वीरों के बलिदानों से।।
इस्लामी आँधी के आगे झुके नहीं वे तने रहे।
नमन है गुरु, गुरु-पुत्रों को जो धर्म-धुरंधर बने रहे।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

कौन पाया पार तेरा

शून्य-सा विस्तृत सरस संसार तेरा।
इस जगत में कौन पाया पार तेरा?।

कर्म तू करता नहीं, सब बोलते हैं, 
किंतु क्षण-क्षण चल रहा व्यापार तेरा।।

है नहीं आकार कोई, कौन कहता,
रूप कण-कण में सदा साकार तेरा।।

सत्त्व-रज-तम से परे नहिं राग तुझमें,
पर बरसता है सभी पर प्यार तेरा।।

तू अक्रिय है, मान लेते हैं कि सच है 
क्या घटित, जिस पर नहीं अधिकार तेरा?।

है अजन्मा, जन्म तुझसे ही सभी का,
जीव-जड़ से प्रेम ही सत्कार तेरा।।

अहम् मेरा जब कभी चोटिल हुआ,
स्नेह जैसे बढ़़ गया हर बार तेरा।।

चित्त व्याकुल, करूँ साक्षात्कार कैसे?
स्मरण हो हिय में सतत दातार तेरा।।

लोग विह्वल, शुभ चतुर्दिक हो रहा है,
अवध में जबसे सजा दरबार तेरा।।

- राजेश मिश्र 

सनातन

ऋषियों-मुनियों-कवियों ने नित सदियों से गाथा गाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?। 

ईश्वर-श्रीमुख-निस्सृत निर्मल
यह प्राणि-धर्म अति पावन है।
जड़-चेतन मंगलकारक है,
सुखकर, सब दुःख नसावन है।
श्रुति-पथ समदर्शी समग्राही,
शाश्वत संसृति सरसावन है।
सद्धर्म अनादि आदि अद्भुत
अति मनमोहक मनभावन है।

जो भी इसके शरणागत है, उसने जीवन-निधि पाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।१।।

इसमें जड़ता का नाम नहीं,
यह चेतन है, नित नूतन है। 
दृढ़ आत्मनियंत्रण, आत्मशुद्धि,
इसमें निज का प्रतिचिंतन है।
सब धर्मों-पंथों का जन्मद,
यह कालातीत चिरंतन है।
इसकी सब शाखायें-टहनी,
यह परम पुनीत पुरातन है।

हिमगिरि अभेद्य, यह अमित सिंधु, इसमें अथाह गहराई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।२।।

ईश्वर प्रदत्त उपहार अतुल,
यह प्राणिमात्र परिपोषक है।
पुरुषार्थ-चतुष्टय पथदर्शक,
जग सकल काम परितोषक है।
निज जन-जीवन नित हितकारक,
भव दारुण दुख अवशोषक है।
इस वैभवशाली संस्कृति का
परिचायक है, उद्घोषक है। 

ईश्वर दुर्लभ प्रत्यक्ष भले, यह ईश्वर की परछाईं है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?।३।।

श्रुति रुचिर ऋचाओं का गायन
देवों को मोहित करता है।
दैवी अनुकंपा से सिंचित
जग-जीवन सदा सँवरता है।
यह ज्ञान, कर्म अरु भक्ति सरस
जस विविध मार्ग बतलाता है।
ये दीर्घ-सूक्ष्म, मृदु-कठिन-सरल,
जन निज-निज रुचि अपनाता है।

दर्शन पुराण स्मृति गीता ने, पग-पग पर राह दिखाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?।४।।

इस सुंदर सघन गहन वन को
दुष्टों ने नित रौंदा-काटा।
कुछ आए, लूटे, चले गए,
कुछ ने शरणागत हो छाँटा।
सामर्थ्य कहाँ किसमें इतनी 
इसका अस्तित्व मिटा पाए?
जिसका कोई प्रारंभ नहीं,
फिर अंत भला कैसे आए?

अपनों ने औरों से बढ़कर, आभ्यंतर क्षति पहुँचाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।५।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

कुंडी फिर भी खटकाऊँगा

तुम चाहे मुझको दुत्कारो, मैं द्वार तुम्हारे आऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।

यह स्वाभिमान की बात नहीं, 
अस्तित्व हमारा संकट में।
सारी दुनिया से शेष हुए,
सिमटे हैं केवल भारत में।
कुछ स्वार्थ-पूर्ति में लिप्त रहे
निज नेताओं ने पाप किया।
यह देश बँटा पर म्लेच्छों सँग
रहने का चिर अभिशाप दिया।

तुम जितना इसे नकारोगे, मैं बार-बार दोहराऊंगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।१।।

हम सदियों तक परतंत्र रहे,
अति अत्याचार हुए हम पर।
शासक अब्राहम के वंशज,
लूटे काटे हमको जमकर। 
इक छोड़ गया, पर तोड़ गया,
इक हिस्सा ले भी जमा रहा।
जो आस्तीन में पल-पल कर
नित दंत विषैले धँसा रहा।

तुम स्वीकारो मत स्वीकारो, मैं अरि को अरि बतलाऊँगा। 
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।२।।

सन सैंतालिस पश्चात पाक
में कितने हिंदू शेष अभी?
शलवार पहन ली, जीवित हैं,
जो लड़े, रहे वे खेत सभी।
इकहत्तर में जिनकी खातिर
यह बांग्लादेश बनाया था। 
उन सबने कब, किस मौके पर
भारत का साथ निभाया था?

तुम झूठे सपने देखोगे, मैं विकट सत्य दिखलाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।३।।

भारत में जो भी रहे शेष
वे चिंगारी से आग बने।
इन अठहत्तर वर्षों में भी 
अपने कितने घर-बार जले?
जैसे बांग्लादेशी हिंदू
जल रहा आजकल सड़कों पर। 
चेतो, वरना दिन दूर नहीं
तुम भी तड़पोगे जल-जलकर।

तुम जब तक नहीं समझ जाओ, मैं लगातार समझाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।४।।

पुरखों ने निज बलिदान दिया
हमको यह हिंदुस्थान दिया।
उनके कारण हम शेष अभी
क्या तुमने यह संज्ञान लिया?
यदि यह टुकड़ा भी गँवा दोगे,
अपनी संतति को क्या दोगे?
बच्चे किस कोने जाएंगे?
वंशज समाप्त हो जाएंगे।

तुम गीत पुराने भूलोगे, मैं नया गीत रच लाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।५।।

- राजेश मिश्र

मन मगन मनमीत मुझको मिल गए

व्योम-प्रांगण में सितारे खिल गए।
मन मगन मनमीत मुझको मिल गए।।

प्यार से देखा, मिले कुछ इस तरह,
अधर पर मुसकान दे, ले दिल गए।।

व्यर्थ की बकवाद तो करता रहा,
पर समय पर होंठ उसके सिल गए।।

मेहनताना तय प्रदर्शन पर हुआ,
सब निकम्मे काम पर फिर पिल गए।।

योग्यता पर जाति यूँ हावी हुई,
देश तज परदेश सब काबिल गए।।

दूसरों का दर्द ही ढोता रहा,
क्या पता कब पाँव मेरे छिल गए।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

तुमको खोकर खो जायेंगे

गीत हमारे उपजे तुमसे तुममें ही लय हो जायेंगे।।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

तुमसे ही प्रातः होती है 
रात तुम्हारे सँग सोती है
रवि-राकेश तुम्हीं से भासित
संध्या भी रक्तिम होती है 

तुमसे ही उगते हैं तारे बिन तुम सब गुम जायेंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।१।।

तुमसे कलियाँ मुसकाती हैं
विकसित होकर इतराती हैं
हँसता है यह मधुमय मधुबन
भृंगावलियाँ भी गाती हैं

सुमन-सुमन सुरभित तुमसे तुम बिन बिन सौरभ हो जाएंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

तुमसे ही पंछी गाते हैं 
पंख तुम्हीं से बल पाते हैं 
और तुम्हारा ही संबल ले
नभ में निर्भय मंडराते हैं

तुमसे ही जगमग जीवन है तुम बिन शव सम हो जायेंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

- राजेश मिश्र

प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।

चिर विरह देकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।

दोष मेरा क्या? भला कुछ तो बताओ,
छोड़कर मुझको अकेले यूँ न जाओ।
स्वप्न जितने संग मिल हमने सजाये
कल्पनाओं के महल जो भी बनाये।

भस्म सब कुछ कर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।१।।

जो नयन निशि-दिन तुम्हारी राह तकते,
भंगिमाओं पर तुम्हारे नत थिरकते।
जगत से निर्लिप्त नित तुमको निहारें,
कामनायें संपदा सुख त्याग सारे।

अश्रु उनमें भर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।

हृदय-मंदिर में सदा तुमको बिठाया,
भोग तन-मन का सदा तुमको लगाया।
किए अर्पित भावना के पुष्प सारे,
नित रहा जीवन समर्पित हित तुम्हारे श।

भूल क्या? तजकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।

- राजेश मिश्र

आखेटक आँखों से कह दो

आखेटक आँखों से कह दो कुछ तो अब आराम करें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।

भृकुटि-कमान काम-सी चंचल
तीक्ष्ण तीर हावों-भावों के।
सन-सन सन-सन चलते रहते 
भर देते अगणित घावों से।

निर्दय व्याध दृगों से कह दो थोड़ा तो विश्राम करें। 
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।१।।

हृष्ट-पुष्ट कंचन काया पर
दृष्टि सहज ही रुक जाती है।
मंद-मंद मनमोहक चालें 
गजगामिनि! मन ललचाती हैं।

आमंत्रक अंगों से कह दो यूँ मत मेरे प्राण हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।२।।

कोमल कलियों-से अधरों पर 
मधुर हँसी जब-जब आती है। 
तन-मन उपवन को शब्दों के 
सौरभ से महका जाती है।

मुस्काते होंठों से कह दो बेसुध कर मत ध्यान हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।३।।

- राजेश मिश्र

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा। 
कामनाओं के प्रलोभन पर अटकता ही रहा।।

दुरदुराकर दूर करता जब कभी आता यहाँ,
स्नेह या फिर विवशता, लेकिन फटकता ही रहा।।

लड़खड़ाया जब कभी, उसको सँभाला हाथ दे 
पर उसी की आँख में हरदम खटकता ही रहा।।

मन दिलासा दे रहा था डर नहीं कोई मगर,
वह अगर कह दे 'नहीं'? यह दिल धड़कता ही रहा।।

विघ्न-बाधाएँ बहुत थीं जिंदगी में हर कदम,
किंतु कब जीवन रुका? पल-पल सरकता ही रहा।।

विरह का शोला उठा तुमसे बिछड़कर के प्रिये!
उम्र तो ढलती गई, पर वह धधकता ही रहा।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ।
शून्य का खोया सितारा हो गया हूंँ।।

मैं सहारा क्या बनूँगा और का?
जब स्वयं ही बेसहारा हो गया हूँ।।

सगर-पुत्रों! कौन तारेगा तुम्हें?
गंग की विपरीत धारा हो गया हूँ।।

नासमझ निज झुंड से कटता गया 
शत्रुओं का सहज चारा हो गया हूँ।।

सूर्य-सा तन तेज सारा ढल गया
शाम का गुमसुम नजारा हो गया हूँ।।

जिंदगी में और पर आश्रित हुआ 
वृद्ध या बालक दुबारा हो गया हूँ।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 दिसंबर 2025

अपरिमित कष्ट होता है

पुराने घाव मत छेड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।
अगर कटु सत्य, मत बोलो, अपरिमित कष्ट होता है।।

छुवा तुमने गुलों को जब हँसे वे खिलमिलाकरके,
न काँटों से प्रिये! लिपटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

नहीं सम्भव, नहीं कह दो, न झूठे स्वप्न दिखलाओ,
न देकर आसरा तोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

भला है तो भला कह दो, बुरा है तो बुरा कह दो,
मगर कुल-जाति मत उघटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

न हो संगी समय फिर भी अकेले बीत जाता हैं,
न अपनाकर कभी छोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

जिन्होंने थाम कर उँगली सिखाया दौड़ना जग में,
न उनसे मुँह कभी मोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

अमन की आशा

भाईचारे के नकाब में 
छलती रही अमन की आशा।
पीठ में खंजर भोक-भोंक कर
चलती रही अमन की आशा।।

गंगा की उज्ज्वल धारा के
श्यामल यमुना से संगम पर
तहजीबों का नाम चलाकर
पलती रही अमन की आशा।।

श्रुति-पुराण को, धर्म-ध्यान को
ऋषि-मुनियों के अगम ज्ञान को
झूठ और पाखंड बताकर
फलती रही अमन की आशा।।

कभी जाति के नाम लड़ाकर 
कभी कहीं आतंक मचाकर
हिंदू-रक्त-तेल पी-पीकर
जलती रही अमन की आशा।।

बहन बेटियों के गौरव को 
धर्म बदलकर छत से, बल से 
सदियों से पैरों के नीचे 
दलती रही अमन की आशा।।

अब भी सोते रह जाओगे 
लुट जाओगे, मिट जाओगे
जाग्रत जन को सदा-सदा से
खलती रही अमन की आशा।।

- राजेश मिश्र

पहला-पहला पत्र तुम्हाराजबसे मैंने पाया है

पहला-पहला पत्र तुम्हारा
जबसे मैंने पाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।

कितना प्यारा पल होगा जब
पत्र तुम्हारा बाँचूँगा।
प्रथम पत्र का अनुपम अनुभव
अंतस् ही में जाँचूँगा।

वक्ष लगाए घूम रहा हूँ
जबसे यह खत आया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।१।।

जो भी काम अधूरा दिखता
तुरत वहाँ लग जाता हूँ
तज आलस्य-प्रमाद, सजग हो
सद्य उसे निपटाता हूँ

नहीं चाहता कोई आए
कहते तुम्हें बुलाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।२।।

विह्वल विह्वल हृदय हमारा 
सँभली सँभली धड़कन है
तपन बढ़ रही, अधर शुष्क हैं
अंग अंग में कंपन है

अनियंत्रित तन, झूम रहा मन
स्वेद माथ पर छाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।३।।

भीड़ चतुर्दिक, अवसर ढूँढूँ
पत्र खोल पढ़ पाऊँ मैं।
तुम अति दूर, बताओ कैसे
हिय का हाल बताऊँ मैं?

जिनका साथ सदा से प्रिय था,
सबसे जी उकताया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।४।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 7 दिसंबर 2025

मैंने तुमको देखा है

दबे पाँव छुप-छुपकर जाते मैंने तुमको देखा है।
खिड़की का परदा सरकाते मैंने तुमको देखा है।।

चाहे जितना भी बोलो तुम मुझसे तुमको प्रेम नहीं,
मेरी चर्चा पर मुसकाते मैंने तुमको देखा है।।

कल तक दाँत-कटी-रोटी का जिससे घन संबंध रहा, 
आज उसी से आँख चुराते मैंने तुमको देखा है।।

छोटी सी इक चूक हुई है, क्यों इतने उद्वेलित हो?
गलती करते और छुपाते मैंने तुमको देखा है।।

अपने बारे में कुछ सुनकर इतना क्षूब्ध न होवो तुम,
निंदा-रस आनंद उठाते मैंने तुमको देखा है।।

बात-बात पर नैतिकता की बात उठाना ठीक नहीं, 
उन गलियों में आते-जाते मैंने तुमको देखा है।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

प्रिय! तुमने अन्याय किया है।

प्रिय! तुमने अन्याय किया है।

वाणी से जो-जो करना था, आँखों से अंजाम दिया है।
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।

भाव हृदय के जब भी शब्दों में ढल आए 
क्रूर मौन से लड़कर बोल नहीं बन पाए 
विवश वाक् की हर पीड़ा को मर्यादा का नाम दिया है। 
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।१।।

अधरो की कलियों ने जब-जब खुलना चाहा
मधुमय हो श्रवणों में जब-जब घुलना चाहा
प्रेम-पयस् पावन-प्रवाह को निर्दयता से थाम लिया है। 
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।२।।

चंचल निर्मल कोमल दृग किसको बतलाएँ
सबके कर्तव्यों का थककर बोझ उठाएँ
तुमने इन नाजुक अंगों को हद से बढ़कर काम दिया है।
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

धर्म-ध्वजा फहराई है

सदियाँ बीतीं, शुभ दिन आया, अवधपुरी हर्षाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर्षित हैं सब देव-देवियाँ
हर्षित हैं धरतीवासी 
मन प्रसन्न आशान्वित नाचें
संभल, मथुरा अरु काशी

शीघ्र हमें भी मुक्ति मिलेगी, आँख सजल हो आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर शरणागत, दुखी-दीन को
हमने हृदय लगाया है 
किंतु कृतघ्नों ने पीछे से 
हम पर छुरा चलाया है 

छद्मयुद्ध में धर्म निभाकर हमने जान गँवाई है। 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

करुणा और प्रेम से हमने 
उनके आँसू पोंछे हैं
प्रत्युत्तर में अश्रु दिया है 
वे घाती हैं, ओछे हैं

कायरता माना सबने जब हमने दया दिखाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

रक्तबीज हैं शेष अभी भी
धर्मयुद्ध नित जारी है
उन्हें समूल नष्ट करने की 
अपनी भी तैयारी है

साँपों और सँपोलों का वध करने की रुत आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर हिंदू अब जाग रहा है 
म्लेच्छ मिलेंगे गारत में 
लहर लहर लहराएगा अब
हर घर भगवा भारत में

खोया यश पाने के क्रम में यह पहली अँगड़ाई है 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 23 नवंबर 2025

रहोगी तुम ही मन में

तुम्हीं थी मन में मेरे, तुम्हीं हो मन में मेरे, 
रहोगी तुम ही मन में,
रहोगी तुम ही मन में।।

मैं कल भी था तेरा ही
मैं अब भी हूँ तेरा ही
यही बस माँगा जग में
रहूँ हरदम तेरा ही

तुम्हीं बहती रहती थी, तुम्हीं बहती रहती हो,
लहू बन मेरे तन में,
लहू बन मेरे तन में।।१।।

तुम्हीं से धड़का यह दिल 
तुम्हीं से धड़क रहा दिल 
रहोगी जब तक दिल में 
तभी तक धड़केगा दिल

तुम्हीं धड़कन थी मेरी, तुम्हीं धड़कन हो मेरी,
रहोगी तुम धड़कन में,
रहोगी तुम धड़कन में।।२।।

नहीं थी तुम जीवन में 
नहीं था कुछ जीवन में 
तुम्हीं सँग सज-धज आईं
बहारें इस जीवन में

तुम्हीं जीवन थी मेरा, तुम्हीं जीवन हो मेरा 
रहोगी तुम जीवन में,
रहोगी तुम जीवन में।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

जागो सनातनियों

उदयाचल से सूरज निकला
घोर अँधेरा भाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।

वर्षों बाद समय बदला है 
तुम उन्नीस से बीस हुए।
रही सैकड़ों साल गुलामी 
तब फिर सत्ताधीश हुए। 

सतत सतर्क रहो तुमसे यह
वचन राष्ट्र अब माँग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।१।।

हाँ वे अब कमजोर हुए हैं
लेकिन हार नहीं मानी है।
चुप हैं, पर मौका मिलते ही
हमला करने की ठानी है।

घाती हैं, वे घात करेंगे
उनका यह अंदाज रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।२।।

काश्मीर में सिद्ध किया फिर
जड़ उन्मादी अंधे हैं वे।
देश-राष्ट्र का अर्थ न कोई
बस इस्लामी बंदे हैं वे।

लाल चौक रिपु रुधिर से धो दो 
जो मस्तक का दाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।३।।

- राजेश मिश्र 

कुटिल भ्रमर तेरी यादें

कुटिल भ्रमर तेरी यादें।।

हृदय-कमल पर मँडराती हैं 
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।

मन मादकता भर जाती हैं 
तन को घायल कर जाती हैं 
हौले-हौले कर घातें।।२।।

अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम 
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 19 नवंबर 2025

सबका साथ नहीं हो सकता

एक पक्ष सिर पर बैठाए, अरु दूजा तलवार चलाए
सबका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।

सदियों का इतिहास देख लो 
दूर देख लो, पास देख लो 
काफिर तो काफिर हैं, उनका
अपनों से नित घात देख लो 

एक पक्ष सँग ईद मनाए, अरु दूजा पत्थर बरसाए
सबका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।१।।

वे धर्मान्ध कुटिल कामी खल
कुत्सित क्रूर भेड़ियों के दल
खाल भेद की ओढ़ घूमते 
मौका मिलते ही करते छल

भाँति-भाँति जेहाद चलाएँ, हर चौराहे पर फट जाएँ
उनका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।२।।

उनके जेहन में किताब है
हूर मिलेंगी, यही ख्वाब है
दुनिया में यदि अमन-चैन है 
फिर इनको अतिशय अज़ाब है

जितनी ऊँची शिक्षा पाते , उतने कट्टर होते जाते 
उनका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।३।।

लय = रंचमात्र, थोड़ा, अल्प।
अज़ाब = तकलीफ, दुख, कष्ट।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 17 नवंबर 2025

कुछ तो आस अभी बाकी है

आशाएँ अब भी जीवित हैं, कुछ तो साँस अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

दूर भले उड़ जाए पंछी
साँझ ढले घर आ जाता है 
राह लक्ष्य की खो जाए पर
घर का रस्ता पा जाता है

उड़ने दो उन्मुक्त गगन में, मन विश्वास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

बाँध सका है जग में कोई 
पानी और जवानी को कब?
हृदय उमड़ते भावों से नित
निकली नई कहानी को कब?

तन-मन तृप्त हुए कब किसके? शाश्वत प्यास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

ऐसे क्यों निस्तेज पड़े हो 
मरघट के मुर्दों जैसे तुम?
जब तक तन में प्राण शेष हैं 
हार भला सकते कैसे तुम?

उठो और निज स्वाँग रचाओ, जीवन-रास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

- राजेश मिश्

शनिवार, 15 नवंबर 2025

ख्वाहिशों का हर घरौंदा बारिशों में बह गया

मैं सदा से बेसुरा था, बेसुरा ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।

सुर नहीं थे, लय नहीं थी, ताल का साया नहीं 
गीत सारे घुट मरे, भय में रहा, गाया नहीं 
मुझे कोई क्यों सुनेगा? सोचता ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।१।।

जब जहाँ जिसने पुकारा, साथ पाया है मुझे 
हर कदम बाँटी हँसी, सबने रुलाया है मुझे
मान दे भी हो तिरस्कृत, चुप रहा, सब सह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।२।।

च्युत हुआ कर्तव्य से, कोई कभी अवसर न था 
हर चुनौती से लड़ा, भागा नहीं, कायर न था 
तप्त रवि का दर्प तोड़ा, जुगनुओं से दह गया। 
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।३।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

वसुधैव कुटुंबकम

बात-बात पर रटते रहते 
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

शत्रु चतुर्दिक घात लगाए 
हम आंखें मूंदें बैठे ।
घुन बनकर खोखला कर रहे
सदियों से घर में पैठे।
कायरता का बना आवरण 
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

संस्कृति-संस्कृत से पराङ्मुख
अति दयनीय दशा में है।
डगमग डग मग चला जा रहा
धुत निरपेक्ष नशा में है।
शास्त्र न माने, किंतु उचारे
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

पूरी पृथ्वी ही कुटुंब है
पग-पग पर उपदेश करे।
निज कुटुंब में अपनों से ही
नित-प्रति लेकिन द्वेष करे।
भाई दुश्मन, दुश्मन भाई
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

यूँ अकारण कुछ न था

रुदित उनका दूर जाना, यूँ अकारण कुछ न था।
और मेरा लौट आना, यूँ अकारण कुछ न था।

द्रोहियों की भीड़ से जब फौज पर पत्थर चले,
भीड़ पर गोली चलाना, यूँ अकारण कुछ न था।

हर खुशी हर पल निछावर बाल-बच्चों पर किया,
मातु-पितु का रूठ जाना, यूँ अकारण कुछ न था।

खेत में दिन-रात खटकर जिंदगी जिनकी कटी,
गाँव उनका छोड़ जाना, यूँ अकारण कुछ न था।

वही आँगन, चार भाई जन्मकर पल-बढ़ गए,
भीत उस आँगन उठाना, यूँ अकारण कुछ न था।

आज यदि घर से निकल हिंदू सड़क पर आ गए,
धैर्य उनका टूट जाना, यूँ अकारण कुछ न था।

जो कभी आँखें मिलाकर बात भी करता न था,
आज उसका घर बुलाना, यूँ अकारण कुछ न था।

जन्मदात्री से अधिक वात्सल्य जिसका राम पर,
ठान हठ वन को पठाना, यूँ अकारण कुछ न था।

जन्म भर जो धर्म को बस गालियाँ देता रहा,
मंदिरों में सिर नवाना, यूँ अकारण कुछ न था।

- राजेश मिश्र 

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

अनकही ही रह गईं

मौन कितनी ही वफाएँ अनकही ही रह गईं।
फलित होकर भी दुआएँ अनकही ही रह गईं।

तूलिका अरु कैनवस मेरे लिए हासिल न था,
अतः मेरी कल्पनाएँ अनकही ही रह गईं।

कहूँ तुमसे मैं कभी साहस जुटा पाया नहीं,
मनस् पलती कामनाएँ अनकही ही रह गईं। 

हम सुरा में, सुंदरी में रम गए कुछ इस तरह,
साधकों की साधनाएँ अनकही ही रह गईं। 

तर्क का, कुविचार का व्यभिचार अद्भुत देखकर,
स्वस्थ उनकी धारणाएँ अनकही ही रह गईं। 

आज जन-दरबार का फिर था हमें न्यौता मिला,
पर हमारी समस्याएँ अनकही ही रह गईं। 

सहिष्णुता व अहिंसा के व्यूह में हम यूँ फँसे,
कुछ हमारी आस्थाएँ अनकही ही रह गईं।

भूख से संघर्ष करते रह गए हम उम्र भर,
हृदय की मृदु भावनाएँ अनकही ही रह गईं। 

जब कभी लिखने चले यादों में ऐसे खो गए, 
तुम्हारी कमसिन अदाएँ अनकही ही रह गईं।

सोचते थे तुम कहीं रुसवा न हो जाओ प्रिये,
जिंदगी की कुछ कथाएँ अनकही ही रह गईं।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 15 सितंबर 2025

इसी देह में रहती तुम भी

देखो, बस मुझको मत देखो, 
खुद को भी देखो मुझमें ही। 
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।

तुमसे पहले एकाकी था 
सब सूना-सूना लगता था।
भरी सभा हो, भरा मंच हो
पर ऊना-ऊना लगता था।

एकाकीपन गया तुम्हीं से 
तुमसे पूरा खालीपन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।१।।

सुंदर सुष्ठु सुडौल देह यह 
सप्त-धातु से परिपूरित थी।
हृष्ट-पुष्ट तन दृष्टि सभी की 
अंदर क्या है, कब परिचित थी? 

तुमको पा चंचल मन नाचे
मधुर-मधुर गाए धड़कन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।२।।

ये तन केवल साधन ही थे 
आज मिले, कल फिर बिछड़ेंगे।
जनम-जनम का साथ हमारा
कोई तन ले आन मिलेंगे।

भाव हमारे यही रहेंगे
और यही होंगे चेतन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।३।।

ऊना = अपूर्ण, अधूरा।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 सितंबर 2025

एक 'कबी'जी की व्यथा

आज सुबह जैसे ही फेसबुक खोला, एक महिला का मित्रता अनुरोध दिखा। प्रोफाइल लॉक थी, फोटो थोड़ा छोटा था और आँखें कुछ कमजोर होने के कारण चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। फिर भी इतना अंदाज तो लग ही गया कि कोई उम्रदराज महिला हैं, न कि शिकारी फेसबुक बाला। अतः मित्रता अनुरोध स्वीकार कर लिया। 

फोटो को बड़ा करके देखा तो उजड़े बालों वाली, लटके गालों वाली, शुष्क-वक्षा, लंबोदरी देवीजी कुछ जानी-पहचानी सी लगीं। बहुत देर तक सोचता रहा, परन्तु याद नहीं आया कि कहाँ देखा है। अतः दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गया। किंतु देवीजी ने पीछा नहीं छोड़ा। उनका चेहरा रह-रहकर विचारों के द्वार पर थपकी देता रहा और मुझसे पूछता रहा—"पहचान कौन?"

छुट्टी का दिन था, अतः थोड़ी देर बाद फिर मोबाइल लेकर बैठ गया। फोटो को एक बार फिर बड़ा करके देखा और अचानक एक घटना मस्तिष्क में कौंध गई।

कल की ही बात थी। एक मित्र के यहाँ जुटान थी। एक 'कबी' जी भी आए थे। भाई लोग जुटे थे तो पकौड़ी-चाय के साथ हँसी-ठिठोली भी हो रही थी और ठहाके भी गूँज रहे थे। लेकिन 'कबी' जी अनमने-से, दु:ख की चादर ओढ़े, एक कोने में अछूत से बैठे थे, जैसे कोरोना के संभावित मरीज हों। पकौड़ी और चाय को भी उन्होंने मना कर दिया था। उनकी यह दशा मुझे खटकने लगी। जब रहा नहीं गया तो मैं उनका स्वास्थ्य परीक्षण करने उनके पास पहुँच गया। 

मैंने पूछा—"कैसे हैं भाई साहब? मुँह कुछ उतरा-उतरा दिख रहा है। स्वास्थ्य तो ठीक है न?"

उन्होंने कहा—"अरे! नहीं, स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है।"

मैं: "घर पर कोई समस्या है क्या? भाभी-बच्चे सब लोग ठीक-ठाक हैं न?"

'कबी' जी: "हाँ-हाँ, सब लोग ठीक-ठाक हैं। कोई समस्या नहीं है।"

मैं: "तो फिर आप इतना लम्बा सा मुँह लटकाए क्यों बैठे हैं?"

'कबी' जी ने‌ वहाँ बैठे समाज की तरफ दृष्टि डालते हुए कहा—"छोड़िए जाने दीजिए, यहाँ इस विषय पर बात करना ठीक नहीं होगा।"

उनके मंतव्य को समझते हुए मैंने कहा—"चिंता मत कीजिए। हमारी बातचीत की ओर किसी का ध्यान नहीं है। बताइए क्या बात है?"

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद 'कबी' जी ने कहा—"अरे यार! क्या बताएँ। आजकल पोस्ट पर लाइक-कमेंट आना बहुत कम हो गए हैं। कितना भी अच्छा लिखो, दोहरे अंकों तक भी नहीं पहुँचते हैं।"

बात तो सही थी। उनकी पीड़ा का कुछ-कुछ अनुभव तो मुझे हुआ, लेकिन मैं उसे पूरी तरह नहीं समझ सकता था क्योंकि मेरे लाइक-कमेंट दोहरे अंकों में पहुँचते हैं। मेरे प्रिय चिरंजीवी अनुज राकेश मिश्र 'सरयूपारीण' तो तिहरे अंको का आनंद ले रहे हैं। फिर भी उनके दर्द को साझा करते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई और कहा—

"कृपा कहीं अटकी हुई है। कुछ दिन का अवकाश ले लीजिए, चिंतन-मनन कीजिए और नए कलेवर में नया विषय लेकर आइए। खोया यश अवश्य प्राप्त होगा।"

मेरा सुझाव उन्हें रास नहीं आया। 'वृद्धिरेचि' की भाँति उनकी अधीरता बढ़ गई और बोले—"अवकाश ले लूँ? आप जानते हैं न कि एक बार पोस्ट करना बंद कर दिया तो जो भी रहे-सहे प्रशंसक हैं, वे भी नहीं बचेंगे। अच्छा मजाक कर लेते हैं आप।"

मैंने कहा—"तो फिर अलग-अलग ग्रुप में पोस्ट कीजिए। हो सकता है कुछ प्रशंसक बढ़ जाएँ।"

वह बोले—"वह भी करके देख लिया, कोई लाभ नहीं।"

मैंने कहा—"जो आपके पुराने प्रशंसक रहे हैं, उनको टैग करके देखिए।"

उन्होंने कहा—"कोशिश की थी। कुछ दिन तक तो सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी। फिर उन्होंने उपेक्षा करना प्रारंभ कर दिया।"

मैंने कहा—"वैसे आपकी मित्रता सूची 5000 की ऊपरी सीमा तक पहुँच गई है। क्यों न उन लोगों को अपने मित्रता सूची से हटा दीजिए जो प्रतिक्रिया नहीं देते हैं, और नए लोगों को आने दीजिए। इससे संभवत: कुछ लाभ हो।"

उन्होंने कहा—"वह भी करके देख लिया। कुछ नहीं हुआ।"

जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ती जा रही थी, वह और भी अधीर होते जा रहे थे। धैर्य तो मेरा भी टूटने लगा था। अतः थोड़ा सा तंज कसते हुए मैंने कहा—"फिर तो मुझे इस जीवन में कोई उपाय नहीं सूझ रहा। अब प्रभु से प्रार्थना करिए कि अगले जन्म में आपको महिला बनाएँ, क्योंकि वे यदि अपना फोटो डालकर केवल इतना भी लिख देती हैं कि "कैसी लग रही हूँ", तो भी चार अंको का लाइक-कमेंट एंजॉय करती हैं।" और कहने के बाद थोड़ा सा मुस्कुरा दिया।

वह कुछ देर मेरी ओर टकटकी लगाए देखते रहे, फिर बिना कुछ कहे झटके से उठे और चल दिए। मित्रों में से कुछ मुझसे अप्रसन्न हो गए, तो कुछ ने सांत्वना देते हुए कहा—"कोई बात नहीं भाई! सब ठीक हो जाएगा।" शाम को मैं भारी मन से घर वापस आया और मन-ही-मन उनसे कई बार क्षमा भी माँगी‌।

लेकिन मुझे क्या पता था कि उनका पुनर्जन्म इतनी जल्दी हो जाएगा, और वह भी उसी शरीर और उसी प्रौढ़वस्था के साथ। 24 घंटे के भीतर हुए उनके इस पुनर्जन्म से मैं हत्प्रभ था और अब भी हूँ।

- राजेश मिश्र

हिंदी हिंदू-सी उदार है

हिंदी हिंदू-सी उदार है।

सरल सुलभ सबकी शिकार है।


हर आगंतुक को अपनाया,

पर देखो दुश्मन हजार हैं।


कभी कहीं घुसपैठ से पीड़ित,

राजनीति की कहीं मार है।


कन्वर्जन के कुटने करते,

शब्दों पर प्रतिदिन प्रहार हैं।


सब सहकर भी हँसती रहती,

सहनशक्ति इसकी अपार है।


स्वतंत्रता की सेनानी यह,

इसके तेवर धारदार हैं।


जिसने पहला शब्द सिखाया,

मस्तक नत यह बार-बार है।


संस्कृत के नातिन की नातिन,

चंदन भारत के लिलार है।


- राजेश मिश्र

शनिवार, 13 सितंबर 2025

चले जाना

चन्द दिन और रुक जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

तुम्हें देखा नहीं अब तक
तुम्हें जाना नहीं अब तक
जरा मैं देख लूँ तुमको
जरा मैं जान लूँ तुमको

निकट कुछ और आ जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

नयन थे राह पर अटके
श्रवण चौकस, कहीं खटके
कोकिला कूक उठती थी
हृदय में हूक उठती थी

हृदय मेरे उतर जाओ, चले जाना। 
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

जले दिन-रात बरसों से
मिले हो बाद बरसों के
अगर तुम आज जाओगे
कहो, कब लौट आओगे

वजह जीने की दे जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

अभी कहानी बाकी है

दृग में पानी बाकी है।
अभी कहानी बाकी है।

साँस शिशिर की टूट रही,
कोंपल आनी बाकी है।

हार अभी से मत मानो,
अभी जवानी बाकी है।

निर्णय अभी अधर में है,
खींचातानी बाकी है।

जीते नहीं अभी भी तुम,
इक्का-रानी बाकी है।

बहुतेरी बातें बदलीं,
पर मनमानी बाकी है।

रिश्ता अपना जीवित है,
अभी रवानी बाकी है।

अब भी वह रहती मुझमें,
याद सुहानी बाकी है।

जिससे उस पर दिल आया
वह नादानी बाकी है।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 10 सितंबर 2025

ललकार

वे जो घात लगाये बैठे
सतत लार टपकाये बैठे 
श्रीलंकाई, बांग्लादेशी
नेपाली घटनाओं जैसी 
घटना कोई भारत में हो 
देश हमारा गारत में हो
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।१।।

हाँ कुछ सदियों पराधीन थे
बँटे हुए थे, दीन-हीन थे
लेकिन वह पल बदल गया है
भारतवासी सँभल गया है
अब कोई आक्रांता आये
इस धरती पर आँख उठाये
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।२।।

अरब फारसी यूनानी हो
हूण मुगल या क्रिस्तानी हो 
डीप स्टेट, दलाल हों उसके
बार-मेड या लाल हों उसके
अरि पूरब पश्चिम उत्तर में
आस्तीन के साँप जो घर में
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।३।।

श्रेष्ठ हमारे महाबली थे
लेकिन दुश्मन क्रूर छली थे
ये शरणागत के रक्षक थे
वे अपनों के ही भक्षक थे
मानवता को नृशंसता से 
जिनने कुचला बर्बरता से
भ्रम उनका हम दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।४।।

भारत जिनको खटक रहा है
गले सनातन अटक रहा है 
या तो अपनी सोच बदल लें
अब भभूत माथे पर मल लें
छोड़ें टोपी, क्रॉस उतारें
केसरिया बाना तन धारें
या भ्रम उनका दूर करेंगे
दर्प स्वप्न सब चूर करेंगे।।५।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

जागो सनातनियों

उदयाचल से सूरज निकला
घोर अँधेरा भाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।

वर्षों बाद समय बदला है 
तुम उन्नीस से बीस हुए।
रही सैकड़ों साल गुलामी 
तब फिर सत्ताधीश हुए। 

सतत सतर्क रहो तुमसे यह
वचन राष्ट्र अब माँग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।१।।

हाँ वे अब कमजोर हुए हैं
लेकिन हार नहीं मानी है।
चुप हैं, पर मौका मिलते ही
हमला करने की ठानी है।

घाती हैं, वे घात करेंगे
उनका यह अंदाज रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।२।।

काश्मीर में सिद्ध किया फिर
जड़ उन्मादी अंधे हैं वे।
देश-राष्ट्र का अर्थ न कोई
बस इस्लामी बंदे हैं वे।

लाल चौक रिपु रुधिर से धो दो 
जो मस्तक का दाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।३।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 8 सितंबर 2025

मोहन! मुरली मधुर बजाना

मोहन! मुरली मधुर बजाना।

मन प्यासा है, अभिलाषा है,
मीठी तान सुनाना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

जिस मुरली-धुन राधा रीझी
गोपिन सुध-बुध खोईं।
धेनु स्रवैं पय बिनु बछड़ा के 
तान सुनाओ सोई।

श्रवण हमारे, विकल मुरारे!
इनका क्लेश नसाना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

नष्ट अधर्म हुआ जिस धुन से
धर्म-ध्वजा फहराई।
भरी सभा में कौतुक करके 
अनुजा-लाज बचाई।

हे अविनाशी! पाप-विनाशी 
छेड़ो वही तराना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

जिस धुन उपजी पावन गीता
अर्जुन मोह मिटाया।
पढ़त-सुनत जन-मन दुखभंजक
मुक्ति-मार्ग बतलाया।

हे यदुनंदन! असुरनिकंदन!
नेह-मेह बरसाना।
मोहन! मुरली मधुर बजाना।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 7 सितंबर 2025

तुम मेरी पहली प्रीत बने

जग की सारी खुशियाँ पा ली
तुम जो मेरे मीत बने।
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।

प्रथम मिलन पर आंखें अपनी 
ज्यों ही दो से घार हुईं।
मन-वीणा के तारों में मृदु 
मद्धिम सी झनकार हुई।।
स्वर, लय, ताल उठे हो चेतन 
और नए संगीत बने।
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।१।।

धीरे-धीरे मौन नैन का 
मुखरित वाणी तक आया।
मधुर-मधुर शब्दों में ढलकर
कानों से जा टकराया।
छंदों की गोदी जा बैठा
अरु जीवन के गीत बने।
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।२।।

पाना और गँवाना, जग में
यही सदा व्यापार रहा।
सुखद मिलन, दुखप्रद बिछुड़न ही
प्रेम-नदी आधार रहा।
हो संयोग-वियोग सभी में
त्याग प्रेम की रीत बने। 
मानो, मत मानो पर तुम ही 
मेरी पहली प्रीत बने।।३।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 6 सितंबर 2025

न जाने क्यों

न जाने क्यों!
देखकर तुमको पिघलता है मेरा मन,
ज्यों हिमालय पिघलता हो,
छू सुनहरी रश्मियों को।।

भाव-जल पूरित तुम्हारे युगल-लोचन,
लजा देते हैं अपरिमित उदन्वत् को।
जलधि जल खारा, दृगों के भाव मधु सम,
सिक्त करते, तृप्त करते, तप्त हृत को।

न जाने क्यों!
देखकर तुमको उमगता है मेरा मन,
तृषित सागर उमगता ज्यों 
अंक भरकर निर्झरी को।।

सघन घन जैसे तुम्हारे कृष्ण कुन्तल,
खेलते हैं चन्द्रमुख से नत निरंतर।
तन अलौकिक सत्त्वगुण की मूर्ति कोई
आ गई हो उतरकर देवी धरा पर। 

न जाने क्यों!
देखकर तुमको विनत होता मेरा मन,
पृथुल पुष्कर विनत हो ज्यों 
चूमकर विश्वम्भरा को।।

उदन्वत् = समुद्र 
पृथुल = विशाल 
पुष्कर = आकाश
विश्वम्भरा = पृथ्वी

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

गुरु-वंदना

गुरु वह दीपक जो जलकर भी 
देता है उजियारा।
सद्गुरु-कृपा काट देती है 
जड़ भव-बंधन सारा।।

उदित जहाँ से बहती झर-झर
सतत ज्ञान की धारा।
तरणी बनकर भवसागर से 
जिसने पर उतारा।।

संस्कार की गंगा-यमुना 
जिससे नित बहती है।
जिसकी छाया में मानवता 
नित पलती रहती है।।
 
जिसका सुमिरन, जिसका चिंतन 
कठिन क्लेश है हरता।
उन गुरु-चरणों में नत तन-मन
जीवन जहाँ सँवरता।

- राजेश मिश्र

रविवार, 24 अगस्त 2025

देश में ही हम विदेशी हो गए हैं

वे घृणा के बीज ऐसे बो गए हैं,
देश में ही हम विदेशी हो गए हैं।

मनुज हो या श्वान या पशु और कोई,
आप घर बेघर स्वदेशी हो गए हैं।

मान लो! सम्भव नहीं उनको जगाना,
जागते हैं, और मुँह ढँक सो गए हैं।

सेज कुक्कुर, सड़क पर माता-पिता हैं,
पतित होकर आज क्या हम हो गए हैं।

मरे कोई, जिए कोई, फर्क क्या है,
आँख के आँसू कहीं पर खो गए हैं।

अज्ञ हैं घर में हमारे कौन, कैसा
दूसरों में व्यस्त इतने हो गए हैं।

रो रहे होंगे कहीं पर बैठकर वे,
धर्म पर, इस राष्ट्र पर मिट जो गए हैं।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो

आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।

हाँ, सुनाओ गीत कोई
प्रेम हो, अनुराग भी हो।
हो सरस सङ्गीत सज्जित
ताल स्वर लय राग भी हो।

मनस् मीठे भाव भर दे, प्रीति का पैगाम दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।१।।

या सुनाओ परम पावन 
कथा दमयंती की नल की।
अमित साहस शौर्य निष्ठा
त्याग तप धीरज अचल की।

आत्मगौरव आत्मचिन्तन ज्ञान दे सम्मान दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।२।।

या सुनाओ तान मीठी
कृष्ण की प्रिय बाँसुरी की।
राधिका के समर्पण की 
गोपिका मन माधुरी की।

तृषित तन-मन तृप्त कर दे, भक्ति का वरदान दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।१।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 20 अगस्त 2025

अश्रु

हर दशा में साथ रहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।
मौन रह हर बात कहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।।

चिर प्रतीक्षित कामना जब
पूर्ण हो जाती कभी 
हर्ष का संदेश लेकर 
ढुलक पड़ते हैं तभी 
टीस को ले साथ बहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(१)

प्रिय हमें बिछड़ा हुआ जब 
कोई सहसा आ मिले
भावना उर की उफनती
साथ अपने ले चलें
मगन मन का हाल कहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(२)

दाहता दुख जब अपरिमित 
हो व्यथा सहना कठिन
घुट रहे हों हम अकेले
तड़पते हों रात-दिन
दग्ध दिल का दाह सहते 
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(३)

- राजेश मिश्र

मुक्तक

(१)
मेरे भावों की समिधा पर,
तुम चाहे जितना जल डालो।
उसे हविस् कर, राष्ट्र-यज्ञ में,
मैं आहुति देता जाऊँगा।।

हविस् = घृत

(२)

पता है तुमने देखा दरवाजे से जाते मुझको,
हिला था खिड़की का परदा तुम्हारे ओट लेने पर।

(३)

कविगण दया करिए।
कुछ तो नया करिए।।

निशि-दिन इश्क के चर्चे,
और कुछ बयाँ करिए।।

(४)

उसे अति अभिमान था अपने होने का,
वह नहीं है, फिर भी दुनिया चल रही है।

(५)

मेरे पथ पर बीज बोये तुमने कीकर समझकर,
पर मैंने पाया पारिजात के पौथे खिले हुए।

कीकर = बबूल

(६)

ऐसा उलझा हूँ तेरे मधुर मन्दहास के इन्द्रजाल में,
छटपटा रहा हूँ निकलने को, किन्तु गाँठ नहीं मिलती।

७)

लीन थे हम अपनी साधना में,
जगत के प्रपंच से मुँह मोड़कर।
री मेनके! क्यों आई पल भर को
फिर चली गई तड़पता छोड़कर

८)

सुर्ख़ लबों पर तेरे मेरा नाम क्या आया,
हंगामा बरप रहा है महफ़िल में मुसलसल।।

(९)

देखो, बस मुझको मत देखो, 
खुद को भी देखो मुझमें ही। 
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।

(10)

वर्षों बाद छँटे थे बादल चाँद नजर आया था।
अमृतपान कर शुष्क हृदय यह अतिशय हर्षाया था।
किंतु क्षणिक था वह उजियारा घने घनों में खोया,
मैं हतभाग्य, भाग्य में मैंने अँधियारा पाया था।।

(11)

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

क्यों आती सपनों में मेरे?

जब दिल मेरा तोड़ दिया है

मुझे तड़पता छोड़ दिया है 

शपथ-वचन तुम सभी भुलाकर 

चली गई जब मुझे रुलाकर

क्यों आती सपनों में मेरे?


पल भर को भी सोचा होता 

मन को अपने टोका होता 

पग जब उठे दूर जाने को 

कोई और अंक पाने को 

ठिठकी होती, सँभली होती

दुनिया अपनी बदली होती 

पर तुमने तो दृष्टि घुमा ली 

तब, जब मुझसे आँख चुरा ली 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(१)


मैं तो मगन-मगन रहता था 

ताप-शीत हँस-हंँस सहता था 

तुमसे ही सारी दुनिया थी 

तुम मेरी प्यारी दुनिया थी 

भोर तुम्हारी उठती पलकें

हंसीं शाम थीं झुकती पलकें

रात रँगीली, दिवस निराला 

तुमने तहस-नहस कर डाला 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(२)


चलो मान लें अगर विवश थी

स्ववश नहीं थी, तुम परवश थी

एक नजर तो डाली होती

पलकें जरा उठा ली होती

हाँ, वाणी चुप रह सकती थी

आँखें तो सब कह सकती थीं 

लेकिन मुझसे नजर बचाकर

चली गई मुख अगर फिराकर 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(३)


- राजेश मिश्र

शनिवार, 16 अगस्त 2025

लम्पट भँवरा

माली! तेरे सुघड़ बाग में

नवयौवनयुत हरित लता पर

जबसे प्यारी कली खिली है 

लम्पट मधुकर दृष्टि गड़ाए

उसको प्रतिदिन निरख रहा है

मन में अपने मचल रहा है

जिस दिन भी यह फूल बनेगी

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


कली, छली का भाव न जाने

वह अबोध, पशु क्या पहचाने 

उसको सब सच्चे लगते हैं 

अच्छी है, अच्छे लगते हैं 

कोई नहीं पराया उसको

अपना लेती मिलती जिसको

सोच रहा वह कुटिल मधुप पर 

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


गुनगुन गुनगुन गुनगुन करता

बगिया में निशि-वासर फिरता

लता-लता, हर विटप निहारे 

भँवरा भटके मारे-मारे 

कहाँ, कौन, कब कली खिल रही

किस ममता के अङ्क पल रही 

पता लगाता, मन मुसुकाता

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


चञ्चरीक जब तान सुनाए 

भोले माली! तू हरषाए

नहीं जानता, वह लम्पट है

उसकी मीठी तान कपट है

बगिया की गलियों में घूमे

चूसे कुसुम, कली को चूमे 

कली-कली को चूम बोलता 

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

तेरी लीला वह ही जाने, तू जतलाए जिसको

जन्म लिया है कोख से किसकी, 
मिले बधाई किसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…

कौन जानता कारागृह में 
क्या लीला दिखलाई।
हर्षित हैं वसुदेव-देवकी 
झूमे जसुदा माई।
बाबा नंद मगन-मन नाचें 
सुध-बुध किसकी किसको
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(1)

गगनगिरा सुन कैद में डाला 
बहन प्राण से प्यारी।
बालक मारे, नहीं विचारे 
खल पापी कुविचारी।
कंस अभागा कभी न जागा 
मारा चाहे किसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(2)

घर-घर मंगलगान बज रहा 
मुदित नगर नर-नारी।
बाल-वृद्ध वय भूल कूदते 
चहुँदिसि उत्सव भारी।
हे जगवंदन! दारुण बन्धन 
भव का, काटो इसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(3)

- राजेश मिश्र

स्वतंत्रता दिवस

वीरों ने निज रक्तधार से 

धरती को नहलाया।

सात समुन्दर पार पहुँचकर 

ऊधम खूब मचाया।।

खोकर पुत्र-कन्त माँ-बहनों 

ने आँसू  न बहाया‌।

छाती ताने खड़ा तिरंगा 

तब जाकर लहराया।।


- राजेश मिश्र 

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस

"विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" पर व्यथित हृदय की अभिव्यक्ति…

आओ, फिर से याद करें हम 
भरकर आँख में पानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।

पुश्तों से जाने-पहचाने
गाँव, गली, चौबारे।
चूल्हा, चाकी, चौकी, चौखट 
घर, बगिया ये सारे।
इक रेखा से हुए पराये
किसकी कारस्तानी?
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।१।।

धन-दौलत, पुरखों की थाती
लूट लिए आराती।
बेटे कटे, बेटियाँ लुट गईं
फटती है सुन छाती।
लाशों को भर-भर ट्रेनों में
भेजी गई निशानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।२।।

बचते, छुपते, गिरते-पड़ते
जीवन ले जो आए।
अपनापन ले, आस लगाए
आकर हुए पराए।
रोटी, कपड़ा, घर न दे सके 
दुश्चरित्र, अभिमानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।३।।

- राजेश मिश्र

चित्तभूमियाँ

क्षिप्तं, मूढं, विक्षिप्तमेकाग्रं, निरुद्धमिति चित्तभूमय:।


क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निररुद्ध -  चित्त की ये पाँच भूमियाँ होती हैं।


सारी सृष्टि सत्त्व, राजस् और तमस् - इन तीन गुणों का ही परिणाम है। एक धर्म, आकार अथवा रूप को छोड़कर दूसरे धर्म, आकार अथवा रूप के धारण करने को परिणाम कहते हैं। चित्त इन गुणों का सर्वप्रथम सत्त्वप्रधान परिणाम है। इसीलिए इसको चित्तसत्त्व भी कहते हैं। 


यह सारा स्थूल जगत जिसमें हमारा व्यवहार चल रहा है, रज तथा तमप्रधान गुणो का परिणाम है। इसके बाह्य तथा अभ्यंतर संसर्ग से जो चित्तसत्त्व में क्षण-क्षण गुणों का परिणाम हो रहा है, उसकी चित्तवृत्ति कहते हैं। 


चित्तसत्त्व ज्ञान स्वभाव वाला है। जब उसमें रजोगुण और तमोगुण का मेल होता है तब ऐश्वर्य, विषय प्रिय होते हैं। जब यह तमोगुण से युक्त होता है, तब अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य को प्राप्त होता है। यही चित्त जब तमोगुण के नष्ट होने पर रजोगुण के अंश से युक्त होता है, तब धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्या को प्राप्त होता है। घोड़े की साम्यता ही चित्त की भूमियों या अवस्थाओं का आधार है।


१. क्षिप्त

इसमें रजोगुण की प्रधानता होती है। तम और सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह राग-द्वेषादि के कारण होती है। इस अवस्था में धर्म-अधर्म, राग-विराग, ज्ञान-अज्ञान, ऐश्वर्य तथा अनैश्वर्य में प्रवृत्ति होती है। जब तमोगुण सत्त्वगुण को दबा लेता है तब अधर्म अज्ञानादि और जब सत्त्व तम को दबा लेता है, तब धर्म, ज्ञानादि में प्रवृत्ति होती है। साधारण सांसारिक मनुष्य इसी अवस्था में रहते हैं।


२. मूढ

इस अवस्था में तम प्रधान होता है। रज तथा सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह काम, क्रोध, लोभ और मोह के कारण होती है। चित्र की ऐसी अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति अज्ञान, अधर्म, राग और अनैश्वर्य में होती है। यह अवस्था नीच मनुष्यों की है।


३. विक्षिप्त 

इस अवस्था में सत्त्वगुण प्रधान रहता है तथा रज और तम दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह निष्काम कर्म करने तथा राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ और मोह के छोड़ने से उत्पन्न होती है। इस अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में होती है। किंतु रजोगुण बीच-बीच में विक्षेप उत्पन्न करता रहता है। यह अवस्था ऊँचे मनुष्यों तथा जिज्ञासुओं की है।


४. एकाग्र 

चित्त में एक ही विषय में सदृश वृत्तियों का प्रवाह निरंतर बने रहने को एकाग्रता कहते हैं। यह चित्त की स्वाभाविक अवस्था है। इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण पूरी तरह से दबे हुए रहते हैं। इसे सम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसकी अंतिम स्थिति विवेकख्याति है।


५. निरुद्ध

विवेकख्याति द्वारा जब चित्र और पुरुष के भेद का साक्षात्कार हो जाता है, तब उस विवेकख्याति से भी वैराग्य हो जाता है। यह पर वैराग्य है। इससे उस अंतिम वृत्ति का भी निरोध हो जाता है, केवल पर वैराग्य के संस्कार मंत्र शेष होते हैं। सर्व वृत्तियों के निरोध की इस अंतिम निरुद्धाभावस्था को असम्प्रज्ञात या निर्बीज समाधि भी कहते हैं।


**वह सर्वोच्च, निर्मल ज्ञान जिससे चित्त और पुरुष के भेद का पता चलता है, विवेकख्याति कहलाता है।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!

वचन पावन मत भुलाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!

बस तुम्हारे सँग रहूँगी,
तपन-शीतलता सहूँगी।
सुख सभी तुमको समर्पित,
दुख तुम्हारा बाँट लूँगी।।

विकल तन-मन तरस खाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(१)

भूख को व्रत जान लूँगी,
तरु तले घर मान लूँगी।
कामनाएँ त्याग सारी
इक तुम्हारा नाम लूँगी।।

साथ ले लो, मान जाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(२)

ये महल के भोग सारे,
वसन-भूषन बिन तुम्हारे।
दाहते तन, ले चलो बस
वपुस् वल्कल वस्त्र धारे।।

विरह-दुख में मत जलाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(३)

- राजेश मिश्र

योग करें, नीरोग रहें

शरीर और मन का अन्योन्याश्रित संबंध है। सभी शारीरिक क्रियाओं और कार्यों का मन पर तथा मानसिक संकल्प-विकल्प व भावनाओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता ही है। उसमें मन का शरीर के ऊपर अधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य अपनी मनमानी और आचार-विचार के कारण पग-पग पर समस्याओं को आमंत्रित करता रहता है और दुःखी होता है। मन पर नियंत्रण उसे इन दुःखों से बचा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने विविध योग-प्रक्रियाओं की रचना की, जिन्हें अपनाकर शरीर और मन में संतुलन स्थापित किया जा सकता है और मन को नियंत्रित किया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान भी व्यक्तित्व विकास में मन की भूमिका को पूरी तरह स्वीकार करता है। 

अतः योग करें, नीरोग रहें।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

पातंजल योगसूत्र

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि।।

भोजराज जी द्वारा महर्षि पतंजलि की यह स्तुति योगाभ्यासियों में अत्यंत प्रचलित है।  योग, व्याकरण और आयुर्वेद के क्षेत्रों में उनकी देन अभूतपूर्व है और मानवजन की आने वाली पीढ़ियों को प्रलयान्त तक लाभान्वित करती रहेगी। चूंकि मैं भी कुछ अंशों तक योग से जुड़ा हुआ हूं, अतः यथासंभव और यथाशक्ति किंचित अध्ययन होता रहता है। इसी क्रम में थोड़ा-बहुत अध्ययन 'पातंजल योगसूत्र' का भी हुआ है।

भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा में योग का विशेष स्थान है। इससे संबंधित अनेकानेक ग्रन्थों में 'पातंजल योगसूत्र' का स्थान सर्वोपरि है जो कि योग का सर्वाधिक प्रामाणिक और व्यवस्थित ग्रंथ है। चार पादों (अध्यायों) के केवल 195 सूत्रों में सारा जीवन-दर्शन समेट दिया है जिस पर कई भाष्य और टीकाएं लिखी गईं, लिखी जा रही हैं और लिखी जाएंगी। चाहे जितनी बार गोते लगाइए, इसकी गहराई का पार पाना आसान नहीं है। लेकिन यह सुनिश्चित है कि जितना डूबते जाएंगे, उतना ही आनंद के रस में सराबोर होते जाएंगे और फिर मन यही चाहेगा कि बस यहीं पड़े रहें। प्रत्येक पाद के नाम और सूत्रों की संख्या इस प्रकार है -

१. समाधिपाद - 51 सूत्र 
२. साधनपाद - 55 सूत्र 
३. विभूतिपाद - 55 सूत्र 
४. कैवल्यपाद - 34 सूत्र

प्रथम पाद में योग के स्वरूप समाधि, द्वितीय पाद में उसका साधन, तृतीय पाद में उससे होने वाली सिद्धियों तथा चतुर्थ पाद में कैवल्य का वर्णन किया है।

क्योंकि इस समय संस्कृत-सप्ताह चल रहा है, तो मन में आया कि कुछ और भले नहीं कर सकते, संस्कृत में कुछ पोस्ट तो किया ही जा सकता है। अब इतनी विद्वत्ता तो नहीं है कि संस्कृत में कुछ लेख या कविता इत्यादि लिख सकें, लेकिन कहीं से पढ़कर कुछ लाइनें तो पोस्ट की जा सकती हैं। सोचा कि कुछ अलग विषय लिया जाए तो 'पातंजल योगसूत्र' का विचार मन में आया कि क्यों न इसी का एक सूत्र शब्दार्थ और सूत्रार्थ के साथ प्रतिदिन पोस्ट किया जाए। साथ ही यदि संभव हुआ तो बीच-बीच में किन्ही विषयों पर अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ प्रकाश डालने का भी प्राय एस किया जाए। उसी के प्रति लोगों के ध्यानाकर्षण हेतु यथामति अनधिकार चेष्टा करते हुए यहां इस ग्रंथ के विषय में उल्लेख करने का दुस्साहस किया है। आशा है कि विद्वज्जन मेरी इस धृष्टता के लिए क्षमा करेंगे। 

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

प्रेम की पूंजी तुम्हारी ले हृदय में घूमता हूं।

भीड़ में सबको भुलाकर बस तुम्हीं को ढूंढता हूं।

उम्र अब चढ़ने लगी है, 

थकन भी बढ़ने लगी है,

हर तरह के भार से अब मुक्त होना चाहता हूं,

भूल कर तुमको स्वयं से युक्त होना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


हां हृदय फटता है मेरा, सोचकर तुमसे जुदाई।

इस जुदाई में छिपी है, किंतु दोनों की भलाई।

मोह बढ़ता जा रहा है,

धैर्य घटता जा रहा है,

डिग न जाएं कदम मेरे अडिग रहना चाहता हूं,

छोड़कर अनुकूल धारा उलट बहना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


कठिन था मैंने मगर मन को प्रिये! समझ लिया है।

इस जगत में अभिलषित जो भी रहा वह पा लिया है।

मन को मेरे जानती हो,

तुम मुझे पहचानती हो,

बस तुम्हीं हिय में रही हो पुनः कहना चाहता हूं,

कर लिया संकल्प उस पर अटल रहना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


- राजेश मिश्र 


बुधवार, 18 जून 2025

मुझ पातकी का मोहन! उद्धार नाथ कर दो

मुझ पातकी का मोहन! 
उद्धार नाथ कर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
मुझको सनाथ कर दो।।

मद-राग-द्वेष भगवन्!
पल-पल सता रहे हैं।
मैं निस्सहाय निर्बल
निशि-दिन जता रहे हैं।

बन बल अबल, जड़ों से 
इनका विनाश कर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
मुझको सनाथ कर दो।।१।।

मतिमन्द मैं न जानूँ
कैसे तुम्हें रिझाऊँ?
किस नाम से पुकारूँ?
कैसे समीप आऊँ?

मुख से न कह सको तो,
संकेत मात्र कर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
मुझको सनाथ कर दो।।२।।

तम ने जकड़ रखा है,
पथ सूझता न कोई।
भटकाव, ठोकरें हैं,
अरु आसरा न कोई।

अपनी शरण में ले लो,
पथ पर प्रकाश भर दो।
तुम बिन अनाथ भटकूँ,
 मुझको सनाथ कर दो।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 19 जनवरी 2025

मानव हैं हम द्वेष सहज है

मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है।
मानव हैं हम, द्वेष सहज है।।

निर्बल को जब सबल सताए,
वह प्रतिकार नहीं कर पाए,
मन पीड़ा से भर जाता है, 
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

वचन कठोर बोलता कोई,
जब औकात तोलता कोई,
व्यक्ति जहाँ जब डर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

जब कोई प्रिय वस्तु हमारी,
लगती जो प्राणों से प्यारी,
कोई हमसे हर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

जब जीवन दुखमय हो अपना,
सुख बस बन जाए इक सपना,
औरों का सुख खल जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

कर्महीन जब हम होते हैं,
दैव-दैव करते रोते हैं,
कर्मठ आगे बढ़ जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

आशंका से त्रस्त रहें जब,
तिरस्कार-दुत्कार सहें जब,
प्रेम हृदय का मर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

यद्यपि द्वेष सहज होता है,
किंतु सदा दुखप्रद होता है।
शांति हमारी हर लेता है,
क्रोध-घृणा मन भर देता है।

तिल-तिल हमें जलाता रहता,
रोगी सतत बनाता रहता।
तन-मन को दूषित कर देता,
अंदर विष-ही-विष भर देता।

सुहृद दूर हो जाते सारे,
सुख सपने बन जाते सारे।
कोई निकट नहीं आता है,
यह एकाकी कर जाता है।

सारा ज्ञान नष्ट कर देता।
निर्मल बुद्धि भ्रष्ट कर देता।
पापाचार बढ़ा देता है।
जीवन नर्क बना देता है।

दावानल यह द्वेष सहज है।
इसको तज पाना अचरज है।‌।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 13 जनवरी 2025

चुपके-चुपके मुझको देखें

चुपके-चुपके मुझको देखें,
मैं देखूँ तो छुप जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।

आँखें चञ्चल हिरनी जैसी,
सतत कुलाँचें भरती हैं।
पल को झाँके, पल में भागे,
पल भर सद्य ठहरती है।

खुलती मधुर अधर कलियों पर,
लोलुप भँवरे लुट जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।१।।

कांत-कपोल अरुण आभा से
हृदय-कमल खिल जाता है।
भावों की भावन सुगंध से
मन महमह महकाता है।

दंतावलि-द्युति चकाचौंध पर
लाखों दिनकर झुक जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।२।।

अलकें लोल कलोल निरत नित
अंग-अंग को चूम रहीं।
अन्-अधिकृत अंगों पर जहँ-तहँ
आवारा बन घूम रहीं।

लालायित द्वेषित दृग सबके
मुझ भागी पर उठ जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 11 जनवरी 2025

हिंदी की शुद्धता

हमारी संस्कृति और परंपरा में माता-पिता का स्थान सर्वोच्च है, और इन दोनों में भी माता प्रथम पूजनीया है। कहा गया है कि यदि माता और पिता दोनों साथ में बैठे हों तो पहले माता को प्रणाम करना चाहिए, तत्पश्चात पिता को। उल्लेखनीय है कि जब भगवान राम वनगमन के लिए तत्पर हुए तो माता कौशल्या ने उनसे कहा -

जौं केवल पितु आयसु ताता। 
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।
तौ कानन सत अवध समाना।।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है -

जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

स्कंद पुराण में माता के संबंध में उद्धृत है कि - 

नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गति:। नास्ति मातृसमा त्राण नास्ति मात्सया प्रपा।। 

विभिन्न शास्त्र बार-बार माता की महिमा का बखान करते हैं। साथ ही ध्यातव्य  है कि माता शब्द केवल जन्मदात्री के लिए रूढ़ नहीं है। इसकी व्यापकता जड़ से चेतन और स्थूल से सूक्ष्म तक सर्वत्र है। इन्हीं असंख्य माताओं में एक माता हमारी भाषा भी है। उदाहरण के लिए संस्कृत भाषा की वंदना करते हुए कहा जाता है कि -

वन्दे संस्कृत मातरम्।

राजभाषा और हमारी मातृभाषा हिंदी भी हमारी इन्ही पूजनीय माताओं में से एक है। भारतवर्ष की अनेकानेक भाषाओं की भाँति हिंदी का भी उद्भव-स्रोत संस्कृत ही है और विकास-क्रम संस्कृत - पालि - प्राकृत - अपभ्रंश - अवहट्ट - खड़ी बोली है।

विदेशी आक्रमणों, मुगलों के आधिपत्य और उर्दू के विकास के साथ-साथ हिंदी में अरबी, फारसी इत्यादि विदेशी भाषाओं के शब्द स्थान पाने लगे। कालांतर में एक योजना के अनुरूप भी हिंदी में संस्कृतनिष्ठ शब्दों को इन विदेशी भाषाओं के शब्दों से विस्थापित किया जाने लगा। एक ओर संस्कृत को अत्यंत कठिन और क्लिष्ट बढ़कर लोगों में उसके प्रति भय और द्वेष पैदा किया गया, तो दूसरी ओर हिंदीभाषियों के बीच हिंदी को माँ (जो कि निस्संदेह है भी) और उर्दू को उनकी मौसी बढताकर दुष्प्रचार किया गया ताकि वे निर्विरोध उर्दू के अस्तित्व को स्वीकार कर लें। साथ ही पत्र-पत्रिकाओं तथा शायरियों और गजलों इत्यादि के माध्यम से उर्दू का खूब प्रचार-प्रसार किया गया। संस्कृत और हिंदी के उत्कृष्ट छंदों को बंधन बढताकर छंदमुक्त कविता का प्रचार-प्रसार हुआ, किंतु वहीं शायरी के लिए बहर में ही लिखना आज भी आवश्यक है। ठीक वैसे ही जैसे घूंघट को पिछड़ेपन तथा स्त्री की स्वतंत्केरता -हनन से जोड़ दिया गया और बुर्के को संस्कृति, धर्म और स्त्री की मर्यादा से। 

धीरे-धीरे हिंदी में उर्दू के शब्दों की अधिकता होती गई और इसमें एक बड़ी भूमिका निभाई वामपंथियों और बॉलीवुड के छद्म धर्मनिरपेक्षियों ने। बड़े से बड़ा रचनाकार भी, जो शुद्ध हिंदी में कुछ भी लिखने में समर्थ था, इस चक्रव्यूह में फँसता गया और ख्याति तथा स्वीकार्यता के लोग में उर्दू के प्रयोग की ओर बढ़ता गया। स्थिति ऐसी हो गई कि शुद्ध हिंदी की बात करने वालों को वैसे ही अछूत समझा जाने लगा जैसे हिंदुत्व की बात करने वालों को। 

सोशल मीडिया के आगमन के साथ ही नवोदित रचनाकारों और कवियों को अपने आप को व्यक्त करने के लिए एक ऐसा मंच मिला जहां उन्हें पाठक सहज ही सुलभ थे और किसी मंचीय कवि की चाटुकारिता की आवश्यकता नहीं थी। जो लोग साहित्य के क्षेत्र से नहीं जुड़े थे, किंतु हिंदी और साहित्य में जिनकी रुचि थी, ऐसे अनेकानेक रचनाकारों का प्रादुर्भाव हुआ और उनमें से कई तो इतने उत्कृष्ट हुए कि नामधारी मंचीय रचनाकार भी उनके समक्ष पानी भरते दृष्टिगत होने लगे। धीरे-धीरे हिंदी की शुद्धता पर भी चर्चा प्रारंभ हुई और संस्कृत के पुनरुत्थान के प्रयासों तथा हिंदू पुनर्जागरण के साथ-साथ यह बहस आगे बढ़ती गई। आज सोशल मीडिया पर अनेकानेक ऐसे रचनाकार हैं जिनकी भाषा की शुद्धता और विषय वस्तु के अपनी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ाव को देखकर मन गद्गद् हो जाता है। 

किंतु अभी भी दिल्ली बहुत दूर है और इस दिशा में सफलता हेतु अभी एक लंबी यात्रा तय करनी पड़ेगी। हिंदी के बारे में और हिंदी की शुद्धता के बारे में हमें और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है तथा लोगों को भी इसके प्रति तथा इसके परिणामों के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है। गुलामी की मानसिकता से अपने आप को मुक्त करने के लिए तथा आने वाली पीढ़ियों की सोच को सही दिशा देने के लिए भी यह अत्यंत आवश्यक है। आइए हम सब मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ें और जहाँ तक हो सके हिंदी की शुद्धता को बनाए रखने के लिए अपना योगदान दें।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 8 जनवरी 2025

मनमोहन ने झलक दिखाई

मनमोहन ने झलक दिखाई।
तन-कम्पन मन-नंद न जाई।।

माथे मोर-मुकुट मनभावन,
तन पट-पीत तड़ित सकुचावन,
उर वैजन्ती माल सुहाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।१।।

झर-झर प्रेम नयन-निर्झर से,
भक्तन-जन-मन-मधुवन सरसे,
अधर मधुर मुरली मुसकाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।२।।

अतुलित छवि लखि लज्जित रति-पति,
जन निरखत पावत यदुपति-गति,
पाप-ताप-परिताप नसाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 5 जनवरी 2025

बम्-बम् बोल जगाना है

गोली नहीं चलानी तुमको,
नहीं कृपाण उठाना है।
शून्य, सुषुप्त, अचेतन जन को
बम्-बम् बोल जगाना है।।

कुछ अनभिज्ञ और अवगत कुछ,
कुछ हैं आँखें मूँदे।
कुछ अपनों के ही विरोध में,
निशि-दिन नाचें-कूदें।

सरल नहीं है, पर सम्भव है,
संग सभी को लाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।१।।

कुछ समझेंगे समझाने से,
कुछ भय से जागेंगे।
कुछ निर्बल, सहयोग अपेक्षित,
स्वयं नहीं माँगेंगे।

साम-दान से, दण्ड-भेद से,
अपने साथ मिलाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।२।।

मिल-जुलकर सब संग चलेंगे,
संस्कृति बच जाएगी।
धर्म-ध्वजा चहुँ-दिशि फहरेगी,
सन्तति सुख पाएगी।

"हेयं दुःखम् अनागतम्" का
सबको पाठ पढ़ाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।३।।

**हेयं दुःखमनागतम्।।
(पातंजलि योगसूत्र, साधनपाद, सूत्र १६)

हेयम् - नष्ट करने योग्य 
दु:खम् - दुख
अनागतम् - जो आया न हो, आने वाला हो 

अर्थात् आने वाले दुख नष्ट करने योग्य होते हैं।

- राजेश मिश्र 

गुरुवार, 2 जनवरी 2025

प्रिय! तेरा संदेश मिला है

रीते नैना झर-झर झरते,
झम-झम बरसे सावन।
प्रिय! तेरा संदेश मिला है, 
झूम रहा है तन-मन।।

कितने सावन बीते, सूखे रीते-रीते।
प्रेम-लता को हमने दृग-निर्झर से सींचे।

प्रेम-पुष्प पुनि आज खिला है,
महका है फिर उपवन।
झूम रहा है तन-मन।।१।।

उर ऊसर था मेरा, संग मिला जब तेरा।
उर्वरता भर आयी, आया नया सवेरा।

हरियाली बंजर में छाई,
उदित हुआ मन मधुवन।
झूम रहा है तन-मन।।२।।

विधि को मिलन हमारा, लेकिन रास न आया।
टूटा प्रेम-घरौंदा, हमने साथ बनाया।

चकनाचूर हुए सब सपने,
बिखर गया था जीवन।
झूम रहा है तन-मन।।३।।

- राजेश मिश्र

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...