मंगलवार, 24 दिसंबर 2024

छलक रहा तेरा यौवन

दिव्य अनिंद्य अनूप रूप है,
अंग-अंग प्रति उद्दीपन।
मधुशाला के मधु-प्याले सा,
छलक रहा तेरा यौवन।।

दृग-द्वय में मधु मधुर भरा है,
मन मेरा लोलुप भँवरा है।
मदमाती चितवन पर तेरी 
सारा मधुवन तज ठहरा है।

युगल जलज-लोचन को अर्पित,
इस भँवरे का यह जीवन।
छलक रहा तेरा यौवन।।१।।

कृष्ण कुन्तलों से आती है,
चन्द्रवदन-छवि छन-छन कर यों।
श्याम सघन घन-ओट से झाँके
शरत्पूर्णिमा-शुभ-सुधांशु ज्यों।

भींगें सरस सुधा-वर्षा में,
मेरे चकित चकोर-नयन।
छलक रहा तेरा यौवन।।२।।

कमनीया कंचन काया पर,
ज्यों बैठा ऋतुराज सिमटकर।
सद्य-स्फुट कोमल कलिकायें,
आच्छादित तन-तरु पर सुन्दर।

पग-पग झरते सुमन-सुरभि से,
सुरभित हर्षित जड़-चेतन।
छलक रहा तेरा यौवन।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 21 दिसंबर 2024

जब से तुमने दामन छोड़ा

जब से तुमने दामन छोड़ा 
प्रिय! हम हँसना भूल गए।
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।

जिन हाथों को हाथ में लेकर 
घंटों बैठे रहते थे।
मौन मुखर था, बस धड़कन से
बातें करते रहते थे।
उन सुकुमार स्निग्ध हाथों में 
मेहँदी रचना भूल गए। 
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।१।।

जिन नैनों की गहराई में 
पल में डूबे जाते थे।
जल बिन मीन तड़पते थे तुम
जिस दिन देख न पाते थे।
आँसू सारे सूख गए हैं,
नैन छलकना भूल गए।
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।२।।

नख-शिख सजकर, साँझ-सवेरे
तुमसे मिलने आते थे।
मेरे मुखमण्डल पर तेरे
दृग-मधुव्रत मँडराते थे।
जोगन बनकर घूम रहे हैं
सजना-सँवरना भूल गए।
मर्यादा पीड़ा की टूटी,
और तड़पना भूल गए।।३।।

- राजेश मिश्र 

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

वंश-वृक्ष

वंश-वृक्ष तनु-मूल पिता है, माँ शाखा-टहनी-पत्ते।
सुन्दर सस्य*-सुमन बच्चे।।

जड़ अदृश्य आधार वृक्ष का,
भू के अन्दर रहता है।
नित-प्रति नये कष्ट सहकर भी 
उसको थामे रहता है।
तना कठोर खुरदरा दीखे,
अन्दर रस लहराता है।
जड़ें जुटातीं दाना-पानी,
वह ऊपर पहुँचाता है।

पिता कभी करता न प्रदर्शित, कितने भी खाये धक्के।
सुन्दर सस्य-सुमन बच्चे।।१।।

शाखायेॅ-टहनी-पत्ते मिल 
शेष व्यवस्था करते हैं।
जड़ें जुटायें जो धरती से
उसे प्रसंस्कृत करते हैं।
सूरज का प्रकाश ले पत्ते
उससे भोज्य बनाते हैं।
सब अवयव पोषित होते हैं,
और सभी हर्षाते हैं।

माता गृह, गृहिणी, गृहेश्वरी, सोचे सुख-दुख का सबके।
सुन्दर सस्य-सुमन बच्चे।।२।।

स्वस्थ, सुभग, पोषित तरु पर पुनि
कोमल कलियाँ खिलती हैं।
साथ समय के विकसित होतीं,
विकसित होकर फलती हैं।
फल में बीज पनपते-बढ़ते,
बीजों में भवितव्य छुपा।
धर्म और संस्कृति का सारा
तत्त्व और गन्तव्य छुपा।

बच्चों की रखवाली करना, शत्रु मिटाकर या मिट के।
सुन्दर सस्य-सुमन बच्चे।।३।।

सस्य = फल

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

मेरे जीवनसाथी

तुम मनभावन मनमीत मेरे।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

जीवन के पतझड़ की बहार।
निर्झर नयनों का पुलक प्यार।
तेरी साँसों का सुखद स्पर्श,
मलयज शीतल सुरभित बयार।।

मृदु वचन सुभग संगीत तेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

तेरा यौवन, तेरी काया।
काले केशों की घन छाया।
बाहें तेरी ज्यों कमलनाल,
अधरों पर अरुण अरुण छाया।।

हर हाव-भाव में प्रीत तेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

कर झंकृत मन-वल्लकी तार।
धुन छेड़ो जिसमें प्यार-प्यार।
हम डूबें, डूबें, जग डूबे,
हो प्रेम वृष्टि ऐसी अपार।।

कर दो बेसुध हे मीत मेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

जीवनधारा, जीवनसंगिनि।
जीवन नहिं जीवन तेरे बिन।
यूँ ही बरसाती रहना तुम,
यह प्रेम-सुधा मुझ पर निशिदिन।।

हृदयेशा! मन:प्रणीत मेरे।।
तुमसे ही हैं ये गीत मेरे।।

वल्लकी = वीणा
मन:प्रणीत = मन को रुचिकर/सुखद

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2024

परिणय-दिवस सिय-राम का

पावन परम, कलि-मल हरन, जग-जननि का, सुखधाम का,
परिणय-दिवस सिय-राम का।।

मन मुदित, पुलकित जानकी,
मूरति हृदय रख राम की।
दुलहन बनी, सज-धज चली ,
होने सदा श्रीराम की।

हरषत चली, सँकुचत चली, करने वरण छविधाम का।।
परिणय-दिवस सिय-राम का।।१।।

शोभा अमित रघुनाथ की,
छवि कोटि हर रतिनाथ की।
मन मुग्ध निरखि विदेह का,
आँखें सजल सिय मातु की।

आनंद-घन, करुणायतन, रघुवर सकल गुण-ग्राम का।
परिणय-दिवस सिय-राम का।।२।।

रिपुदमन, भरत, लखन लला,
श्रुतिकीर्ति, मांडवि, उर्मिला।
चारों युगल लखि क्यों नहीं,
मिथिला विमोहित हो भला।

यह शुभ लगन, मंगलकरन, हो हेतु जग कल्यान का।
परिणय-दिवस सिय-राम का।।३।।

- राजेश मिश्र 

बुधवार, 4 दिसंबर 2024

ओ रे निर्मोही! छोड़ चला किस देश?

ओ रे निर्मोही! छोड़ चला किस देश?

पल भर को भी चित्त न लाया, 
मुझ विरहिनि का क्लेश।
ओ रे निर्मोही!…………।।

कंचन काया धूमिल हो गई 
चिंता रज छाई है।
अंग-अंग प्रिय संग को तरसे, 
तड़पे तरुणाई है।

सूख-सूख तन शूल हो गया, 
रूप-रंग नि:शेष।
ओ रे निर्मोही!…………।।१।।

निशि दिन नैना झरते रहते,
सावन-भादों जैसे।
दुख-नदिया अति बढ़ आई है,
निकलूँ इससे कैसे?

दिवस, मास, संवत्सर बीते,
राह तकूँ अनिमेष।
ओ रे निर्मोही!…………।।२।।

मन मुरझाया, बुद्धि अचेतन,
धड़कन डूबी जाये।
प्राण हठी यह देह न त्यागे,
दुर्दिन दैव दिखाये।

सूरज, शशि, उडुगन से भेजूँ,
नित नूतन संदेश।
ओ रे निर्मोही!…………।।३।।

- राजेश मिश्र 

कपटी बुद्ध हुआ जाता है

अन्तस् आच्छादित घन तम से, बाहर शुद्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।

बोली में सम्मान लिये है,
मुखड़े पर मुस्कान लिये है।
हँस-हँसकर है गले लगाता,
पर कर में किरपान लिये है।

उसके आडम्बर पर देखो, जन-जन लुब्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।१।।

धीरे-धीरे पास पहुँचता
मीठी-मीठी बातें करता।
जब सम्बन्ध सुदृढ़ हो जाता 
अवसर पा पुनि घातें करता।

उसकी काली करतूतों पर, यह मन क्रुद्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।२।।

नये-नये नित स्वाँग रचाता,
भोले-भाले लोग लुभाता।
पापी, पाखण्डी, व्यभिचारी,
स्वप्न-जाल में उन्हें फँसाता।

जिसको उसका सच बतलाओ, वही विरुद्ध हुआ जाता है।
कपटी बुद्ध हुआ जाता है।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 1 दिसंबर 2024

मत मार मेरे अल्हड़पन को

मत मार मेरे अल्हड़पन को।

इसमें मेरे प्राण निहित हैं, 
ऊर्जित करते तन-मन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।

मैं अबोध, जग-बोध नहीं है,
पीड़ा है, पर क्रोध नहीं है।
निश्छल, छल मैं समझ न पाऊँ,
अस्वीकृति, प्रतिरोध नहीं है।

निर्झरि निर्मल जल जैसी में,
सिंचित करती जीवन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।१।।

हृदय नवोदित नरम कली है,
सरस, सुगंधित, सद्य खिली है।
मधुर, मदिर, मदमस्त, मनोहर 
भावों की सौरभ मचली है।

दिग्दिगंत में मुक्त विचरती,
भरती, हरती जन-मन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।२।।

सिंदूरी कमनीया काया,
अंग-अंग मधुमास समाया।
खंजन-से मन-रंजन लोचन,
हँसी, कोई वीणा खनकाया।

गजगामिनि, गज निरखि लजाये,
मोहित करती त्रिभुवन को।
मत मार मेरे अल्हड़पन को।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 30 नवंबर 2024

रे बटोही! धीर धर

हाँ, कठिन है जीवन-डगर,
रे बटोही! धीर धर।।

मार्ग काँटों से भरे हैं,
पत्थरों की ठोकरें हैं।
है नहीं ठहराव कोई,
पथ स्वयं ही चल रहे हैं।

हो धूप कितनी भी प्रखर,
रे बटोही! धीर धर।।१।।

नियत पथ, गंतव्य निश्चित,
और यात्रा अवधि निश्चित।
ठोकरें कब-कब लगेंगी,
घाव-पीड़ा सब सुनिश्चित।

व्यर्थ का प्रतिकार मत कर,
रे बटोही! धीर धर।।२।।

द्वंद्व सह तू, कर्म कर तू,
अडिग रह निज धर्म पर तू।
तप यही है, साधना है,
धर्म का हिय मर्म धर तू।

मन मनन कर, चिंता न कर,
रे बटोही! धीर धर।।३।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

सूरज के ढलने पर ही

सूरज के ढलने पर जब घनघोर अंधेरा पलता है।
अरुणोदय की आशा ले दीपक रातों को जलता है।।

मन में यह विश्वास प्रबल है अन्धकार मिट जायेगा।
स्याह भयावह रात ढलेगी सूरज फिर उग आयेगा।
जब तक साँसें चलती रहतीं थके-रुके बिन चलता है।
अरुणोदय की आशा ले………।।१।।

कोई प्रतिफल नहीं चाहता अनासक्त निज कर्म करे।
जन्म जगत में लिया हेतु जिस पालन अपना धर्म करे।
निष्कामी का कर्म हमेशा औरों के हित फलता है।
अरुणोदय की आशा ले………।।२।।

सूरज को उपदेश न देता निज कर्तव्य निभाता है।
नई साँझ, नित नया जन्म तम से लड़ने आता है।
सत्य-धर्म हित बलि होने को हर इक बार मचलता है।
अरुणोदय की आशा ले………।।३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 27 नवंबर 2024

गूँजती हो

गूँजती हो
तन में मेरे, मन में मेरे,
प्रार्थना के घंटियों-सी, श्रुति-ऋचा सी।।

जब कभी एकांत में बैठा हुआ मैं,
लड़ रहा होता अँधेरे से घनेरे।
आ धमकती हो सुबह की रश्मियों-सी,
और करती हो प्रकाशित प्राण मेरे।

जगमगाती 
तन में मेरे, मन में मेरे,
अर्चना के दीप की निर्मल प्रभा-सी।।१।।

जब कभी अवसाद के घन घेरते हैं,
तुम तड़पती हो, चमकती चंचला-सी।
सद्य बुझ जाती स्वयं, पर कर प्रकाशित,
टिमटिमाती, गहन तम में तारका-सी।

बिखरती हो 
तन में मेरे, मन में मेरे,
चन्द्रमा के चाँदनी की मधुरिमा-सी।।२।।

हर कठिन पल में दिखाती रास्ता तुम,
घुप अँधेरे में चमकते जुगनुओं-सी।
हृदय लगकर, सोखकर संताप सारे,
व्यथित मन में उतरती आशा-किरण सी।

और बहती
तन में मेरे, मन में मेरे,
सर्ग के प्रारम्भ की नव-चेतना-सी।।३।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 25 नवंबर 2024

पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में

पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।

पंखों में ले, प्राण पवन से,
निर्भयता मन में।
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।

तोड़ सकल जंजीरें, उड़ जा,
चुपके, धीरे-धीरे उड़ जा।
ममता की यह नदी भयावह,
निकल भँवर से, तीरे उड़ जा।

तड़प रहा तूँ, भला बता क्यूँ
उलझा बन्धन में?
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।१।।

दुखड़ा तेरा कौन सुनेगा?
सुनकर भी कोई न गुनेगा।
अपना हो या होय पराया,
नित नव नूतन जाल बुनेगा।

ठाट-बाट के, जाल काट के
उड़ जा कानन में।
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।२।।

एक राम को अपना कर ले,
नाव नाम की, भव से तर ले।
मोहनि मूरति साँवरिया की,
नेह लगा ले, उर में धर ले।

कर ले पावन, कलुषित जीवन,
लग हरि चरनन में।
पंछी रे! उड़ जा उन्मुक्त गगन में।।३।।

- राजेश मिश्र 

सबके अपने अहंकार हैं

कैसे मिल-जुल साथ चलें सब? प्रश्न विकट, उलझन अपार है…
सबके अपने अहंकार हैं।।

घर में भाई-भाई लड़ते,
बाहर लड़ें पड़ोसी।
किसको दोषमुक्त मानें हम,
किसको मानें दोषी?

ताली बजती दो हाथों से, दोनों पक्ष कसूरवार हैं…
सबके अपने अहंकार हैं।।१।।

धर्म-कर्म का पता नहीं है,
आडम्बर में डूबे।
जाति-जाति का भोंपू लेकर 
सारे उछलें-कूदें।

दम्भी-लोभी-कामी-क्रोधी, सदा स्वार्थ से सरोकार है…
सबके अपने अहंकार हैं।।२।।

सच्चाई का गला घोंटकर,
झूठ की गठरी बाँधे।
तीर द्वेष का लेकर घूमें,
सरल जनों पर साधें।

मेल नहीं कथनी-करनी में, तर्क निरालै निराधार हैं…
सबके अपने अहंकार हैं।।३।।

- राजेश मिश्र 

जब कोई पत्थर बरसाए

जब कोई पत्थर बरसाए, 
खून तुम्हारा खौले है क्या?
निरपराध कोई मर जाए, 
खून तुम्हारा खौले है क्या?

शत्रु-बोध से हीन रहोगे,
सदा दुखी अरु दीन रहोगे।
आगे चल वंशज कोसेंगे,
आजीवन श्रीहीन रहोगे।

बहू-बेटियाँ छेड़ी जाएँ, 
खून तुम्हारा खौले है क्या?
निरपराध कोई मर जाए, 
खून तुम्हारा खौले है क्या?………………(१)

ऐसा नहीं कि शक्ति नहीं है,
या फिर तुममें भक्ति नहीं है।
धर्मपरायण, संस्कृति-पोषक,
पर विरोध-अभिव्यक्ति नहीं है।

मूरति-मन्दिर  तोड़े जाएँ,
खून तुम्हारा खौले है क्या?
निरपराध कोई मर जाए, 
खून तुम्हारा खौले है क्या?………………(२)

अथक परिश्रम आजीवन कर,
तिनका-तिनका जोड़ बना घर।
तात-मात का तोष-प्रदाता,
बच्चों का शुचि सपना सुंदर।

कोई घर-सम्पत्ति जलाए,
खून तुम्हारा खौले है क्या?
निरपराध कोई मर जाए, 
खून तुम्हारा खौले है क्या?………………(३)

- राजेश मिश्र 

नित खींच-तान में फँसे लोग

नित खींच-तान में फँसे लोग।
स्वार्थ-जम्बाल में धँसे लोग।।

गाँवों की पीड़ा क्या समझें,
आजन्म शहर में बसे लोग।।

मिलने पर महका जाते हैं,
मलय-सा शिला पर घिसे लोग।।

सबको सद्य भाँप लेते हैं,
जीवन-चक्की में पिसे लोग।।

दुख दूसरों का समझ लेते हैं,
कृतान्त-पाश में कसे लोग।।

चित्त से उतर ही जाते हैं
रंग उतरते, मन-बसे लोग।। 

रक्त से सदा सींचा जिसने,
उसी को सर्प बन डँसें लोग।।

मदमस्त झूमते पी-पीकर
जातिगत अहं के नशे लोग।।

जम्बाल = कीचड़
कृतान्त = भाग्य 

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 23 नवंबर 2024

घर छोड़ चला है पंछी

खो बचपन, लड़ने जीवन की
होड़ चला है पंछी…
घर छोड़ चला है पंछी।

माँ का आँचल, पितु का साया
अब छूटे जाते हैं।
करुण स्नेह के निर्झर नयनों
से फूटे जाते हैं।

प्रेम-निर्झरी की धारा को
मोड़ चला है पंछी…
घर छोड़ चला है पंछी।।१।।

शक्ति-युक्त पंखों को पाकर
चला विशाल गगन में।
विश्व-विजय करने की इच्छा
पाले अपने मन में।

नये जगत से अपना नाता
जोड़ चला है पंछी…
घर छोड़ चला है पंछी।।२।।

बिना सहारे, निज पंखों की
ताकत अब तौलेगा।
मात-पिता-गुरुजन शिक्षा से
नये द्वार खोलेगा।

निर्भय हो, मन के भय-भ्रम को
तोड़ चला है पंछी…
घर छोड़ चला है पंछी।।३।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 21 नवंबर 2024

बचपन निराश क्यों है

सब बदहवास क्यों हैं?
बचपन निराश क्यों है?

सारे सम्बन्धों में,
इतनी खटास क्यों है?

बेटे-बेटियों बीच,
माता उदास क्यों है?

रात्रि की नीरवता में,
मौन अट्टहास क्यों है?

आजीवन दूर रहा,
आज फिर पास क्यों है?

बुझ चुकी आँखों में,
सहसा प्रकाश क्यों है?

ठुकराया बार-बार,
उसी से आस क्यों है?

गीदड़ों की गोष्ठी में,
बहुत उल्लास क्यों है?

सुख-सम्पत्ति सम्पन्न,
जलधि में प्यास क्यों है?

नियति के अधर-द्वय पर,
यह कुटिल हास क्यों है?

- राजेश मिश्र

शनिवार, 16 नवंबर 2024

भींगी-भींगी आँखों से, तुमको जाते देखा था

भींगी-भींगी आँखों ने, तुमको जाते देखा था।
शायद तुमको याद नहीं।
छोड़ो, कोई बात नहीं।।

जब तुम डोली में बैठी,
बुनती सपने साजन के।
था दृग-द्वय से बीन रहा,
टूटे टुकड़े मैं मन के।

मन के टूटे टुकड़ों ने, तुमको जाते देखा था।
शायद तुमको याद नही।
छोड़ो, कोई बात नहीं।।१।।

याद किए सारे सपने
देखे थे मिलकर हमने।
कंधे पर सिर रख मेरे 
की थीं जो बातें तुमने।

उन सपनों की किरचों ने, तुमको जाते देखा था।
शायद तुमको याद नहीं।
छोड़ो, कोई बात नहीं।।२।।

फूल खिलाए थे तुमने 
हृदय लगा जो भावों के
छलनी कर डाला सीना
काँटा बनकर घावों से।

भावों के उन घावों ने, तुमको जाते देखा था।
शायद तुमको याद नहीं।
छोड़ो, कोई बात नहीं।।३।।

- राजेश मिश्र 

आभा तेरी आती है

नीले-नीले नभ अंचल से, नव नील-नलिन के शतदल से, 
आभा तेरी ही आती है।
मनहर मन हर ले जाती है।।

जब कुक्कुट टेर लगाता है,
सूरज सोकर उठ जाता है।
जब घूँघट उषा खोलती है,
मृदु मलयज वायु डोलती है।

मेघों के श्यामल रंगों से, श्यामला धरा के अंगों से,
आभा तेरी ही आती है।
मनहर मन हर ले जाती है।।१।।

स्वर्णिम रवि-किरणें आती हैं,
छूकर कलियाँ मुसकाती हैं।
वन-उपवन पुष्प महकते है,
जब वाजिन्-वृंद चहकते हैं।

जन-जन में जागृत जीवन से, निश्छल नवजात के बचपन से,
आभा तेरी ही आती है।
मनहर मन हर ले जाती है।।२।।

हिमगिरि हिम-हृदय पिघलता है,
बन अश्रु नदी जब चलता है।
सचराचर सिंचित सिक्त करे,
नित नवजीवन उद्दीप्त करे।

सागर-सरिता आलिंगन से, हर्षित लहरों के नर्तन से,
आभा तेरी ही आती है।
मनहर मन हर ले जाती है।।३।।

जब सूर्य श्रमित हो जाता है,
संध्या की गोद में जाता है।
शुभ साँझ का दीपक जलता है,
तम से प्रभात तक लड़ता है।

घन अंधकार की बाँहों से, निस्तब्ध निशा की साँसों से,
आभा तेरी ही आती है।
मनहर मन हर ले जाती है।।४।।

सब कुछ तेरा ही रचा हुआ,
सबमें तू ही है बसा हुआ।‌
सब लीन तुझी में होना है,
तुझमें ही है सब प्रकट हुआ।

श्रुति-मन्त्रों के मधु गुंजन से, ऋषियों-मुनियों के चिन्तन से,

आभा तेरी ही आती है।
मनहर मन हर ले जाती है।।५।।

कुक्कुट = मुर्गा
वाजिन् = पक्षी


- राजेश मिश्र 

बुधवार, 13 नवंबर 2024

ढूँढ़ूँ मैं प्रिय राम कहाँ हो?

ढूँढ़ूँ मैं प्रिय राम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?

तुम बिन नैना चैन न पायें,
सूखें इक पल, पुनि भर आयें।
इत-उत देखें, राह निहारें,
पथरायें, पुनि-पुनि जी जायें।

लोचन ललित ललाम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?………(१)

अङ्ग शिथिल हैं, तन कुम्हलाया,
हुआ अचञ्चल, मन मुरझाया।
हाहाकार हृदय करता है,
बुद्धि-विवेक ने ज्ञान गँवाया।

तन-मन के आराम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?………(२)

तुम बिन शशधर-भानु रुके हैं,
दिवस आदि-अवसान रुके हैं।
श्याम वदन दर्शन-वन्दन हित,
सतत टूटते प्राण रुके हैं।

ढूँढ़ रहे अविराम कहाँ हो?
मेरे सुख के धाम कहाँ हो?………(३)

- राजेश मिश्र 

दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।

भोग्या माने महिलाओं को बाकी दुनिया सारी है।  दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।। पूर्व पिता से पूज्या माता, भ्राता से पहले भग...